2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में जन्मे Lal Bahadur Shastri का जीवन सादगी, संघर्ष और सार्वजनिक जिम्मेदारी से जुड़ी कई घटनाओं के लिए याद किया जाता है। उनके पिता स्कूल शिक्षक थे और जब शास्त्री जी करीब डेढ़ वर्ष के थे, तभी उनका निधन हो गया था।
इसके बाद उनकी मां अपने बच्चों के साथ मायके चली गईं। प्रधानमंत्री कार्यालय के आधिकारिक जीवन परिचय में उनके शुरुआती जीवन और शिक्षा का यह विवरण दर्ज है।
गरीबी के बीच पढ़ाई और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ाव
छोटे शहर में पले-बढ़े लाल बहादुर शास्त्री का जीवन आसान नहीं था। पढ़ाई के लिए उन्हें वाराणसी जाना पड़ा। किशोरावस्था में ही वह स्वतंत्रता आंदोलन के विचारों से प्रभावित हुए। बाद में उन्होंने काशी विद्यापीठ में अध्ययन किया। यहीं से उन्हें ‘शास्त्री’ की उपाधि मिली, जो आगे चलकर उनके नाम का स्थायी हिस्सा बन गई।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई और ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलनों में हिस्सा लिया। आधिकारिक विवरण के अनुसार, स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा।
आजादी के बाद संभाली कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां
आजादी के बाद लाल बहादुर शास्त्री ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में जिम्मेदारियां संभालीं और बाद में केंद्र सरकार में भी कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों का दायित्व निभाया। वह रेल मंत्री, परिवहन एवं संचार मंत्री, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री और गृह मंत्री रहे।
लेकिन उनके राजनीतिक जीवन की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक रेल मंत्री पद से इस्तीफा देना रही।
रेल दुर्घटना के बाद दिया इस्तीफा
रेल मंत्री रहते हुए एक बड़ी रेल दुर्घटना में कई लोगों की मौत हुई। शास्त्री जी ने इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी महसूस करते हुए रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।
प्रधानमंत्री कार्यालय के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक, तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संसद में शास्त्री की ईमानदारी और उच्च आदर्शों की प्रशंसा की थी। नेहरू ने यह भी स्पष्ट किया था कि दुर्घटना के लिए शास्त्री को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार मानने के कारण नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा की एक मिसाल कायम करने के लिए उनका इस्तीफा स्वीकार किया गया।
यही घटना आज भी शास्त्री के सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही और नैतिक जिम्मेदारी के उदाहरण के तौर पर चर्चा में आती है।
1964 में बने देश के प्रधानमंत्री
जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद 9 जून 1964 को लाल बहादुर शास्त्री ने भारत के प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। उनका कार्यकाल करीब डेढ़ साल का रहा। इस दौरान देश को खाद्यान्न संकट और सुरक्षा से जुड़ी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
इसी दौर में उनका प्रसिद्ध नारा “जय जवान, जय किसान” सामने आया। यह नारा सैनिकों और किसानों की भूमिका को राष्ट्रीय जीवन में रेखांकित करता था। भारत सरकार के एक आधिकारिक संदर्भ में भी इसे 1965 के युद्ध और खाद्य संकट के दौर से जोड़ा गया है।
1965 के युद्ध में नेतृत्व
प्रधानमंत्री के रूप में शास्त्री को 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान देश का नेतृत्व करना पड़ा। सरकारी अभिलेखों में उनके नेतृत्व और उस समय लिए गए फैसलों का उल्लेख मिलता है। बाद में उन्होंने शांति की दिशा में ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर किए।
उनका प्रधानमंत्री कार्यकाल लंबा नहीं था, लेकिन इस छोटे समय में उनके व्यक्तित्व की पहचान सादगी, अनुशासन, जवाबदेही और दृढ़ता से बनी।
2 अक्टूबर को क्यों याद किए जाते हैं शास्त्री?
महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री का जन्मदिन एक ही तारीख यानी 2 अक्टूबर को पड़ता है। इसलिए इस दिन देश में दोनों नेताओं को याद किया जाता है। 2026 में लाल बहादुर शास्त्री की 122वीं जयंती मनाई जा रही है।
शास्त्री का सार्वजनिक जीवन यह भी दिखाता है कि राजनीतिक पद की ऊंचाई से अलग व्यक्तिगत सादगी और सार्वजनिक जिम्मेदारी किसी नेता की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है।
उनके जीवन से जुड़ी रेल दुर्घटना के बाद इस्तीफे की घटना आज भी भारतीय सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही के संदर्भ में उद्धृत की जाती है।