1 नवंबर 1973 भारतीय प्रशासनिक और भाषायी इतिहास की एक उल्लेखनीय तारीख है। इसी दिन मैसूर राज्य का आधिकारिक नाम बदलकर कर्नाटक किया गया। इसी तारीख से केंद्रशासित प्रदेश का नाम ‘लक्कादीव, मिनिकॉय और अमिंदिवी द्वीप’ बदलकर ‘लक्षद्वीप’ हुआ। दोनों बदलाव भारत के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की पहचान को उनके भौगोलिक, भाषायी और सांस्कृतिक संदर्भों के अनुरूप स्थापित करने की प्रक्रिया के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
मैसूर राज्य का नाम कर्नाटक क्यों रखा गया?
1 नवंबर 1956 को राज्यों के पुनर्गठन के बाद कन्नड़ भाषी क्षेत्रों को मिलाकर मैसूर राज्य का गठन किया गया था। इसमें पुराने मैसूर राज्य के अलावा बॉम्बे, हैदराबाद और मद्रास राज्यों के कन्नड़ भाषी क्षेत्र तथा कूर्ग का क्षेत्र शामिल हुआ। इस तरह राज्य की सीमाएं पुराने मैसूर रियासत के दायरे से कहीं अधिक विस्तृत हो गईं।
समय के साथ यह महसूस किया गया कि ‘मैसूर’ नाम पूरे राज्य की भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता को पर्याप्त रूप से व्यक्त नहीं करता। ‘कर्नाटक’ नाम का उपयोग व्यापक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान के रूप में होता रहा था। इसलिए राज्य का नाम बदलने की मांग उठी।
1 नवंबर 1973: कर्नाटक नाम आधिकारिक हुआ
मैसूर राज्य (नाम परिवर्तन) अधिनियम, 1973 के तहत राज्य का नाम बदलकर कर्नाटक किया गया। यह परिवर्तन 1 नवंबर 1973 से प्रभावी हुआ। इस प्रकार राज्य गठन दिवस के साथ जुड़ी 1 नवंबर की तारीख एक बार फिर ऐतिहासिक बनी—अब यह कर्नाटक राज्य के नाम की आधिकारिक शुरुआत का दिन भी थी।

नाम परिवर्तन का उद्देश्य राज्य के सभी कन्नड़ भाषी क्षेत्रों और वहां की साझा सांस्कृतिक पहचान को एक व्यापक नाम के अंतर्गत प्रस्तुत करना था। यह बदलाव राज्य की प्रशासनिक पहचान में महत्वपूर्ण था, हालांकि इससे राज्य की राजधानी, सीमाओं या शासन व्यवस्था में तत्काल कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं हुआ।
लक्कादीव, मिनिकॉय और अमिंदिवी द्वीपों का नाम लक्षद्वीप
इसी दिन एक अन्य महत्वपूर्ण नाम परिवर्तन प्रभावी हुआ। 1956 में गठित केंद्रशासित प्रदेश का नाम पहले ‘लक्कादीव, मिनिकॉय और अमिंदिवी द्वीप’ था। लक्षद्वीप (नाम परिवर्तन) अधिनियम, 1973 के माध्यम से इसका नाम बदलकर ‘लक्षद्वीप’ कर दिया गया और यह बदलाव 1 नवंबर 1973 से लागू हुआ।
यह द्वीपसमूह अरब सागर में केरल के पश्चिमी तट के निकट स्थित है। इसमें प्रवाल द्वीप, एटॉल और छोटे-छोटे द्वीप शामिल हैं। ‘लक्षद्वीप’ नाम संस्कृत मूल का है, जिसका सामान्य अर्थ ‘एक लाख द्वीप’ बताया जाता है। यह नाम द्वीपसमूह की विशिष्ट भौगोलिक पहचान को एक संक्षिप्त और व्यापक रूप देता है।
नाम परिवर्तन के पीछे प्रशासनिक और सांस्कृतिक संदर्भ
किसी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश का नाम केवल प्रशासनिक पहचान नहीं होता; वह वहां के इतिहास, भाषा, भूगोल और लोगों की सामूहिक स्मृति से भी जुड़ा होता है। कर्नाटक नाम ने पुराने मैसूर राज्य से आगे बढ़कर पूरे राज्य की पहचान को व्यक्त किया। इसी तरह लक्षद्वीप नाम ने अलग-अलग द्वीपों के पुराने प्रशासनिक नामों के स्थान पर पूरे द्वीपसमूह के लिए एक साझा नाम स्थापित किया।

दोनों बदलाव संसद द्वारा पारित कानूनों के माध्यम से किए गए। इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि भारत में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के नाम बदलना संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया के तहत होता है, न कि केवल स्थानीय घोषणा से।
1 नवंबर का दोहरा ऐतिहासिक महत्व
1 नवंबर कर्नाटक में राज्योत्सव या कन्नड़ राज्योत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह दिन राज्य के गठन और कन्नड़ भाषी क्षेत्रों के एकीकरण की स्मृति से जुड़ा है। 1973 से यह तारीख ‘कर्नाटक’ नाम की आधिकारिक पहचान का भी प्रतीक बन गई। दूसरी ओर, लक्षद्वीप के लिए भी 1 नवंबर 1973 नाम परिवर्तन की तारीख है।
इस प्रकार 1 नवंबर 1973 भारतीय संघ की क्षेत्रीय पहचान के इतिहास में एक विशेष दिन है। मैसूर से कर्नाटक और लक्कादीव, मिनिकॉय तथा अमिंदिवी द्वीपों से लक्षद्वीप तक का नाम परिवर्तन बताता है कि भारत की प्रशासनिक संरचना समय के साथ अपनी भाषायी, सांस्कृतिक और भौगोलिक विविधता को किस तरह अभिव्यक्त करती रही है।
