14 अक्टूबर विशेष | भारतीय राजनीति, स्वतंत्रता आंदोलन और पर्यावरण संरक्षण
जन्म: 14 फरवरी 1925 | निधन: 14 अक्टूबर 2013 | प्रमुख पहचान: स्वतंत्रता सेनानी, पूर्व केंद्रीय मंत्री, योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष, पर्यावरणविद और पद्म विभूषण सम्मानित समाजसेवी
भारत के सार्वजनिक जीवन में कुछ ऐसे व्यक्तित्व रहे हैं, जिन्होंने राजनीति को केवल सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे समाज और देश की सेवा का जरिया बनाया। मोहन धारिया उन्हीं लोगों में शामिल थे। स्वतंत्रता आंदोलन में युवावस्था से भाग लेने वाले धारिया ने आगे चलकर संसद, केंद्र सरकार और योजना आयोग में महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। लेकिन उनकी पहचान केवल एक पूर्व केंद्रीय मंत्री या प्रख्यात वकील तक सीमित नहीं रही। पर्यावरण संरक्षण, जल संचयन, वनीकरण और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में उनके काम ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई।
14 अक्टूबर 2013 को पुणे में उनका निधन हुआ। उनके निधन पर तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने शोक व्यक्त किया। राष्ट्रपति ने उन्हें एक विशिष्ट सांसद, सक्षम प्रशासक, समर्पित पर्यावरणविद और किसानों के अधिकारों का समर्थक बताया। प्रधानमंत्री ने भी राष्ट्र निर्माण तथा विकास नीति में उनके योगदान को याद किया।

मोहन धारिया को वर्ष 2005 में भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। उनके जीवन की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से शुरू हुई अपनी सार्वजनिक यात्रा को पर्यावरण और ग्रामीण समाज के कल्याण तक पहुंचाया। उनकी कहानी राजनीति, लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रकृति के साथ संतुलित विकास की जरूरत को एक साथ समझने का अवसर देती है।
महाराष्ट्र के नाते गांव में जन्म, वकालत से पहले चुना देश की आजादी का रास्ता
मोहन माणिकचंद धारिया का जन्म 14 फरवरी 1925 को महाराष्ट्र के तत्कालीन कोलाबा जिले के नाते गांव में हुआ था। यह क्षेत्र आज रायगढ़ जिले का हिस्सा है। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा महाराष्ट्र में प्राप्त की और आगे की पढ़ाई के लिए पुणे पहुंचे। उन्होंने फर्ग्यूसन कॉलेज तथा कानून की पढ़ाई से जुड़े संस्थानों में शिक्षा प्राप्त की। आगे चलकर उन्होंने वकालत को अपना पेशा बनाया, लेकिन उनके जीवन की दिशा युवावस्था में ही बदलने लगी थी।
1942 में जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन ने देशभर में जोर पकड़ा, तब धारिया भी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए। उस समय उनकी उम्र लगभग 17 वर्ष थी। ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआत संघर्ष के साथ हुई। उनके जीवन संबंधी विवरणों में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गिरफ्तारी और भूमिगत रहकर काम करने का भी उल्लेख मिलता है।
आजादी की लड़ाई में भाग लेने का अनुभव उनके राजनीतिक दृष्टिकोण का महत्त्वपूर्ण आधार बना। उनके लिए सार्वजनिक जीवन का अर्थ केवल पद हासिल करना नहीं, बल्कि लोगों की समस्याओं को समझना और उनके समाधान के लिए काम करना था। यही सोच आगे चलकर उनके संसदीय कार्यों और ग्रामीण विकास से जुड़े प्रयासों में भी दिखाई दी।

वकील से जनप्रतिनिधि बनने तक का सफर
स्वतंत्रता आंदोलन के बाद मोहन धारिया ने कानून और राजनीति, दोनों क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। वह मुंबई उच्च न्यायालय में वकालत से जुड़े रहे और श्रमिक संगठनों के साथ भी काम किया। उनके सार्वजनिक जीवन में मजदूरों, किसानों और आम लोगों के हितों से जुड़े प्रश्न महत्त्वपूर्ण रहे।
वर्ष 1957 से 1960 तक वह पुणे नगर निगम के सदस्य रहे। इस दौरान उन्होंने स्थानीय प्रशासन और शहरी नागरिक सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर काम किया। बाद में वह महाराष्ट्र की राजनीति से आगे बढ़कर राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचे।
1964 में वह पहली बार राज्यसभा के सदस्य बने और 1970 में दोबारा उच्च सदन पहुंचे। इसके बाद 1971 में पुणे लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे। इस तरह उन्हें संसदीय राजनीति के दोनों सदनों में काम करने का अनुभव मिला।
संसद में उनकी भूमिका ऐसे समय में विकसित हुई, जब भारत औद्योगीकरण, कृषि विकास, रोजगार और आर्थिक नियोजन से जुड़े बड़े सवालों पर काम कर रहा था। धारिया ने अपने राजनीतिक जीवन में इन विषयों को महत्त्व दिया और आगे चलकर केंद्र सरकार में विभिन्न जिम्मेदारियां संभालीं।

केंद्र सरकार में मंत्री और योजना आयोग में महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी
मोहन धारिया ने केंद्र सरकार में कई महत्त्वपूर्ण पदों पर काम किया। मई 1971 से अक्टूबर 1974 तक वह योजना मंत्रालय में राज्य मंत्री रहे। इसके बाद अक्टूबर 1974 से मार्च 1975 तक उन्होंने निर्माण एवं आवास मंत्रालय में राज्य मंत्री की जिम्मेदारी संभाली।
1977 में जनता पार्टी के दौर में वह फिर पुणे से लोकसभा पहुंचे और मोरारजी देसाई सरकार में केंद्रीय वाणिज्य मंत्री बने। वाणिज्य मंत्रालय की जिम्मेदारी ऐसे समय में उनके पास आई, जब भारत की अर्थव्यवस्था, घरेलू उद्योग और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को लेकर कई महत्त्वपूर्ण नीतिगत प्रश्न सामने थे। उन्होंने 1977 से 1979 तक इस पद पर काम किया।
इसके बाद 1990 में उन्हें योजना आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। वह दिसंबर 1990 से जून 1991 तक इस पद पर रहे। यह भारत की आर्थिक नीतियों के लिहाज से एक महत्त्वपूर्ण दौर था, क्योंकि देश जल्द ही व्यापक आर्थिक संकट और 1991 के आर्थिक सुधारों की ओर बढ़ रहा था।
उनकी प्रशासनिक भूमिका को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनके निधन पर कहा था कि धारिया ने देश की विकास नीति के निर्माण को प्रभावित किया था। यह प्रशंसा उनके सार्वजनिक जीवन में आर्थिक नियोजन और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के महत्त्व को रेखांकित करती है।

आपातकाल का विरोध और ‘यंग टर्क’ की पहचान
मोहन धारिया के राजनीतिक जीवन का एक उल्लेखनीय अध्याय 1975 में घोषित आपातकाल से जुड़ा है। इंदिरा गांधी सरकार के दौरान उन्होंने कुछ संवैधानिक और राजनीतिक कदमों का विरोध किया। आपातकाल लागू होने के बाद वह उन नेताओं में शामिल रहे, जिन्होंने सरकार के निर्णयों पर सवाल उठाए और लोकतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में आवाज उठाई। इस दौर में उन्हें भी हिरासत का सामना करना पड़ा।
कांग्रेस के भीतर उस समय कुछ नेताओं का समूह ऐसा था, जो पार्टी की परंपरागत नेतृत्व व्यवस्था से अलग होकर नीतियों पर खुलकर सवाल उठाता था। धारिया भी उन नेताओं में गिने जाते थे, जिन्हें ‘यंग टर्क’ कहा जाता था। इस समूह के नेताओं की पहचान पार्टी के भीतर सुधार, जवाबदेही और कुछ नीतिगत मुद्दों पर स्वतंत्र रुख अपनाने से जुड़ी थी।
आपातकाल का विरोध करने के बाद धारिया का कांग्रेस से संबंध टूट गया और आगे चलकर उन्होंने जनता पार्टी से जुड़कर राजनीतिक भूमिका निभाई। उनका यह कदम दिखाता है कि उनके सार्वजनिक जीवन में वैचारिक असहमति भी महत्त्वपूर्ण थी।
इस प्रसंग का ऐतिहासिक महत्त्व केवल किसी एक नेता के राजनीतिक निर्णय तक सीमित नहीं है। यह उस दौर की याद दिलाता है, जब भारत में नागरिक स्वतंत्रता, प्रेस की आजादी, विपक्ष की भूमिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता जैसे प्रश्न राष्ट्रीय बहस के केंद्र में थे।

सक्रिय राजनीति से आगे बढ़कर पर्यावरण संरक्षण की ओर
1980 के दशक में सक्रिय चुनावी राजनीति से दूरी बनाने के बाद मोहन धारिया ने पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास पर अपना ध्यान केंद्रित किया। महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त इलाकों में यात्रा के दौरान उन्होंने पानी की कमी, घटते वन क्षेत्र और ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों को करीब से देखा था। इन अनुभवों ने उन्हें प्रकृति संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बीच संबंधों पर काम करने के लिए प्रेरित किया।
उनका मानना था कि ग्रामीण विकास को केवल सड़क, भवन या आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं रखा जा सकता। भूमि, पानी, जंगल और स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी किसी गांव के भविष्य को प्रभावित करती है।
इसी सोच के आधार पर उन्होंने पर्यावरण और ग्रामीण विकास के लिए संगठनात्मक पहल की। इस काम का उद्देश्य केवल पेड़ लगाना नहीं था, बल्कि मिट्टी के कटाव को कम करना, जल संसाधनों को बचाना और गांवों की आजीविका को अधिक टिकाऊ बनाने के प्रयासों को बढ़ावा देना था।
उनके जीवन का यह चरण विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने सरकारी पदों पर काम करने के अनुभव को सामाजिक कार्यों में इस्तेमाल किया। वह ग्रामीण समस्याओं को केवल प्रशासनिक आंकड़ों के रूप में नहीं, बल्कि लोगों के दैनिक जीवन से जुड़े सवालों के रूप में देखते थे।

‘वनराई’ की स्थापना: पेड़, पानी और गांवों को बचाने की पहल
मोहन धारिया के सामाजिक जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में वनराई (Vanarai) की स्थापना शामिल है। उन्होंने 1986 में इस संस्था को औपचारिक रूप दिया। इसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण, वनीकरण, जल संचयन और ग्रामीण विकास को एक-दूसरे से जोड़ना था।
वनराई के काम के पीछे एक बुनियादी विचार था—गांवों की समस्याओं का समाधान स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और समुदाय की भागीदारी के बिना संभव नहीं है। यदि जंगल कम होंगे, मिट्टी का कटाव बढ़ेगा और पानी के स्रोत सूखेंगे, तो इसका असर खेती, पशुपालन और ग्रामीण परिवारों की आजीविका पर भी पड़ेगा।
इसीलिए संस्था ने पौधरोपण, जल संरक्षण, मिट्टी के कटाव को रोकने और ग्रामीण क्षेत्रों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने जैसे कार्यों को महत्त्व दिया। समय के साथ वनराई ने टिकाऊ ग्रामीण विकास की दिशा में भी काम किया। संस्था के अनुसार, उसके प्रयासों में जलग्रहण क्षेत्र का विकास और वर्षा के पानी को संरक्षित करने के उपाय शामिल हैं।
धारिया के लिए पर्यावरण संरक्षण केवल प्रकृति को सुंदर बनाने का प्रश्न नहीं था। इसका सीधा संबंध किसानों की उत्पादकता, पानी की उपलब्धता और गांवों में रोजगार के अवसरों से था। उनके विचार में प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करने से ग्रामीण समाज की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में भी मदद मिल सकती है।

वनराई की विरासत इसी दृष्टिकोण को सामने लाती है कि पर्यावरण और विकास को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय उनके बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
किसानों के अधिकार और ग्रामीण विकास की सोच
मोहन धारिया ने अपने राजनीतिक और सामाजिक जीवन में किसानों के हितों को विशेष महत्त्व दिया। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उनके निधन पर जारी शोक संदेश में उन्हें किसानों के अधिकारों का समर्थक और समर्पित पर्यावरणविद बताया था।
भारत में कृषि का भविष्य पानी, मिट्टी की गुणवत्ता, सिंचाई, बाजार और उत्पादन लागत जैसे अनेक कारकों पर निर्भर करता है। धारिया ने ग्रामीण विकास के प्रश्नों को पर्यावरण संरक्षण के साथ जोड़ने का प्रयास किया। उनके अनुसार, गांवों की समस्याओं का दीर्घकालीन समाधान प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी से जुड़ा था।
उनके काम का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह था कि वह सामाजिक विकास को केवल सरकारी योजनाओं पर निर्भर नहीं मानते थे। नागरिकों, स्वयंसेवी संगठनों और स्थानीय समुदायों की भूमिका भी उनके लिए महत्त्वपूर्ण थी।

आज भी जल संकट, भूजल के गिरते स्तर, वनों की कमी और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियां भारत के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों को प्रभावित करती हैं। ऐसे में धारिया के कार्यों को पढ़ना पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आजीविका के संबंध को समझने का अवसर देता है। हालांकि, उनके मॉडल की सफलता का मूल्यांकन करने के लिए किसी क्षेत्र विशेष के प्रमाणित आंकड़ों और परिणामों को देखना आवश्यक है।
पद्म विभूषण और अन्य सम्मान
मोहन धारिया को वर्ष 2005 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। यह भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। उन्हें यह सम्मान सार्वजनिक जीवन, सामाजिक कार्य और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में योगदान के लिए मिला।
उनकी उपलब्धियों का महत्त्व इस बात में था कि उन्होंने अपने जीवन के अलग-अलग चरणों में विभिन्न क्षेत्रों में काम किया। स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने से लेकर संसद और केंद्र सरकार में जिम्मेदारियां निभाने तक, उनका सार्वजनिक जीवन राजनीति से जुड़ा रहा। इसके बाद पर्यावरण और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में उनकी गतिविधियां जारी रहीं।
धारिया को वर्ष 2011 में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार भी दिया गया था। उनके राजनीतिक जीवन में कभी-कभी मतभेद और विरोधाभास भी सामने आए, लेकिन सार्वजनिक जीवन में उनके योगदान को विभिन्न अवसरों पर मान्यता मिली।

सम्मान किसी व्यक्ति के पूरे जीवन का अंतिम मूल्यांकन नहीं होते, फिर भी वे समाज की ओर से उसके कुछ योगदानों को पहचानने का माध्यम बनते हैं। धारिया के मामले में पद्म विभूषण उनके लंबे सार्वजनिक जीवन और सामाजिक कार्यों की राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता थी।
14 अक्टूबर 2013: पुणे में निधन और देशभर से श्रद्धांजलि
मोहन धारिया का निधन 14 अक्टूबर 2013 को पुणे के एक अस्पताल में हुआ। वह 88 वर्ष के थे। उनके निधन की खबर सामने आने के बाद देश के राजनीतिक और सामाजिक जीवन से जुड़े अनेक लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी उनके योगदान को याद किया।
प्रधानमंत्री के शोक संदेश में धारिया को ऐसा व्यक्ति बताया गया, जिन्होंने अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया और ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए काम किया। उनके संगठन वनराई के माध्यम से पर्यावरण और ग्रामीण विकास से जुड़े प्रयास उनके जीवन के अंतिम वर्षों तक जारी रहे।
उनकी मृत्यु के साथ भारतीय सार्वजनिक जीवन ने एक ऐसे नेता को खो दिया, जिसकी पहचान केवल किसी एक राजनीतिक दल या सरकारी पद से नहीं थी। उनका जीवन स्वतंत्रता आंदोलन, संसदीय लोकतंत्र, आर्थिक नियोजन और पर्यावरण संरक्षण जैसे अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ा था।

मोहन धारिया की विरासत आज भी क्यों प्रासंगिक है?
मोहन धारिया की कहानी आज के भारत के लिए कई महत्त्वपूर्ण सवाल छोड़ती है। पहला, राजनीति में रहते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों और नीतिगत असहमति को किस तरह महत्त्व दिया जाए। दूसरा, विकास की योजनाओं में पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों को कितना महत्त्व मिलना चाहिए। तीसरा, ग्रामीण समाज की समस्याओं को दूर करने में स्थानीय समुदायों की भागीदारी कैसे सुनिश्चित की जाए।
उनका जीवन यह भी दिखाता है कि सार्वजनिक सेवा केवल चुनाव जीतने या सरकारी पद पर रहने तक सीमित नहीं होती। राजनीति से हटने के बाद भी सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से लोगों के जीवन में बदलाव लाने का प्रयास किया जा सकता है।
आज जब जल संकट, पर्यावरणीय असंतुलन और ग्रामीण आजीविका पर चर्चा होती है, तब वनराई जैसी संस्थाओं के अनुभवों का अध्ययन उपयोगी हो सकता है। इसी तरह, आपातकाल के दौरान उनके विरोध को याद करना भारतीय लोकतंत्र के इतिहास और नागरिक स्वतंत्रताओं के महत्त्व को समझने में मदद करता है।
14 अक्टूबर को मोहन धारिया को याद करना एक ऐसे जनसेवक को स्मरण करना है, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर पर्यावरण संरक्षण तक अपनी सार्वजनिक यात्रा जारी रखी। उनकी विरासत का सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश यही है कि राष्ट्र निर्माण में राजनीतिक नेतृत्व, लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक भागीदारी और प्रकृति के संरक्षण—सभी की भूमिका होती है।

