मॉस्को/वॉशिंगटन: रूस और अमेरिका के बीच हालिया डीजल आपूर्ति समझौते के बाद आर्थिक सहयोग के नए क्षेत्रों पर बातचीत की खबर सामने आई है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के निवेश दूत किरिल दिमित्रिएव के अनुसार, दोनों देश ऐसे संयुक्त प्रोजेक्ट पर शुरुआती चर्चा कर रहे हैं जिनमें परमाणु ऊर्जा से संचालित डेटा सेंटर भी शामिल हो सकते हैं। अभी इन प्रस्तावों के लिए किसी अंतिम समझौते या ठोस परियोजना की सार्वजनिक पुष्टि नहीं हुई है।
परमाणु ऊर्जा से डेटा सेंटर चलाने का प्रस्ताव
दिमित्रिएव ने 16 अक्टूबर को मॉस्को में Russian Energy Week के दौरान कहा कि रूस और अमेरिका डेटा सेंटरों के क्षेत्र में संयुक्त काम पर विचार कर रहे हैं। उनके बयान के मुताबिक, कुछ सुविधाओं को रूसी और अमेरिकी डेटा सेंटर परियोजनाओं के रूप में विकसित करने तथा छोटे परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से बिजली उपलब्ध कराने की संभावना पर चर्चा हुई है।
डेटा सेंटरों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्लाउड कंप्यूटिंग और बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म के संचालन के लिए भारी मात्रा में बिजली चाहिए। परमाणु ऊर्जा लगातार बिजली उपलब्ध कराने का एक विकल्प मानी जाती है, लेकिन ऐसे प्रोजेक्ट के लिए तकनीकी योजना, सुरक्षा मानक, निवेश, नियामकीय मंजूरी और ऊर्जा आपूर्ति की शर्तों पर स्पष्टता जरूरी होगी।
डीजल समझौते के बाद बढ़ी आर्थिक चर्चा
यह पहल ऐसे समय सामने आई है जब अमेरिका और रूस ने डीजल आपूर्ति को लेकर समझौता किया है। Business Today की रिपोर्ट के अनुसार, इस व्यवस्था का उद्देश्य बाजार में ईंधन की उपलब्धता बढ़ाने और कीमतों पर दबाव कम करने में मदद करना है। रिपोर्ट में 300,000 टन से अधिक रूसी डीजल की आपूर्ति का उल्लेख किया गया है।

इस समझौते और संभावित डेटा सेंटर सहयोग को दोनों देशों के बीच आर्थिक संपर्क के नए संकेत के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, ऊर्जा व्यापार से आगे बढ़कर परमाणु ऊर्जा और डिजिटल अवसंरचना में संयुक्त परियोजना बनाना कहीं अधिक जटिल होगा।
अमेरिकी प्रतिबंध सबसे बड़ी बाधा
दिमित्रिएव ने स्वीकार किया कि रूस पर लागू अमेरिकी प्रतिबंध संभावित सहयोग के सामने गंभीर अड़चन हैं। उन्होंने Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act की आलोचना की, जो रूसी ऊर्जा राजस्व पर दबाव डालने के लिए प्रतिबंधों और शुल्कों का प्रावधान करता है। ऐसे माहौल में किसी भी परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए कानूनी अनुमति, भुगतान व्यवस्था और निर्यात नियंत्रण से जुड़े सवाल सुलझाने होंगे।
अमेरिकी सरकार या प्रमुख अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों की ओर से प्रस्तावित परमाणु-ऊर्जा आधारित डेटा सेंटरों की व्यवहार्यता, स्थान या कार्यान्वयन समयसीमा की कोई औपचारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। इसलिए फिलहाल इसे बातचीत के शुरुआती चरण में मौजूद विचार के रूप में ही देखना चाहिए, न कि तय हो चुकी परियोजना के रूप में।
AI की बढ़ती बिजली जरूरत और वैश्विक प्रतिस्पर्धा
AI मॉडल, डेटा स्टोरेज और क्लाउड सेवाओं के विस्तार से दुनिया भर में डेटा सेंटरों की बिजली मांग बढ़ रही है। बड़ी तकनीकी कंपनियां भरोसेमंद, लगातार उपलब्ध और अपेक्षाकृत कम-कार्बन ऊर्जा स्रोतों की तलाश कर रही हैं। परमाणु ऊर्जा इस बहस का एक हिस्सा है, लेकिन इसकी लागत, सुरक्षा, कचरा प्रबंधन और सार्वजनिक स्वीकार्यता जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं।

रूस-अमेरिका बातचीत यदि आगे बढ़ती है तो उसका असर ऊर्जा, डिजिटल अवसंरचना और भू-राजनीतिक संबंधों के संगम पर पड़ सकता है। फिर भी प्रतिबंधों, भुगतान व्यवस्था और दोनों सरकारों की मंजूरी को देखते हुए किसी ठोस नतीजे पर पहुंचना अभी जल्दबाजी होगी।
आगे क्या देखना होगा?
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दोनों पक्ष परियोजनाओं की औपचारिक सूची, संभावित साझेदारों, स्थान और निवेश मॉडल के बारे में कोई घोषणा करते हैं। जब तक ऐसी पुष्टि नहीं होती, परमाणु ऊर्जा से डेटा सेंटर चलाने का विचार संभावित सहयोग का संकेत तो है, लेकिन इसे अंतिम व्यावसायिक समझौता नहीं माना जा सकता।
