3 नवंबर 1688 को जन्मे महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय भारतीय इतिहास के ऐसे शासक थे, जिनकी पहचान केवल राजसत्ता और कूटनीति तक सीमित नहीं रही। वे आमेर के राजा, योजनाबद्ध नगर जयपुर के संस्थापक, खगोलशास्त्र के संरक्षक और विज्ञान में गहरी रुचि रखने वाले विद्वान शासक थे। उन्होंने शासन, नगर नियोजन, स्थापत्य और खगोलीय अध्ययन को एक-दूसरे से जोड़ते हुए ऐसी विरासत बनाई, जिसका प्रभाव आज भी राजस्थान और भारत की सांस्कृतिक पहचान में दिखाई देता है।
जन्म और आमेर के राजघराने में प्रारंभिक जीवन
सवाई जयसिंह द्वितीय का जन्म 3 नवंबर 1688 को आमेर के कछवाहा राजघराने में हुआ था। उनके पिता राजा बिशन सिंह आमेर के शासक थे। जयसिंह का बचपन ऐसे राजनीतिक वातावरण में बीता, जहां मुगल साम्राज्य की शक्ति, राजपूत राज्यों के संबंध और क्षेत्रीय सत्ता-संतुलन शासन की दिशा तय करते थे।
पिता के निधन के बाद 1699 में कम आयु में ही जयसिंह आमेर की गद्दी पर बैठे। लंबे शासनकाल में उन्होंने बदलती मुगल राजनीति के बीच अपने राज्य के हितों की रक्षा करने और राजनयिक संबंधों को साधने का प्रयास किया। वे प्रशासनिक दक्षता के साथ-साथ गणित, वास्तुकला और खगोलशास्त्र में भी रुचि रखते थे।
कूटनीति और राजनीतिक भूमिका
18वीं शताब्दी की शुरुआत में मुगल साम्राज्य के भीतर सत्ता-संघर्ष और प्रांतीय शक्तियों के उभार ने राजपूत शासकों के सामने कई चुनौतियां खड़ी कीं। जयसिंह ने मुगल दरबार के साथ संबंध बनाए रखे और विभिन्न राजनीतिक परिस्थितियों में अपनी रणनीति के अनुसार भूमिका निभाई। वे सैन्य अभियानों और प्रशासनिक जिम्मेदारियों से भी जुड़े रहे।

उनकी राजनीति को केवल एक दरबार या शासक के साथ स्थायी निष्ठा के रूप में नहीं देखा जा सकता। उस दौर में क्षेत्रीय हित, साम्राज्य की बदलती परिस्थितियां और राजपूत राज्यों की स्वायत्तता के प्रश्न लगातार बदलते रहते थे। जयसिंह की कूटनीतिक क्षमता इसी जटिल राजनीतिक परिदृश्य में सामने आई।
जयपुर शहर की स्थापना
सवाई जयसिंह द्वितीय की सबसे प्रसिद्ध उपलब्धियों में 1727 में जयपुर शहर की स्थापना शामिल है। आमेर की भौगोलिक सीमाओं, बढ़ती आबादी, जल और व्यापार से जुड़ी जरूरतों तथा प्रशासनिक विस्तार को देखते हुए उन्होंने एक नए नगर की योजना बनवाई। जयपुर को योजनाबद्ध ढंग से विकसित किया गया, जिसमें चौड़ी सड़कें, बाजार, चौक और व्यवस्थित आवासीय क्षेत्र शामिल थे।
नगर नियोजन में वास्तु, गणित और स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों पर ध्यान दिया गया। इस योजना से जुड़े प्रमुख वास्तुकार और नगर नियोजक विद्याधर भट्टाचार्य थे, जिन्होंने जयसिंह के संरक्षण में शहर की रूपरेखा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जयपुर का नियोजित ढांचा उस समय के भारतीय नगर निर्माण की उल्लेखनीय मिसाल बना।
शहर को बाद में गुलाबी रंग के कारण ‘पिंक सिटी’ के नाम से लोकप्रिय पहचान मिली। यह रंग-परंपरा 19वीं शताब्दी में विकसित हुई, इसलिए जयपुर की स्थापना और उसके गुलाबी शहर के रूप में प्रसिद्ध होने की ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को अलग-अलग समझना चाहिए। आज जयपुर राजस्थान की राजधानी और भारत के प्रमुख सांस्कृतिक एवं पर्यटन केंद्रों में से एक है।

खगोलशास्त्र के प्रति गहरी रुचि
जयसिंह द्वितीय की रुचि खगोलशास्त्र और गणित में विशेष थी। उस समय खगोलीय गणनाओं का उपयोग पंचांग निर्माण, समय निर्धारण, ग्रहों की स्थिति और धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए किया जाता था। उपलब्ध खगोलीय सारणियों और गणनाओं में अंतर को समझने के लिए उन्होंने विभिन्न परंपराओं और विद्वानों के कार्यों का अध्ययन कराया।
उन्होंने भारतीय खगोलशास्त्रीय परंपरा के साथ-साथ इस्लामी और यूरोपीय खगोलीय ज्ञान में भी रुचि ली। उनके दरबार में विद्वानों ने गणनाओं, प्रेक्षणों और खगोलीय सारणियों पर काम किया। इसी बौद्धिक परियोजना से जुड़ी ज़ीज़-ए-मुहम्मद शाही (Zij-i Muhammad Shahi) नामक खगोलीय सारणी तैयार कराई गई, जिसका उद्देश्य खगोलीय स्थितियों की गणना को अधिक उपयोगी और व्यवस्थित बनाना था।
जंतर-मंतर वेधशालाओं का निर्माण
खगोलीय प्रेक्षणों को बेहतर बनाने के लिए सवाई जयसिंह द्वितीय ने विशाल खगोलीय यंत्रों वाली वेधशालाओं का निर्माण कराया। इन्हें जंतर-मंतर के नाम से जाना जाता है। दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में उनकी परियोजना से जुड़ी वेधशालाएं स्थापित की गईं। इन स्थानों पर सूर्य की स्थिति, समय, खगोलीय निर्देशांकों और ग्रहों की गति से संबंधित प्रेक्षण करने के लिए अलग-अलग यंत्र बनाए गए।
जयपुर का जंतर-मंतर इन वेधशालाओं में सबसे विशाल और अच्छी तरह संरक्षित परिसरों में गिना जाता है। यहां स्थित सम्राट यंत्र जैसे उपकरण सूर्य की छाया के आधार पर समय और खगोलीय मापों का अध्ययन करने के लिए बनाए गए थे। इन यंत्रों का आकार और स्थापत्य उस दौर में प्रेक्षण-आधारित विज्ञान को दिए गए महत्व को दर्शाता है।

जयपुर का जंतर-मंतर 2010 में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। इसे 18वीं शताब्दी के खगोलीय प्रेक्षण, वैज्ञानिक उपकरणों और स्थापत्य के असाधारण उदाहरण के रूप में मान्यता मिली।
विज्ञान, स्थापत्य और ज्ञान का संगम
सवाई जयसिंह द्वितीय की परियोजनाओं की खासियत यह थी कि उनमें वैज्ञानिक जिज्ञासा और व्यावहारिक शासन की जरूरतें साथ दिखाई देती हैं। जयपुर का नगर नियोजन गणितीय सोच और प्रशासनिक आवश्यकताओं से जुड़ा था, जबकि वेधशालाएं समय और खगोलीय घटनाओं के व्यवस्थित अध्ययन का प्रयास थीं। उनके संरक्षण में विभिन्न भाषाओं और ज्ञान परंपराओं के विद्वानों को काम करने का अवसर मिला।
उनकी वेधशालाओं को आधुनिक दूरबीन-आधारित खगोल विज्ञान के समान नहीं समझना चाहिए। वे मुख्यतः नग्न आंखों से किए जाने वाले प्रेक्षणों और विशाल स्थिर यंत्रों पर आधारित थीं। फिर भी अपने समय में इनका पैमाना, डिजाइन और ज्ञान-संग्रह का उद्देश्य उल्लेखनीय था।
निधन और ऐतिहासिक विरासत
सवाई जयसिंह द्वितीय का निधन 1743 में हुआ। उनके बाद भी जयपुर एक महत्वपूर्ण राजनैतिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित होता रहा। उनके द्वारा स्थापित शहर, जंतर-मंतर की वेधशालाएं और विद्वानों को दिया गया संरक्षण उनके बहुआयामी व्यक्तित्व की याद दिलाते हैं।

जयसिंह की विरासत का मूल्यांकन करते समय उन्हें केवल एक नगर के संस्थापक या खगोलशास्त्र के संरक्षक के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। वे ऐसे शासक थे जिन्होंने राजनीतिक कूटनीति, प्रशासन, वास्तुकला और वैज्ञानिक जिज्ञासा को अपने शासन की व्यापक दृष्टि में स्थान दिया।
3 नवंबर: दूरदर्शी शासक और विज्ञान-प्रेमी महाराजा का स्मरण
महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय का जन्मदिवस भारतीय इतिहास में उस परंपरा को याद करने का अवसर है, जिसमें सत्ता और ज्ञान का संबंध स्थापित करने का प्रयास किया गया। 1727 में जयपुर की स्थापना और जंतर-मंतर वेधशालाओं का निर्माण उनकी दूरदर्शिता, वैज्ञानिक रुचि और सांस्कृतिक संरक्षण के प्रमाण हैं। उनकी उपलब्धियां आज भी नगर नियोजन, स्थापत्य और खगोल विज्ञान के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।
