आस्था के साथ पर्यावरण की जिम्मेदारी भी, करीब 5 हजार श्रद्धालुओं ने 18 किलोमीटर के पैदल मार्ग से कचरा नीचे पहुंचाया
Kedarnath News: केदारनाथ धाम की यात्रा में इस बार आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो देश के दूसरे धार्मिक और पर्यटन स्थलों के लिए भी मिसाल बन सकती है। ‘कैरी मी बैक’ अभियान के तहत करीब 5 हजार श्रद्धालुओं ने केदारनाथ से लौटते समय 12 टन से अधिक प्लास्टिक कचरा अपने साथ नीचे पहुंचाया है।
श्रद्धालुओं ने यह कचरा करीब 18 किलोमीटर लंबे पैदल मार्ग से केदारनाथ धाम से गौरीकुंड तक लाकर निर्धारित व्यवस्था के तहत जमा कराया।
केदारनाथ धाम समुद्र तल से करीब 11,755 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को कठिन पहाड़ी रास्ते से गुजरना पड़ता है। ऐसे इलाके में कचरे को वापस नीचे लाना सामान्य मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण है।

इसके बावजूद हजारों यात्रियों का स्वेच्छा से कचरा अपने साथ वापस लाना इस अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जा रहा है।
कैसे शुरू हुआ ‘कैरी मी बैक’ अभियान?
केदारनाथ में बढ़ते कचरे की समस्या को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और सहयोगी संस्थाओं ने इस साल ‘कैरी मी बैक’ अभियान शुरू किया था। इसका मूल विचार बेहद सीधा है—श्रद्धालु केदारनाथ पहुंचने के बाद लौटते समय अपने साथ सूखा कचरा नीचे लेकर आएं, ताकि उसे पहाड़ पर ही जमा करने या खुले में फेंकने की जरूरत कम हो।
जून 2026 में केदारनाथ नगर पंचायत ने इस अभियान की शुरुआत की थी। इसमें सुलभ इंटरनेशनल और पर्यावरण क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं का भी सहयोग है। श्रद्धालुओं को सूखा कचरा रखने के लिए विशेष बैग उपलब्ध कराए गए हैं।
इन बैगों में प्लास्टिक, पैकेजिंग सामग्री और दूसरे सूखे कचरे को रखा जा सकता है। नीचे गौरीकुंड में निर्धारित collection point पर इसे जमा किया जाता है।

नगर पंचायत के अधिकारियों के मुताबिक, प्रत्येक बैग में करीब 400 से 500 ग्राम सूखा कचरा रखा जा सकता है। जमा किए गए कचरे को बाद में Material Recovery Facility यानी MRF के जरिए अलग कर वैज्ञानिक तरीके से processing के लिए भेजने की व्यवस्था की गई है। Jagran
केदारनाथ में कचरा प्रबंधन क्यों बड़ी चुनौती है?
केदारनाथ की भौगोलिक स्थिति कचरा प्रबंधन को बेहद मुश्किल बनाती है। एक तरफ श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर पहाड़ी क्षेत्र में कचरा इकट्ठा करने, उसे नीचे लाने और वैज्ञानिक तरीके से निपटाने के लिए संसाधन सीमित हैं।
आंकड़े इस दबाव को साफ दिखाते हैं। 2026 में अप्रैल से अगस्त के बीच केदारनाथ में 50.30 मीट्रिक टन कचरा उत्पन्न होने की जानकारी सामने आई है। यह मात्रा पिछले तीन वर्षों में किसी भी पूरे यात्रा सीजन में दर्ज कचरे से अधिक है।
2023 में 32.58 मीट्रिक टन, 2024 में 26.10 मीट्रिक टन और 2025 में 21.40 मीट्रिक टन कचरा दर्ज किया गया था।

इसी अवधि में करीब 20 मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होने की जानकारी भी दी गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इसमें से 18.5 मीट्रिक टन यानी लगभग 92.5 प्रतिशत प्लास्टिक को process किया जा चुका था, जबकि करीब 1.5 मीट्रिक टन बाकी था। Mint Affairs
श्रद्धालुओं की भागीदारी बनी अभियान की ताकत
‘कैरी मी बैक’ अभियान की सबसे खास बात यह है कि इसमें सफाई की जिम्मेदारी सिर्फ प्रशासन या सफाईकर्मियों तक सीमित नहीं रखी गई। श्रद्धालुओं को सीधे इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया।
सितंबर में सामने आई एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, इस अभियान से करीब 4 हजार श्रद्धालु जुड़ चुके थे और उन्होंने केदारनाथ से बेस कैंप तक लगभग एक-एक किलो कचरा वापस लाने की जिम्मेदारी उठाई थी। उस समय तक अभियान के तहत 10 टन से अधिक कचरा नीचे लाया जा चुका था।
अब 12 टन से अधिक कचरा नीचे लाए जाने की रिपोर्ट बताती है कि अभियान में भागीदारी लगातार बढ़ी है। यह केवल सफाई अभियान नहीं बल्कि यात्रियों के व्यवहार में बदलाव लाने की कोशिश भी है।

बढ़ती भीड़ के बीच पर्यावरण पर दबाव
केदारनाथ में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने के साथ infrastructure पर भी दबाव बढ़ रहा है। Wildlife Institute of India की carrying-capacity study को लेकर सामने आई जानकारी में केदारनाथ के लिए करीब 18,044 श्रद्धालुओं की दैनिक carrying capacity की सिफारिश का उल्लेख किया गया है। वहीं peak season में कई मौकों पर रोजाना आने वाले यात्रियों की संख्या 25 हजार से 30 हजार तक पहुंचने की बात अधिकारियों और संबंधित रिपोर्टों में सामने आई है।
यानी समस्या सिर्फ प्लास्टिक कचरे तक सीमित नहीं है। सीवेज, शौचालय, ठोस कचरा और दूसरे civic infrastructure पर भी इसका असर पड़ता है। यही वजह है कि केदारनाथ जैसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आने वाले समय की बड़ी चुनौती है।
दूसरे तीर्थ स्थलों के लिए भी बन सकता है मॉडल
‘कैरी मी बैक’ अभियान की सफलता का सबसे बड़ा संदेश यह है कि पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी अभियान बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। जब श्रद्धालु खुद कचरा वापस लाने की जिम्मेदारी लेते हैं, तो सफाई व्यवस्था पर दबाव कम करने के साथ-साथ लोगों में जिम्मेदारी की भावना भी पैदा होती है।
केदारनाथ से 12 टन से अधिक कचरा नीचे लाने की पहल अभी समस्या का पूर्ण समाधान नहीं है। लेकिन यह दिखाती है कि लाखों लोगों की धार्मिक यात्रा को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार बनाने के लिए छोटे और व्यावहारिक कदम प्रभावी हो सकते हैं।

अगर इस मॉडल को दूसरे बड़े तीर्थस्थलों, पहाड़ी पर्यटन क्षेत्रों और संवेदनशील पर्यावरणीय इलाकों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार लागू किया जाए, तो कचरा प्रबंधन की चुनौती से निपटने में मदद मिल सकती है। आखिरकार, आस्था की यात्रा तभी टिकाऊ बन सकती है जब उसके साथ उस प्रकृति की जिम्मेदारी भी जुड़ी हो, जहां वह यात्रा पूरी होती है।
