2 नवंबर 2012 को विश्वप्रसिद्ध भारतीय-अमेरिकी गणितज्ञ श्रीराम शंकर अभयंकर का निधन हुआ। बीजगणितीय ज्यामिति (Algebraic Geometry) में उनके मौलिक कार्य ने आधुनिक गणित को गहराई से प्रभावित किया। विशेष रूप से सिंगुलैरिटी सिद्धांत, बीजगणितीय वक्रों और अभयंकर के अनुमान (Abhyankar’s Conjecture) से उनका नाम अंतरराष्ट्रीय गणित-जगत में सम्मान के साथ लिया जाता है।
भारत में जन्म और गणितीय प्रतिभा
श्रीराम शंकर अभयंकर का जन्म 22 जुलाई 1930 को मध्य प्रदेश के उज्जैन में हुआ था। उनका परिवार शिक्षा और गणित से जुड़ा हुआ था। बचपन से ही गणित के प्रति उनकी गहरी रुचि विकसित हुई। उच्च शिक्षा के लिए वे अमेरिका गए, जहां उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में गणित का अध्ययन किया और 1955 में ऑस्कर ज़ारिस्की के मार्गदर्शन में पीएचडी पूरी की।
ज़ारिस्की बीजगणितीय ज्यामिति के प्रमुख विद्वानों में थे। उनके मार्गदर्शन में अभयंकर ने इस क्षेत्र की कठिन समस्याओं पर काम किया और आगे चलकर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई।
बीजगणितीय ज्यामिति में योगदान
बीजगणितीय ज्यामिति गणित की वह शाखा है जिसमें बहुपद समीकरणों से बनने वाली ज्यामितीय संरचनाओं का अध्ययन किया जाता है। अभयंकर ने इस क्षेत्र में विशेष रूप से सिंगुलैरिटी—अर्थात उन बिंदुओं या स्थितियों—का अध्ययन किया जहां किसी ज्यामितीय आकृति की सामान्य, नियमित संरचना बदल जाती है।

उन्होंने सिंगुलैरिटी को समझने और उनका समाधान करने की विधियों पर महत्वपूर्ण शोध किया। उनके काम ने बीजगणित, ज्यामिति और संख्या सिद्धांत के बीच संबंधों को मजबूत किया। इस शोध का प्रभाव केवल सैद्धांतिक गणित तक सीमित नहीं रहा; इसने आगे की पीढ़ियों के शोधकर्ताओं के लिए नए प्रश्न और विधियां भी उपलब्ध कराईं।
अभयंकर का अनुमान और गणितीय विरासत
उनके नाम से जुड़ा Abhyankar’s Conjecture बीजगणितीय ज्यामिति और गैल्वा सिद्धांत के एक महत्वपूर्ण प्रश्न से संबंधित है। यह अनुमान विशेष रूप से धनात्मक अभिलक्षण (positive characteristic) वाले क्षेत्रों में वक्रों के आवरणों और उनके गैल्वा समूहों की संभावनाओं का अध्ययन करता है। इस पर हुए शोध ने गणित के कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण चर्चा और आगे के परिणामों को जन्म दिया।
अभयंकर ने बीजगणितीय ज्यामिति को पढ़ाने और शोध के माध्यम से आगे बढ़ाने में भी बड़ी भूमिका निभाई। उनके व्याख्यान, शोधपत्र और पुस्तकों ने दुनिया भर के विद्यार्थियों तथा शोधकर्ताओं को प्रभावित किया। वे कठिन गणितीय विचारों को स्पष्ट ढंग से प्रस्तुत करने के लिए भी जाने जाते थे।
शैक्षणिक जीवन और सम्मान
अभयंकर ने अमेरिका के पर्ड्यू विश्वविद्यालय में लंबे समय तक अध्यापन और शोध किया। वहां वे गणित विभाग के प्रमुख विद्वानों में शामिल रहे और अनेक शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया। उनके विद्यार्थियों और सहयोगियों ने आगे चलकर गणित के विभिन्न क्षेत्रों में योगदान दिया।

उनके कार्य को अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से मान्यता मिली। वे भारतीय मूल के उन गणितज्ञों में थे जिन्होंने वैश्विक अकादमिक जगत में भारत की वैज्ञानिक प्रतिभा की प्रतिष्ठा को मजबूत किया। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि मूलभूत वैज्ञानिक शोध सीमाओं से परे जाकर ज्ञान की दुनिया को समृद्ध करता है।
निधन और स्थायी प्रेरणा
श्रीराम शंकर अभयंकर का निधन 2 नवंबर 2012 को अमेरिका के इंडियाना राज्य में हुआ। उनके निधन से गणित-जगत ने एक ऐसे विद्वान को खोया जिसने दशकों तक कठिन और मूलभूत गणितीय समस्याओं पर काम किया। उनकी विरासत उनके शोध, गणितीय विचारों और उन विद्यार्थियों के माध्यम से जीवित है जिन्हें उन्होंने प्रेरित किया।
आज अभयंकर का नाम बीजगणितीय ज्यामिति के इतिहास में उनके मौलिक योगदान के कारण याद किया जाता है। उनका सफर भारतीय प्रतिभा, वैश्विक शोध और ज्ञान के प्रति आजीवन समर्पण की प्रेरक मिसाल है।
संक्षिप्त तथ्य
- पूरा नाम: श्रीराम शंकर अभयंकर (Shreeram Shankar Abhyankar)
- जन्म: 22 जुलाई 1930, उज्जैन, मध्य प्रदेश
- निधन: 2 नवंबर 2012
- क्षेत्र: बीजगणितीय ज्यामिति और सिंगुलैरिटी सिद्धांत
- प्रमुख पहचान: Abhyankar’s Conjecture
- शैक्षणिक संस्थान: पर्ड्यू विश्वविद्यालय; हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पीएचडी
श्रीराम शंकर अभयंकर का जीवन याद दिलाता है कि गणित की सबसे अमूर्त समस्याओं पर किया गया धैर्यपूर्ण शोध भी मानव ज्ञान की सीमाओं को आगे बढ़ा सकता है।

