23 अक्टूबर 1942 को द्वितीय विश्व युद्ध के उत्तरी अफ्रीकी मोर्चे पर ब्रिटिश नेतृत्व वाली मित्र राष्ट्रों की सेना ने द्वितीय अल अलामीन के युद्ध का निर्णायक चरण शुरू किया। मिस्र के भूमध्यसागरीय तट के निकट अल अलामीन के आसपास लड़ा गया यह संघर्ष जर्मन जनरल एरविन रोमेल की जर्मन-इतालवी सेना और मित्र राष्ट्रों के बीच था। यह लड़ाई उत्तरी अफ्रीका में युद्ध की दिशा बदलने वाली प्रमुख घटनाओं में गिनी जाती है।
उत्तरी अफ्रीका का रणनीतिक महत्व
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उत्तरी अफ्रीका पर नियंत्रण केवल क्षेत्रीय प्रभुत्व का सवाल नहीं था। भूमध्य सागर, स्वेज नहर और मध्य पूर्व के तेल संसाधनों तक पहुंच के कारण यह इलाका रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण था। स्वेज नहर ब्रिटेन और उसके साम्राज्य के बीच समुद्री संपर्क का अहम मार्ग थी। धुरी राष्ट्रों की सेनाएं मिस्र की ओर बढ़कर मित्र राष्ट्रों की आपूर्ति और संचार व्यवस्था को खतरे में डाल सकती थीं।
1942 के मध्य में रोमेल की सेना मिस्र में आगे बढ़ी, लेकिन अल अलामीन के पास उसे सीमित मोर्चे और कठिन आपूर्ति परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। जुलाई 1942 में इसी क्षेत्र में पहले अल अलामीन का युद्ध हुआ था, जिसमें मित्र राष्ट्रों ने धुरी सेनाओं की आगे बढ़ने की गति रोक दी। इसके बाद दोनों पक्षों ने नए हमले और बचाव की तैयारी की।
23 अक्टूबर की रात: ऑपरेशन लाइटफुट
मित्र राष्ट्रों के कमांडर जनरल बर्नार्ड लॉ मॉन्टगोमरी के नेतृत्व में 23 अक्टूबर 1942 की रात बड़े पैमाने पर हमला शुरू हुआ। इस अभियान को ऑपरेशन लाइटफुट नाम दिया गया। तोपखाने की भारी गोलाबारी के बाद पैदल सेना और इंजीनियरों ने धुरी राष्ट्रों की रक्षात्मक पंक्तियों में रास्ते बनाने की कोशिश की, ताकि बाद में टैंक और अन्य बख्तरबंद वाहन आगे बढ़ सकें।

धुरी सेनाओं ने रेगिस्तानी इलाके में बारूदी सुरंगों, तोपों और मजबूत रक्षात्मक ठिकानों का इस्तेमाल किया था। सुरंगों से भरे क्षेत्रों में सुरक्षित रास्ते बनाना कठिन था और हमले की गति कई जगह धीमी रही। शुरुआती दिनों में मित्र राष्ट्रों को अपेक्षित तेज सफलता नहीं मिली, लेकिन उनकी संख्या, तोपखाने और आपूर्ति क्षमता ने धीरे-धीरे दबाव बढ़ाया।
मॉन्टगोमरी और रोमेल की सेनाओं के बीच संघर्ष
मित्र राष्ट्रों की आठवीं सेना में ब्रिटिश सैनिकों के साथ-साथ ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, भारत और अन्य देशों की इकाइयां शामिल थीं। दूसरी ओर जर्मन अफ्रीका कोर और इतालवी इकाइयां धुरी राष्ट्रों की ओर से लड़ रही थीं। दोनों पक्षों को रेगिस्तान की कठोर परिस्थितियों, ईंधन और गोला-बारूद की कमी तथा लंबी आपूर्ति लाइनों से जूझना पड़ा।
रोमेल उस समय स्वास्थ्य कारणों से मोर्चे से दूर थे और कुछ समय बाद लौटे। धुरी सेनाओं की आपूर्ति समुद्री और हवाई मार्गों पर मित्र राष्ट्रों के हमलों से भी प्रभावित थी। इसके विपरीत, मित्र राष्ट्रों को अपेक्षाकृत बेहतर रसद और अधिक संसाधनों का लाभ मिला। फिर भी यह लड़ाई आसान नहीं थी; कई दिनों तक लगातार हमले, जवाबी हमले और भारी नुकसान जारी रहा।
ऑपरेशन सुपरचार्ज और धुरी सेनाओं की वापसी
पहले हमले के बाद मित्र राष्ट्रों ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए नवंबर की शुरुआत में ऑपरेशन सुपरचार्ज शुरू किया। 2 नवंबर के आसपास धुरी सेनाओं की रक्षात्मक स्थिति टूटने लगी। ईंधन और अन्य आपूर्ति की कमी तथा बढ़ते सैन्य दबाव के कारण रोमेल ने पीछे हटने का निर्णय लिया। जर्मन-इतालवी सेना का पीछे हटना आगे चलकर उत्तरी अफ्रीका में धुरी राष्ट्रों की स्थिति के लिए गंभीर झटका साबित हुआ।

द्वितीय अल अलामीन का युद्ध सामान्यतः 23 अक्टूबर से 11 नवंबर 1942 तक चला माना जाता है। मित्र राष्ट्रों की जीत ने मिस्र की ओर धुरी सेनाओं की बढ़त रोक दी और उन्हें पश्चिम की ओर पीछे हटने पर मजबूर किया। उसी वर्ष नवंबर में मित्र राष्ट्रों का ऑपरेशन टॉर्च उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका में शुरू हुआ, जिससे धुरी सेनाओं पर दो दिशाओं से दबाव बढ़ा।
युद्ध के परिणाम और ऐतिहासिक महत्व
- मिस्र की रक्षा: मित्र राष्ट्रों ने स्वेज नहर और मिस्र पर धुरी राष्ट्रों के संभावित खतरे को कम किया।
- रणनीतिक मोड़: उत्तरी अफ्रीका में धुरी सेनाओं की पहल कमजोर हुई और मित्र राष्ट्रों को आगे बढ़ने का अवसर मिला।
- आपूर्ति का महत्व: युद्ध ने दिखाया कि आधुनिक युद्ध में ईंधन, गोला-बारूद, परिवहन और संचार की निरंतर आपूर्ति कितनी निर्णायक होती है।
- बहुराष्ट्रीय योगदान: मित्र राष्ट्रों की जीत में ब्रिटिश सेना के साथ कई राष्ट्रों की इकाइयों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इतिहास की व्यापक तस्वीर
द्वितीय अल अलामीन की जीत अकेले द्वितीय विश्व युद्ध का अंत तय नहीं करती थी, लेकिन इसने उत्तरी अफ्रीका में सैन्य संतुलन बदलने में बड़ी भूमिका निभाई। इसे अक्सर 1942 के उन निर्णायक मोड़ों में गिना जाता है, जिनसे धुरी राष्ट्रों की विस्तारवादी बढ़त रुकने लगी। 23 अक्टूबर 1942 को शुरू हुआ यह अभियान रणनीति, सैन्य नेतृत्व, संसाधनों और सहयोगी सेनाओं के संयुक्त प्रयास का महत्वपूर्ण उदाहरण बना हुआ है।
