इतिहास | 6 नवंबर | स्वतंत्रता आंदोलन | अंडमान-निकोबार
6 नवंबर 1943 को जापान के प्रधानमंत्री जनरल हिदेकी तोजो ने टोक्यो में ग्रेटर ईस्ट एशिया सम्मेलन के दौरान घोषणा की कि जापान अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाली आजाद हिंद की अस्थायी सरकार को सौंपने के लिए तैयार है। यह घोषणा द्वितीय विश्व युद्ध के बीच भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक और प्रतीकात्मक घटनाक्रम बनी। वास्तविक प्रशासनिक व्यवस्था बाद के सप्ताहों में बनी; नेताजी 29 दिसंबर को पोर्ट ब्लेयर पहुंचे और 30 दिसंबर 1943 को वहां तिरंगा फहराया।
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का इतिहास भारत के स्वतंत्रता संघर्ष, औपनिवेशिक दमन और द्वितीय विश्व युद्ध की एशियाई राजनीति से गहराई से जुड़ा है। बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के निकट स्थित इन द्वीपों पर ब्रिटिश शासन ने दंड-बस्ती और कारागार व्यवस्था स्थापित की थी। इसी भूमि पर स्थित सेलुलर जेल में अनेक स्वतंत्रता सेनानियों को कैद रखा गया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सेना ने इन द्वीपों पर कब्जा कर लिया। इसी पृष्ठभूमि में 6 नवंबर 1943 की जापानी घोषणा और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की दिसंबर यात्रा ऐतिहासिक महत्व रखती है।
द्वितीय विश्व युद्ध और जापानी कब्जा
द्वितीय विश्व युद्ध के एशियाई मोर्चे पर जापान की तेज सैन्य प्रगति के बीच ब्रिटिश प्रशासन ने अंडमान-निकोबार की रक्षा नहीं कर पाया। जापानी सेनाओं ने 23 मार्च 1942 को द्वीपों पर कब्जा कर लिया। इसके बाद यहां जापानी सैन्य प्रशासन स्थापित हुआ, जो अक्टूबर 1945 तक चला। रणनीतिक दृष्टि से ये द्वीप जापान के लिए महत्वपूर्ण थे, क्योंकि यहां से बंगाल की खाड़ी और दक्षिण-पूर्व एशिया के समुद्री क्षेत्रों पर निगरानी रखी जा सकती थी।

जापानी कब्जे के दौरान स्थानीय आबादी को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। युद्धकालीन नाकेबंदी, खाद्य-संकट, जबरन श्रम, संदेह के आधार पर गिरफ्तारियां और हिंसा ने द्वीपों के जीवन को प्रभावित किया। अंडमान-निकोबार प्रशासन के ऐतिहासिक विवरणों में जापानी शासन के दौरान स्थानीय लोगों पर अत्याचार, हिरासत और हत्याओं का उल्लेख मिलता है। इसलिए 1943 की राजनीतिक घोषणा को द्वीपों की जनता के लिए तत्काल स्वतंत्र और स्वशासित व्यवस्था स्थापित हो जाने के बराबर नहीं माना जा सकता।
आजाद हिंद सरकार का गठन और जापान से संबंध
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में आजाद हिंद की अस्थायी सरकार (Provisional Government of Azad Hind) की स्थापना की घोषणा की। इस सरकार ने स्वयं को स्वतंत्र भारत का प्रतिनिधि शासन घोषित किया। बोस इसके राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री और युद्ध-संबंधी मामलों के प्रमुख बने। आजाद हिंद फौज (Indian National Army—INA) इस स्वतंत्रता प्रयास की सैन्य शक्ति थी। जापान सहित कुछ धुरी राष्ट्रों और उनके सहयोगी देशों ने इस अस्थायी सरकार को मान्यता दी।
जापान के साथ बोस का संबंध युद्धकालीन रणनीति और ब्रिटिश शासन को चुनौती देने की साझा राजनीतिक परिस्थिति से जुड़ा था। जापान भारत की स्वतंत्रता के समर्थन का दावा कर रहा था, लेकिन वह स्वयं एशिया में एक साम्राज्यवादी सैन्य शक्ति था। इस गठबंधन को समझते समय दोनों पक्षों के हितों और युद्धकालीन शक्ति-संतुलन को ध्यान में रखना जरूरी है।
6 नवंबर 1943: टोक्यो में जापान की घोषणा
6 नवंबर 1943 को टोक्यो में आयोजित ग्रेटर ईस्ट एशिया सम्मेलन के दौरान जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जनरल हिदेकी तोजो ने घोषणा की कि जापान अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को आजाद हिंद की अस्थायी सरकार को हस्तांतरित करने के लिए तैयार है। यह घोषणा बोस की उस कूटनीतिक कोशिश के बाद आई जिसमें उन्होंने जापानी नेतृत्व से द्वीपों का अधिकार आजाद हिंद सरकार को देने की मांग की थी।

इस घटना को कई सरकारी और ऐतिहासिक विवरणों में द्वीपों को आजाद हिंद सरकार को सौंपने की घोषणा के रूप में दर्ज किया गया है। लेकिन घोषणा और जमीन पर वास्तविक प्रशासनिक नियंत्रण के बीच अंतर था। जापान ने हस्तांतरण की राजनीतिक प्रतिबद्धता जताई, जबकि रक्षा और विदेश मामलों सहित महत्वपूर्ण अधिकारों पर उसका प्रभाव बना रहा। इसीलिए 6 नवंबर को औपचारिक घोषणा या हस्तांतरण की तैयारी की तारीख कहना अधिक सटीक है; इसे उसी दिन पूर्ण प्रशासनिक और सैन्य सत्ता के हस्तांतरण के रूप में बताना भ्रामक हो सकता है।
नेताजी की ऐतिहासिक यात्रा: 29 और 30 दिसंबर 1943
जापानी घोषणा के बाद द्वीपों के प्रशासनिक हस्तांतरण की व्यवस्था पर बातचीत हुई। नेताजी सुभाष चंद्र बोस 29 दिसंबर 1943 को पोर्ट ब्लेयर पहुंचे। राष्ट्रपति सचिवालय के आधिकारिक विवरण के अनुसार, उन्होंने जापानी नौसेना से द्वीपों का कार्यभार लेने के उद्देश्य से यात्रा की थी। वे रॉस द्वीप पर ब्रिटिश मुख्य आयुक्त के पूर्व निवास में ठहरे और ऐतिहासिक सेलुलर जेल भी गए।
अगले दिन, 30 दिसंबर 1943 को नेताजी ने पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान—जिसे आज नेताजी स्टेडियम कहा जाता है—में भारतीय तिरंगा फहराया। इस घटना को ब्रिटिश शासन से मुक्त भारतीय भूमि पर आजाद हिंद सरकार के प्रतीकात्मक अधिकार और स्वतंत्रता के संकल्प के प्रदर्शन के रूप में देखा गया। नेताजी ने अंडमान और निकोबार को क्रमशः ‘शहीद’ और ‘स्वराज’ द्वीप नाम देने की घोषणा भी की। बाद में इन नामों को राष्ट्रीय स्मृति में विशेष स्थान मिला।
नेताजी 1 जनवरी 1944 को द्वीपों से रवाना हो गए। राष्ट्रपति भवन के आधिकारिक भाषण में दर्ज है कि उन्होंने कर्नल ए. जी. लोगनाथन को द्वीपों का मुख्य आयुक्त नियुक्त किया। कर्नल लोगनाथन चार अन्य INA अधिकारियों के साथ 11 फरवरी 1944 को पोर्ट ब्लेयर पहुंचे और आजाद हिंद सरकार की ओर से प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास किया।

क्या द्वीपों पर पूरा नियंत्रण आजाद हिंद सरकार को मिल गया था?
इस प्रश्न का उत्तर देते समय राजनीतिक अधिकार और वास्तविक सैन्य नियंत्रण में अंतर करना आवश्यक है। आजाद हिंद सरकार को द्वीपों पर औपचारिक अथवा सीमित नागरिक प्रशासन का अधिकार देने की घोषणा की गई और उसके प्रतिनिधि नियुक्त किए गए। लेकिन जापानी सेना का सैन्य प्रभुत्व समाप्त नहीं हुआ। ऐतिहासिक अध्ययनों और समकालीन विवरणों के अनुसार रक्षा और विदेश मामलों जैसे प्रमुख विषय जापानी नियंत्रण में रहे तथा स्थानीय प्रशासन की स्वतंत्रता सीमित थी।
इसलिए यह कहना उचित होगा कि 6 नवंबर 1943 की घोषणा और दिसंबर में नेताजी की यात्रा ने आजाद हिंद सरकार को भारतीय भूभाग पर प्रतीकात्मक और सीमित प्रशासनिक उपस्थिति दी। हालांकि द्वीपों पर पूर्ण संप्रभुता या स्वतंत्र सैन्य नियंत्रण स्थापित नहीं हुआ था। इस तथ्य को समझना इसलिए जरूरी है ताकि नेताजी की ऐतिहासिक भूमिका का सम्मान करते हुए घटना का विवरण वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप रहे।
सेलुलर जेल और स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति
नेताजी की अंडमान यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव सेलुलर जेल था। ब्रिटिश शासन के दौरान इस जेल में स्वतंत्रता सेनानियों को कठोर परिस्थितियों में रखा गया था। जेल की कोठरियां, एकांत कारावास और दंडात्मक व्यवस्था औपनिवेशिक शासन की दमनकारी नीति का प्रतीक बन गई थीं। नेताजी का वहां जाना उन क्रांतिकारियों के बलिदान को सम्मान देने का प्रतीक था जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए यातना और कारावास सहा।
द्वीपों का इतिहास केवल औपनिवेशिक जेल तक सीमित नहीं है। यहां की मूल जनजातीय समुदायों की अपनी प्राचीन सांस्कृतिक पहचान और जीवन-पद्धतियां हैं। युद्ध, सैन्य कब्जे और औपनिवेशिक शासन ने द्वीपों के सामाजिक जीवन को प्रभावित किया। इसलिए इस इतिहास को स्थानीय निवासियों और जनजातीय समुदायों के अनुभवों के साथ भी समझना चाहिए।

जापानी कब्जे का अंत और ऐतिहासिक विरासत
द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की पराजय के बाद मित्र राष्ट्रों ने अंडमान-निकोबार पर फिर नियंत्रण स्थापित किया। अक्टूबर 1945 में जापानी सेना ने आत्मसमर्पण किया और द्वीप ब्रिटिश प्रशासन के अधीन लौटे। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद ये द्वीप भारतीय संघ का हिस्सा बने।
6 नवंबर 1943 की घोषणा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अंतरराष्ट्रीय आयाम को सामने लाती है। यह उस दौर की याद दिलाती है जब नेताजी ने दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय समुदायों को संगठित किया, आजाद हिंद सरकार बनाई और जापान के साथ रणनीतिक संबंधों के माध्यम से ब्रिटिश शासन को चुनौती देने की कोशिश की। इस प्रयास की सीमाएं और जापानी सैन्य नियंत्रण की वास्तविकता भी इतिहास का हिस्सा हैं।
अंडमान-निकोबार में 30 दिसंबर 1943 को तिरंगा फहराया जाना भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति में एक महत्वपूर्ण प्रतीक बना हुआ है। 6 नवंबर की जापानी घोषणा, 29 दिसंबर को नेताजी का आगमन और 30 दिसंबर का ध्वजारोहण—ये तीनों घटनाएं अलग-अलग तारीखों और अर्थों के साथ याद रखी जानी चाहिए। यही अंतर इस ऐतिहासिक प्रसंग को सही संदर्भ में समझने की कुंजी है।
