इतिहास | 6 नवंबर | बिहार का इतिहास | पटना
1763 में मीर कासिम और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच संघर्ष निर्णायक मोड़ पर पहुंचा। मेजर थॉमस एडम्स के नेतृत्व में कंपनी की सेना ने 6 नवंबर को पटना पर फिर से नियंत्रण स्थापित किया। इस घटना ने बंगाल-बिहार की सत्ता-संघर्ष की दिशा बदली और अगले वर्ष हुए बक्सर के युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की।
बिहार के आधुनिक इतिहास में 6 नवंबर 1763 एक महत्वपूर्ण तारीख है। इसी दिन ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने मेजर थॉमस एडम्स के नेतृत्व में पटना पर दोबारा नियंत्रण स्थापित किया। इस सैन्य कार्रवाई में बंगाल के तत्कालीन नवाब मीर कासिम की सेना को पराजय का सामना करना पड़ा और मीर कासिम को अवध की ओर हटना पड़ा। भारत सरकार के जनगणना विभाग की पटना जिला जनगणना पुस्तिका भी इस तारीख को मीर कासिम की हार और उनके अवध की ओर चले जाने के रूप में दर्ज करती है।
यह घटना केवल एक शहर पर अधिकार की लड़ाई नहीं थी। इसके पीछे ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक विशेषाधिकार, बंगाल के नवाब की संप्रभुता, राजस्व वसूली और स्थानीय प्रशासन पर नियंत्रण को लेकर गहरा टकराव था। 1763 का संघर्ष आगे चलकर 23 अक्टूबर 1764 के बक्सर युद्ध तक पहुंचा, जिसने उत्तर भारत की राजनीति और कंपनी की सत्ता को निर्णायक रूप से प्रभावित किया।

मीर कासिम और कंपनी के बीच बढ़ता टकराव
मीर कासिम 1760 में ईस्ट इंडिया कंपनी के समर्थन से बंगाल के नवाब बने थे। सत्ता संभालने के बाद उन्होंने प्रशासन और सेना को मजबूत करने, राजस्व व्यवस्था को व्यवस्थित करने तथा कंपनी के अधिकारियों के बढ़ते हस्तक्षेप को सीमित करने की कोशिश की। उन्होंने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानांतरित की। मुंगेर का किला और वहां की सैन्य तैयारियां उनकी स्वतंत्र राजनीतिक-सैन्य शक्ति के प्रतीक बन गईं।
कंपनी के साथ विवाद का बड़ा कारण आंतरिक व्यापार पर कर और दस्तक (व्यापारिक पास) का इस्तेमाल था। कंपनी के अधिकारी अपने निजी व्यापार को भी कर-मुक्त बताकर आगे बढ़ाते थे, जबकि भारतीय व्यापारियों को चुंगी और अन्य शुल्क देने पड़ते थे। इससे नवाब के राजस्व को नुकसान पहुंचता था और स्थानीय व्यापारियों के लिए असमान प्रतिस्पर्धा की स्थिति बनती थी। मीर कासिम ने इस असमानता को समाप्त करने के लिए आंतरिक व्यापारिक शुल्क हटा दिए, ताकि भारतीय व्यापारी भी बराबरी से व्यापार कर सकें। कंपनी के कलकत्ता परिषद ने इस कदम को अपने हितों के विरुद्ध माना।
राजस्व और व्यापार के विवाद ने जल्द ही राजनीतिक और सैन्य संघर्ष का रूप ले लिया। दोनों पक्षों के बीच बातचीत विफल हुई और 1763 में युद्ध छिड़ गया। कंपनी ने मीर कासिम को हटाकर मीर जाफर को फिर से नवाब बनाने का निर्णय भी लिया।
पटना पर पहला कब्जा और उसका वापस छिनना
1763 के संघर्ष में पटना पहले भी सैन्य कार्रवाई का केंद्र बना था। जून 1763 में कंपनी के पटना स्थित अधिकारी विलियम एलिस ने शहर पर कब्जा करने की कोशिश की और कुछ समय के लिए नियंत्रण हासिल किया। लेकिन मीर कासिम की सेना ने जवाबी कार्रवाई कर किले और शहर को वापस अपने अधिकार में ले लिया। इसलिए 6 नवंबर 1763 की घटना को पटना पर अंग्रेजों का पहला कब्जा कहना सही नहीं होगा; यह उस वर्ष के संघर्ष के दौरान कंपनी द्वारा शहर पर दोबारा नियंत्रण स्थापित करने की निर्णायक घटना थी।

इसी अवधि में कंपनी की सेना ने मीर कासिम के प्रमुख ठिकानों की ओर अभियान चलाया। मुंगेर का किला 1 अक्टूबर 1763 को अंग्रेजों के हाथ में चला गया। बिहार सरकार के मुंगेर जिला प्रशासन की ऐतिहासिक सामग्री के अनुसार, किले की घेराबंदी के बाद वहां के गवर्नर और सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया। मुंगेर के पतन ने मीर कासिम की सैन्य स्थिति को कमजोर कर दिया और पटना में बंदी बनाए गए अंग्रेजों के भविष्य को लेकर संकट गहरा गया।
पटना हत्याकांड और युद्ध की क्रूरता
मुंगेर के पतन के बाद मीर कासिम ने पटना में बंदी बनाए गए अंग्रेज अधिकारियों और अन्य यूरोपीय कैदियों की हत्या का आदेश दिया। इस घटना को इतिहास में ‘पटना हत्याकांड’ (Patna Massacre) के नाम से जाना जाता है। विभिन्न ऐतिहासिक विवरणों में बंदियों की संख्या और घटनाक्रम के कुछ विवरण अलग-अलग मिलते हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि अक्टूबर 1763 में बड़ी संख्या में बंदी मारे गए। इस घटना ने कंपनी के सैन्य अभियान को और कठोर बना दिया।
पटना जिला जनगणना पुस्तिका इस हत्याकांड का उल्लेख करते हुए बताती है कि घटना की खबर मिलने पर मेजर एडम्स के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना तेजी से पटना की ओर बढ़ी और शहर की घेराबंदी की। इस संदर्भ में यह भी जरूरी है कि उस समय की हिंसा को केवल दो सेनाओं के बीच सामान्य युद्ध के रूप में न देखा जाए। व्यापारिक और राजनीतिक संघर्ष का भार सैनिकों के साथ-साथ शहर के नागरिकों, बंदियों और स्थानीय आबादी पर भी पड़ा।
6 नवंबर 1763: मेजर एडम्स की सेना ने पटना पर फिर नियंत्रण पाया
पटना की ओर बढ़ती कंपनी सेना का नेतृत्व मेजर थॉमस एडम्स कर रहे थे। जिला जनगणना पुस्तिका के अनुसार, शहर के आसपास घेराबंदी और संघर्ष के बाद 6 नवंबर 1763 को मीर कासिम पराजित हुए और अवध के वजीर के क्षेत्र की ओर चले गए। कोलकाता के दैनिक समाचारपत्र ‘द टेलीग्राफ’ ने भी अपनी ऐतिहासिक शृंखला में 6 नवंबर को पटना के ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में जाने और मीर कासिम के अवध की ओर भागने की तारीख के रूप में दर्ज किया है।

मीर कासिम के हटने के बाद कंपनी का प्रभाव पटना और बिहार के प्रशासन पर और मजबूत हुआ। हालांकि इस विजय का अर्थ यह नहीं था कि पूरे क्षेत्र में तत्काल शांति स्थापित हो गई। मीर कासिम ने अवध के नवाब-वजीर शुजा-उद-दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय से समर्थन प्राप्त किया। इस गठबंधन ने कंपनी के सामने एक बड़ी सैन्य चुनौती खड़ी की।
मेजर थॉमस एडम्स की भूमिका और अभियान का आगे का क्रम
मेजर थॉमस एडम्स 1763 के अभियान में कंपनी की सेना के प्रमुख कमांडर थे। उनके नेतृत्व में कंपनी की सेना ने कटवा, गिरिया और उदयनाला सहित कई मोर्चों पर मीर कासिम की सेनाओं से संघर्ष किया। मुंगेर और पटना की घटनाओं ने उनके अभियान को बंगाल और बिहार में कंपनी की स्थिति मजबूत करने वाला बनाया। लेकिन एडम्स बक्सर के युद्ध तक जीवित नहीं रहे। ऐतिहासिक जीवनी-संदर्भों में उनका निधन जनवरी 1764 में दर्ज है। इसलिए 1764 के बक्सर युद्ध को उनके नेतृत्व में लड़ा गया बताना गलत होगा।
एडम्स के बाद कंपनी की सैन्य कमान में बदलाव हुआ। अगले वर्ष जब मीर कासिम, शुजा-उद-दौला और शाह आलम द्वितीय की संयुक्त शक्ति कंपनी के विरुद्ध आगे बढ़ी, तब संघर्ष का निर्णायक चरण बक्सर के मैदान में सामने आया।
बक्सर का युद्ध: 1763 की घटनाओं का बड़ा परिणाम
23 अक्टूबर 1764 को बक्सर में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने मीर कासिम, अवध के नवाब-वजीर शुजा-उद-दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय से जुड़े गठबंधन को पराजित किया। कंपनी की सेना का नेतृत्व मेजर हेक्टर मुनरो कर रहे थे। यह युद्ध भारतीय उपमहाद्वीप में कंपनी की राजनीतिक-सैन्य शक्ति के विस्तार का निर्णायक मोड़ बना। इसके बाद 1765 की इलाहाबाद संधि और बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा की दीवानी मिलने की प्रक्रिया ने कंपनी को राजस्व और प्रशासन पर व्यापक अधिकार दिलाए।

इस तरह 6 नवंबर 1763 को पटना पर कंपनी का पुनः नियंत्रण, बक्सर के युद्ध से लगभग एक वर्ष पहले की घटना थी। इसे बक्सर की विजय का सीधा पर्याय नहीं, बल्कि उस व्यापक संघर्ष का महत्वपूर्ण पड़ाव समझना चाहिए जिसने कंपनी को पूर्वी भारत में सत्ता के केंद्र तक पहुंचाया।
बिहार के इतिहास में 6 नवंबर का महत्व
पटना पर 6 नवंबर 1763 को कंपनी का नियंत्रण स्थापित होना बिहार के इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसने स्थानीय सत्ता और औपनिवेशिक व्यापारिक शक्ति के बीच संघर्ष के परिणाम को स्पष्ट किया। मीर कासिम ने कंपनी के विशेषाधिकारों को चुनौती देकर प्रशासनिक स्वायत्तता और राजस्व अधिकारों की रक्षा करने का प्रयास किया था, लेकिन सैन्य पराजयों और सहयोगियों की तलाश ने उन्हें अंततः अवध की ओर जाने पर मजबूर किया।
इस घटना को याद करते समय केवल ब्रिटिश सैन्य सफलता पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। यह उस दौर की आर्थिक नीतियों, व्यापारिक असमानता, नवाबी सत्ता की सीमाओं और ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक विस्तार की कहानी भी है। पटना, मुंगेर और बक्सर—इन तीनों स्थानों से जुड़ी घटनाओं ने बिहार और पूरे पूर्वी भारत के इतिहास की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
