डेस्क: जम्मू-कश्मीर से Article 370 और अनुच्छेद 35A को निष्प्रभावी किए जाने के सात साल पूरे हो गए हैं। 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने यह ऐतिहासिक फैसला लिया था, जिसे देश की राजनीति और जम्मू-कश्मीर के भविष्य के लिहाज से एक बड़ा मोड़ माना गया। सात वर्षों बाद सरकार का दावा है कि घाटी में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हुई है, आतंकवाद और पत्थरबाजी की घटनाओं में उल्लेखनीय गिरावट आई है, जबकि विकास और निवेश की रफ्तार भी पहले के मुकाबले तेज हुई है।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 से 2025 के बीच जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी घटनाओं में करीब 77 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। इस अवधि में आतंकी घटनाओं की संख्या 151 से घटकर 35 रह गई। सुरक्षा अभियानों के दौरान मारे गए आतंकवादियों की संख्या भी 193 से घटकर 46 हो गई, जबकि सुरक्षा बलों के शहीद होने के मामलों में भी कमी दर्ज की गई। सरकार का कहना है कि यह बदलाव सुरक्षा एजेंसियों की बेहतर रणनीति, खुफिया तंत्र की मजबूती और लगातार चलाए गए आतंकवाद विरोधी अभियानों का परिणाम है।
अगर लंबे समय के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2009 से 4 अगस्त 2019 तक जम्मू-कश्मीर में 1,435 आतंकी घटनाएं दर्ज हुई थीं। इस दौरान 382 नागरिकों और 672 सुरक्षा कर्मियों की जान गई थी। वहीं, 5 अगस्त 2019 से 1 अगस्त 2026 तक 652 आतंकी घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 191 नागरिकों और 213 सुरक्षा कर्मियों की मौत हुई। इसी अवधि में 858 आतंकवादी मारे गए। इन आंकड़ों को सरकार आतंकवाद के प्रभाव क्षेत्र और उसकी क्षमता में आई कमी का संकेत मान रही है।
सुरक्षा के मोर्चे पर सबसे बड़ा बदलाव पत्थरबाजी की घटनाओं में देखने को मिला है। आधिकारिक दावों के अनुसार, अगस्त 2019 के बाद घाटी में पत्थरबाजी की घटनाओं में लगभग 90 प्रतिशत की कमी आई है। एक समय सुरक्षा बलों पर पथराव और हिंसक विरोध प्रदर्शन जम्मू-कश्मीर की पहचान बन चुके थे, लेकिन अब ऐसी घटनाएं पहले की तुलना में काफी कम देखने को मिल रही हैं।
सरकार का यह भी कहना है कि सुरक्षा माहौल बेहतर होने का असर विकास पर पड़ा है। सड़क, रेलवे, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में कई नई परियोजनाओं पर तेजी से काम हुआ है। रिकॉर्ड संख्या में पर्यटकों के घाटी पहुंचने, निवेश प्रस्तावों में बढ़ोतरी और बुनियादी ढांचे के विस्तार को भी इस बदलाव की अहम उपलब्धियों के रूप में पेश किया जा रहा है।
हालांकि, अनुच्छेद 370 को लेकर राजनीतिक बहस अब भी जारी है। विपक्षी दलों और जम्मू-कश्मीर के कई क्षेत्रीय नेताओं का कहना है कि सुरक्षा और विकास के साथ-साथ लोकतांत्रिक अधिकारों, पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने और स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है। उनका मानना है कि जम्मू-कश्मीर की स्थायी शांति और समग्र विकास के लिए राजनीतिक प्रक्रिया को और मजबूत करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
सात साल बाद यह स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा और विकास के कई संकेतकों में बदलाव देखने को मिला है। वहीं, राजनीतिक और संवैधानिक मुद्दों पर बहस अभी भी जारी है। ऐसे में आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सुरक्षा, विकास और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बीच संतुलन किस तरह आगे बढ़ता है।