28 अक्टूबर 1930 हिंदी सिनेमा के उन गीतकारों में गिने जाने वाले अंजान के जन्म की तारीख है, जिनकी रचनाओं ने लोकप्रिय फिल्म संगीत को अपनी अलग पहचान दी। उनका वास्तविक नाम लालजी पाण्डेय था। बनारस की सांस्कृतिक मिट्टी से जुड़े अंजान ने बोलचाल की सहज भाषा, लोक-रंग और भावनात्मक अभिव्यक्ति को गीतों में पिरोकर श्रोताओं के बीच खास जगह बनाई।
बनारस से हिंदी फिल्म जगत तक
अंजान का जन्म 28 अक्टूबर 1930 को वाराणसी में हुआ था। बनारस की लोक-संस्कृति, मुहावरे और जीवन की जीवंतता उनकी गीत-भाषा में कई बार दिखाई देती है। फिल्मी गीतों में उनकी खासियत यह थी कि वे कठिन शब्दों के बजाय सहज, याद रह जाने वाले बोलों के जरिए भाव और माहौल रचते थे। यही सरलता उनके गीतों को आम श्रोताओं के करीब ले आई।
‘खइके पान बनारस वाला’ से मिली अमर पहचान
अंजान के सबसे चर्चित गीतों में ‘खइके पान बनारस वाला’ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। फिल्म डॉन (1978) का यह गीत बनारसी अंदाज और मस्ती का लोकप्रिय प्रतीक बन गया। इसकी सफलता ने दिखाया कि स्थानीय रंग और बोलचाल की भाषा भी बड़े पर्दे पर देशव्यापी लोकप्रियता हासिल कर सकती है।
उनकी लेखनी केवल मस्ती और ठेठपन तक सीमित नहीं थी। अंजान ने अलग-अलग भावों और परिस्थितियों के अनुरूप गीत लिखे। ‘ओ साथी रे’, ‘यारी है ईमान मेरा’ और ‘अरे दीवानों, मुझे पहचानो’ जैसे गीतों को हिंदी फिल्म संगीत के यादगार गीतों में गिना जाता है। इन गीतों की लोकप्रियता में शब्दों की लय, भावों की स्पष्टता और संगीत के साथ उनका स्वाभाविक मेल अहम रहा।

लोकप्रियता के पीछे लेखन की खासियत
अंजान की गीत-रचना में आम आदमी की भाषा और भावनाओं को जगह मिलती थी। वे गीत के पात्र, कहानी और संगीत की प्रकृति के अनुरूप शब्द चुनते थे। कभी उनके बोल उत्सव और बेफिक्री का माहौल बनाते, तो कभी दोस्ती, प्रेम, निष्ठा या जीवन के संघर्ष को व्यक्त करते। इस विविधता ने उन्हें हिंदी सिनेमा के व्यस्त और प्रभावशाली गीतकारों में शामिल किया।
उनका योगदान इस बात का उदाहरण है कि फिल्मी गीत की ताकत केवल अलंकृत भाषा में नहीं, बल्कि सही भाव, यादगार लय और दर्शकों से जुड़ने वाले शब्दों में भी होती है। अंजान के कई गीत समय के साथ फिल्मों से आगे निकलकर लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बन गए।
हिंदी सिनेमा में विरासत
अंजान ने कई दशकों तक हिंदी फिल्मों के लिए गीत लिखे और अपने काम से फिल्म संगीत की दुनिया में विशिष्ट स्थान बनाया। उनका निधन 3 सितंबर 1997 को हुआ, लेकिन उनके लिखे गीत आज भी रेडियो, मंचीय प्रस्तुतियों और संगीत-प्रेमियों की यादों में जीवित हैं।
28 अक्टूबर को उनका जन्मदिन याद करना उस गीतकार को सम्मान देना है, जिसने बनारस की खुशबू और आम बोलचाल की जीवंतता को हिंदी सिनेमा के गीतों में जगह दी। अंजान की पहचान उनके नाम से अधिक उन गीतों में बसती है, जिन्हें पीढ़ियां सुनती और गुनगुनाती रही हैं।

