21 अक्टूबर 1887 को जन्मे श्रीकृष्ण सिंह, जिन्हें सम्मानपूर्वक ‘श्री बाबू’ कहा जाता है, आधुनिक बिहार के निर्माण में अग्रणी नेताओं में गिने जाते हैं। वे स्वतंत्र भारत में बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री बने और लंबे समय तक राज्य की सरकार का नेतृत्व किया। उनके सार्वजनिक जीवन की पहचान प्रशासनिक संस्थाओं के विकास, भूमि-सुधार, शिक्षा और सामाजिक समानता से जुड़े प्रयासों से बनी।
प्रारंभिक जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन
श्रीकृष्ण सिंह का जन्म बिहार के तत्कालीन मुंगेर जिले के क्षेत्र में हुआ था, जिसे आज के प्रशासनिक नक्शे में नवादा से जोड़ा जाता है। शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे सार्वजनिक जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय आंदोलन में उनकी भागीदारी ने उन्हें बिहार के प्रमुख राजनीतिक नेतृत्व में स्थान दिलाया। उनके साथियों और समर्थकों के बीच ‘श्री बाबू’ नाम लोकप्रिय हुआ।
बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री
स्वतंत्रता से पहले 1937 में प्रांतीय स्वशासन के दौर में श्रीकृष्ण सिंह बिहार की सरकार के प्रमुख बने। स्वतंत्रता के बाद वे बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में जाने गए और 1961 में अपने निधन तक मुख्यमंत्री पद पर रहे। उनके कार्यकाल में राज्य के प्रशासनिक ढाँचे, सार्वजनिक संस्थानों, शिक्षा और औद्योगिक विकास को आगे बढ़ाने के प्रयास हुए। उस समय बिहार को स्वतंत्र भारत की नई लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप संस्थागत रूप देने की चुनौती थी।
जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार
श्री बाबू की सरकार के महत्वपूर्ण कदमों में जमींदारी व्यवस्था समाप्त करने की दिशा में प्रयास शामिल थे। बिहार में जमींदारी उन्मूलन कानून ने भूमि-संबंधों और ग्रामीण सत्ता-संरचना में बदलाव की प्रक्रिया शुरू की। इस तरह के सुधारों का उद्देश्य मध्यस्थ भू-स्वामित्व व्यवस्था को समाप्त करना और किसानों के अधिकारों को मजबूत करना था। इन सुधारों का क्रियान्वयन जटिल रहा और उनके प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रहे, फिर भी बिहार के सामाजिक-आर्थिक इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण मोड़ था।

सामाजिक समानता और देवघर मंदिर प्रवेश
श्रीकृष्ण सिंह के सार्वजनिक जीवन का एक उल्लेखनीय पक्ष सामाजिक भेदभाव को चुनौती देने से जुड़ा है। देवघर के बाबा बैद्यनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश से संबंधित पहल को बिहार के सामाजिक सुधार इतिहास में याद किया जाता है। मंदिर प्रवेश और सार्वजनिक धार्मिक स्थलों तक समान पहुँच के प्रश्न उस दौर में जातिगत असमानता के विरुद्ध व्यापक आंदोलनों का हिस्सा थे। इन प्रयासों ने सामाजिक सम्मान और समान नागरिक अधिकारों पर बहस को आगे बढ़ाया।
विकास, शिक्षा और संस्थागत निर्माण
मुख्यमंत्री के रूप में श्रीकृष्ण सिंह ने शिक्षा, सार्वजनिक प्रशासन और विकास संबंधी संस्थानों के विस्तार को महत्व दिया। उनके दौर में बड़े उद्योगों, सिंचाई, ऊर्जा और उच्च शिक्षा से जुड़े कई प्रयास बिहार के विकास विमर्श का हिस्सा बने। स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में संसाधनों की कमी और सामाजिक-आर्थिक विषमता के बीच राज्य के लिए विकास की दिशा तय करना आसान नहीं था। श्री बाबू की राजनीति इसी चुनौतीपूर्ण दौर में आकार लेती है।
उनकी विरासत का मूल्यांकन करते समय उपलब्धियों के साथ उस समय की सीमाओं और नीतियों के परिणामों पर भी ध्यान देना जरूरी है। फिर भी भूमि सुधार, प्रशासनिक निर्माण और सामाजिक समावेशन के सवालों को बिहार की राजनीति के केंद्र में लाने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।
श्री बाबू की विरासत
श्रीकृष्ण सिंह का जन्मदिवस बिहार के आधुनिक इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन और लोकतांत्रिक शासन की शुरुआती यात्रा को याद करने का अवसर है। उन्हें केवल एक मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे नेता के रूप में भी देखा जाता है जिन्होंने सामाजिक सुधार और राज्य-निर्माण को सार्वजनिक जिम्मेदारी का हिस्सा माना।

उनका जीवन यह याद दिलाता है कि किसी राज्य का निर्माण केवल प्रशासनिक निर्णयों से नहीं होता; इसके लिए संस्थाओं का विकास, शिक्षा के अवसर, आर्थिक सुधार और सामाजिक समानता की दिशा में निरंतर प्रयास भी जरूरी होते हैं।
