कोलकाता। पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा का उत्सवी दौर खत्म होते ही नगर निकाय चुनावों की सियासी तस्वीर तेजी से बदलती दिखाई दे रही है। कोलकाता और हावड़ा नगर निगम पर कब्जे की लड़ाई अब सिर्फ स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसे राज्य की व्यापक राजनीतिक दिशा से जोड़कर देखा जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने दोनों बड़े शहरी निकायों में सत्ता हासिल करने की रणनीति पर काम तेज कर दिया है, जबकि तृणमूल कांग्रेस और उससे जुड़े अलग-अलग राजनीतिक समूहों के सामने संगठनात्मक एकजुटता और शहरी जनाधार बनाए रखने की चुनौती है।
इसी सियासी माहौल के बीच विधायक मदन मित्रा की टिप्पणियों ने बहस को और धार दी है। चुनावी संघर्ष को लेकर उनकी ओर से ‘रिंग’ का संदर्भ दिए जाने के बाद राजनीतिक गलियारों में इस बयान के अलग-अलग अर्थ निकाले जा रहे हैं। हालांकि, किसी बयान को सीधे तौर पर चुनावी गठबंधन या औपचारिक रणनीति की घोषणा मानना जल्दबाजी होगी। इसके राजनीतिक असर को समझने के लिए तृणमूल की मौजूदा आंतरिक स्थिति और भाजपा की चुनावी तैयारी दोनों को साथ देखना जरूरी है।
‘ट्रिपल इंजन’ के सहारे कोलकाता-हावड़ा जीतने की भाजपा की कोशिश
भाजपा ने पश्चिम बंगाल के शहरी निकाय चुनाव को अपने लिए अगली बड़ी राजनीतिक परीक्षा के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया है। पार्टी का ‘ट्रिपल इंजन’ मॉडल इसी रणनीति का प्रमुख राजनीतिक संदेश है। इसके तहत भाजपा मतदाताओं के सामने केंद्र, राज्य और नगर निकाय में एक ही राजनीतिक दल की सरकार होने से विकास योजनाओं में बेहतर समन्वय का तर्क रख रही है।
नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा उपचुनावों में भाजपा की जीत के बाद पार्टी ने कोलकाता और हावड़ा में अपनी चुनावी गतिविधियां और तेज की हैं। भाजपा नेता पहले ही दोनों नगर निगमों में निर्णायक जनादेश की अपील कर चुके हैं। इस रणनीति का मकसद विधानसभा चुनाव के बाद बने राजनीतिक momentum को शहरी निकायों तक ले जाना है। कोलकाता और हावड़ा पर कब्जा भाजपा के लिए केवल नगर प्रशासन की जीत नहीं, बल्कि बंगाल के शहरी राजनीतिक आधार के विस्तार का संकेत भी होगा।

हालांकि, विधानसभा और नगर निकाय चुनावों की प्रकृति अलग होती है। वार्ड स्तर के समीकरण, स्थानीय उम्मीदवार की स्वीकार्यता, नागरिक सुविधाएं, सड़क, जलनिकासी, पेयजल, कचरा प्रबंधन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की छवि जैसे मुद्दे नगर चुनाव में निर्णायक हो सकते हैं। इसलिए भाजपा के सामने बड़े राजनीतिक नारे को वार्ड स्तर के स्थानीय मुद्दों से जोड़ने की चुनौती भी रहेगी।
उम्मीदवारों के चयन पर भाजपा का फोकस
भाजपा ने कोलकाता और हावड़ा के लिए संगठनात्मक स्तर पर अलग-अलग चुनावी समितियां बनाई हैं। वरिष्ठ नेताओं की बैठकों के बाद उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक पार्टी ने उम्मीदवारों की जीतने की क्षमता, सार्वजनिक छवि और स्थानीय पकड़ को प्राथमिकता देने की बात कही है।
23 अक्टूबर को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने साफ किया था कि उम्मीदवारों की सूची अभी अंतिम नहीं हुई है। केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार ने भी संभावित सहयोगियों के साथ सीट बंटवारे पर किसी औपचारिक चर्चा से इनकार किया था। इसके बाद उम्मीदवारों के नामों को लेकर चल रही अटकलों को आधिकारिक घोषणा से अलग रखना जरूरी है।
24 अक्टूबर को भाजपा ने संभावित उम्मीदवारों से आवेदन भी आमंत्रित किए हैं। पार्टी ने 26 अक्टूबर शाम तक आवेदन जमा करने की समयसीमा रखी है और कहा है कि चुनाव की औपचारिक अधिसूचना जारी होने के बाद उम्मीदवारों की सूची जल्द घोषित की जाएगी। इससे स्पष्ट है कि भाजपा अब तैयारी के चरण से आगे बढ़कर उम्मीदवार चयन की व्यावहारिक प्रक्रिया में प्रवेश कर चुकी है।

मदन मित्रा के बयान ने बढ़ाई तृणमूल की आंतरिक राजनीति पर चर्चा
मदन मित्रा की टिप्पणी को केवल चुनावी बयान के रूप में देखने के बजाय तृणमूल से जुड़े मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। हालिया घटनाक्रम में मदन मित्रा का नाम ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले अलग तृणमूल समूह के साथ जोड़ा गया है। इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में उनका ममता बनर्जी और तृणमूल की व्यापक राजनीति को लेकर रुख चर्चा में है।
मदन मित्रा ने नगर निकाय चुनाव को लेकर अलग-अलग तृणमूल धड़ों के बीच तालमेल की जरूरत की बात भी उठाई है। उनके रुख से यह संकेत जरूर मिलता है कि विपक्षी मतों के बिखराव को लेकर तृणमूल के भीतर चिंता मौजूद है, लेकिन इसे किसी औपचारिक गठबंधन का संकेत मानना उचित नहीं होगा। ताजा राजनीतिक घटनाक्रम में अलग-अलग धड़ों के बीच चुनावी रणनीति को लेकर मतभेद भी सामने आए हैं।
तृणमूल के सामने शहरी जनाधार बचाने की चुनौती
कोलकाता और हावड़ा में तृणमूल कांग्रेस के लिए चुनौती सिर्फ भाजपा के राजनीतिक विस्तार की नहीं है। स्थानीय स्तर पर पार्टी को अपने संगठन, वार्ड नेटवर्क और मतदाताओं के बीच पकड़ बनाए रखने की भी परीक्षा देनी होगी। नगर निकाय चुनाव में बड़े राजनीतिक नारों के साथ स्थानीय शासन का रिकॉर्ड भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित करेगा।
सड़क, जलनिकासी, पेयजल, कचरा प्रबंधन, ट्रैफिक, स्ट्रीट लाइट और वार्ड स्तर की नागरिक सेवाएं ऐसे मुद्दे हैं जिनका असर सीधे मतदाताओं की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है। इसलिए चुनावी प्रचार में भाजपा जहां ‘ट्रिपल इंजन’ के जरिए सत्ता के तीन स्तरों के तालमेल का मुद्दा उठाएगी, वहीं तृणमूल को अपने स्थानीय प्रशासनिक रिकॉर्ड और संगठनात्मक ताकत के आधार पर जवाब देना होगा।

इसके साथ ही तृणमूल से जुड़े अलग-अलग गुटों के बीच संभावित तालमेल भी महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन जब तक किसी औपचारिक समझौते की घोषणा नहीं होती, तब तक किसी साझा चुनावी रणनीति को अंतिम नहीं माना जा सकता।
कोलकाता और हावड़ा चुनाव का व्यापक राजनीतिक महत्व
कोलकाता नगर निगम में वार्डों की संख्या बढ़ाकर 209 की गई है, जबकि हावड़ा में वार्डों की संख्या 68 करने की प्रक्रिया पूरी की गई है। परिसीमन और आरक्षण की प्रक्रिया के बाद दोनों नगर निकायों में चुनावी समीकरण काफी हद तक बदलने की संभावना है। खासकर नए वार्ड बनने से पुराने पार्षदों और नए राजनीतिक चेहरों के लिए चुनावी गणित बदल सकता है।
हावड़ा का चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां लंबे समय से निर्वाचित नगर बोर्ड नहीं रहा है। ऐसे में स्थानीय प्रशासन और नागरिक सेवाओं को लेकर मतदाताओं की अपेक्षाएं भी चुनावी बहस का हिस्सा बन सकती हैं। दूसरी ओर, कोलकाता नगर निगम को भाजपा अपने शहरी विस्तार की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक लड़ाई के रूप में देख रही है।
चुनाव की तारीख पर अभी अंतिम तस्वीर बाकी
नगर निकाय चुनावों को लेकर तैयारियां तेज हैं और प्रशासनिक स्तर पर भी प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। उपलब्ध रिपोर्टों में कोलकाता, हावड़ा समेत सात शहरी निकायों में नवंबर के अंतिम सप्ताह में मतदान की संभावना जताई गई है, लेकिन राज्य निर्वाचन आयोग की औपचारिक घोषणा के बिना किसी तारीख को अंतिम नहीं माना जा सकता। चुनावी प्रक्रिया को दिसंबर की शुरुआत तक पूरा करने की तैयारी की खबरें भी सामने आई हैं। citeturn1search1

ऐसे में अगले कुछ दिनों में उम्मीदवार चयन, सीटवार रणनीति, संभावित राजनीतिक तालमेल और प्रचार अभियान की तस्वीर ज्यादा साफ हो सकती है। भाजपा जहां कोलकाता और हावड़ा में अपनी राजनीतिक ताकत को नगर प्रशासन तक पहुंचाने की कोशिश में है, वहीं तृणमूल के सामने अपने शहरी आधार को बचाने के साथ-साथ आंतरिक मतभेदों को संभालने की चुनौती है।
फिलहाल ‘ट्रिपल इंजन’ का नारा, भाजपा की आक्रामक चुनावी तैयारी और मदन मित्रा के बयान ने पश्चिम बंगाल के नगर निकाय चुनाव को राज्य की राजनीति का नया केंद्र बना दिया है। लेकिन अंतिम तस्वीर उम्मीदवारों के नाम, वार्डवार समीकरण, चुनावी गठजोड़ और स्थानीय मुद्दों पर जनता की प्रतिक्रिया से ही तय होगी। यही कारण है कि कोलकाता और हावड़ा की आगामी लड़ाई को सिर्फ नगर निगम चुनाव नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की बदलती शहरी राजनीति की बड़ी परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है।
