भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को वैज्ञानिक दृष्टि, संस्थागत नेतृत्व और दीर्घकालिक योजना से आगे बढ़ाने वाले प्रमुख व्यक्तित्वों में डॉ. कृष्णस्वामी कस्तूरीरंगन का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उनका जन्म 24 अक्टूबर 1940 को हुआ था। वैज्ञानिक के रूप में उन्होंने अंतरिक्ष अनुसंधान में योगदान दिया और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के प्रमुख के रूप में भारत की अंतरिक्ष क्षमताओं को नई पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई। उनकी जयंती भारतीय विज्ञान, तकनीक और शिक्षा के क्षेत्र में उनके व्यापक योगदान को याद करने का अवसर है।
भौतिकी से अंतरिक्ष विज्ञान तक का सफर
कस्तूरीरंगन ने भौतिकी में उच्च शिक्षा प्राप्त की और खगोल विज्ञान तथा अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़े अनुसंधान में विशेषज्ञता विकसित की। उनका वैज्ञानिक कार्य मुख्य रूप से पृथ्वी अवलोकन, अंतरिक्ष से प्राप्त आंकड़ों और उपग्रह-आधारित अध्ययन से जुड़ा रहा। अंतरिक्ष से पृथ्वी की सतह, मौसम, प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण के बारे में जानकारी जुटाने की क्षमता आधुनिक विज्ञान के लिए महत्वपूर्ण है; भारत में इस क्षेत्र के विकास में कस्तूरीरंगन जैसे वैज्ञानिकों का योगदान उल्लेखनीय रहा।
इसरो के अध्यक्ष के रूप में नेतृत्व
कस्तूरीरंगन ने 1994 से 2003 तक इसरो के अध्यक्ष और अंतरिक्ष विभाग के सचिव के रूप में काम किया। उनके कार्यकाल में भारत के प्रक्षेपण यान कार्यक्रम, उपग्रह निर्माण और अंतरिक्ष-आधारित सेवाओं ने महत्वपूर्ण प्रगति की। उन्होंने भारतीय रिमोट सेंसिंग उपग्रहों और संचार उपग्रहों से जुड़े कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने में नेतृत्व दिया। उपग्रहों से मिलने वाले आंकड़े कृषि, जल संसाधन, वन प्रबंधन, आपदा आकलन और संचार जैसी जरूरतों में उपयोगी साबित होते हैं।
उनके नेतृत्व के दौर में भारत ने अंतरिक्ष तकनीक को केवल वैज्ञानिक उपलब्धि तक सीमित न रखकर विकास की जरूरतों से जोड़ने पर जोर दिया। अंतरिक्ष अभियानों की सफलता में वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ इंजीनियरिंग, प्रक्षेपण क्षमता, संस्थागत सहयोग और निरंतर निवेश की भूमिका होती है। कस्तूरीरंगन का कार्यकाल इन सभी क्षेत्रों में भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के विस्तार का महत्वपूर्ण चरण था।

चंद्रयान और अंतरिक्ष अनुसंधान की दिशा
भारत के चंद्रमा और ग्रहों के अध्ययन की महत्वाकांक्षी योजनाओं को संस्थागत आधार देने के दौर में भी कस्तूरीरंगन का नेतृत्व महत्वपूर्ण रहा। चंद्रयान-1 मिशन की योजना और तैयारी उनके इसरो अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद आगे बढ़ी और यह मिशन 2008 में प्रक्षेपित हुआ। इसलिए इस मिशन को उनके कार्यकाल की प्रत्यक्ष उपलब्धि कहने के बजाय भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की उस निरंतरता के हिस्से के रूप में देखना उचित है, जिसे उनके नेतृत्व सहित कई वैज्ञानिकों और संस्थानों ने मजबूत किया।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति के निर्माण में भूमिका
अंतरिक्ष विज्ञान से परे, कस्तूरीरंगन ने शिक्षा नीति के क्षेत्र में भी योगदान दिया। उन्हें 2017 में भारत की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लिए गठित समिति का अध्यक्ष बनाया गया। उनकी अध्यक्षता वाली समिति ने 2019 में मसौदा प्रस्तुत किया, जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की चर्चा और निर्माण प्रक्रिया को दिशा देने में भूमिका निभाई। यह काम विज्ञान और शिक्षा के बीच संबंध, शोध को प्रोत्साहन, बहुविषयक शिक्षा और भारतीय ज्ञान परंपराओं जैसे विषयों पर राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बना।
राष्ट्रीय सम्मान और सार्वजनिक जीवन
विज्ञान और सार्वजनिक सेवा में योगदान के लिए कस्तूरीरंगन को भारत के प्रमुख नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया गया। उन्हें 1982 में पद्म श्री, 1992 में पद्म भूषण और 2000 में पद्म विभूषण प्रदान किया गया। वे भारतीय विज्ञान अकादमी और अन्य वैज्ञानिक संस्थाओं से भी जुड़े रहे तथा विज्ञान नीति और शोध संस्थानों के विकास में योगदान देते रहे। उनके जीवन का दायरा प्रयोगशाला और अंतरिक्ष अभियानों से आगे बढ़कर शिक्षा, नीति और संस्थागत नेतृत्व तक फैला था।
वैज्ञानिक विरासत
डॉ. के. कस्तूरीरंगन का निधन 25 अगस्त 2025 को हुआ। उनकी जयंती पर उन्हें याद करते हुए भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और संस्थानों के सामूहिक योगदान को भी समझना जरूरी है। उपग्रहों से मिलने वाली जानकारी और अंतरिक्ष तकनीक आज संचार, मौसम पूर्वानुमान, आपदा प्रबंधन और संसाधन नियोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस क्षेत्र को मजबूत बनाने में कस्तूरीरंगन का नेतृत्व और दूरदृष्टि भारतीय विज्ञान के इतिहास का अहम अध्याय है।

24 अक्टूबर को उनका जन्मदिवस भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों, शोध के महत्व और ज्ञान-आधारित विकास के प्रति प्रतिबद्धता को याद करने का अवसर है।
