अंतर्राष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस हर वर्ष 17 अक्टूबर को दुनिया भर में मनाया जाता है। यह दिन केवल गरीबी के आँकड़ों पर चर्चा करने का अवसर नहीं, बल्कि उन लोगों की आवाज़ सुनने, उनके अधिकारों और गरिमा को स्वीकार करने तथा ऐसे ठोस कदमों पर विचार करने का दिन है जिनसे हर व्यक्ति सम्मानजनक जीवन जी सके। भारत और विशेषकर बिहार जैसे राज्यों के लिए यह दिवस सामाजिक न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता पर नए सिरे से ध्यान देने का अवसर है।
17 अक्टूबर को क्यों मनाया जाता है यह दिवस?
इस दिवस की पृष्ठभूमि 17 अक्टूबर 1987 से जुड़ी है, जब पेरिस के ट्रोकाडेरो में एक लाख से अधिक लोग अत्यधिक गरीबी, हिंसा और भूख के पीड़ितों को सम्मान देने के लिए एकत्र हुए थे। उन्होंने गरीबी को मानवाधिकारों और मानवीय गरिमा से जुड़ा मुद्दा माना। बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 22 दिसंबर 1992 को प्रस्ताव 47/196 के माध्यम से 17 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस घोषित किया।
इस दिवस का उद्देश्य गरीबी में जीवन बिताने वाले लोगों के अनुभवों और संघर्षों को सामने लाना, समाज में एकजुटता बढ़ाना और सरकारों, संस्थाओं तथा समुदायों को गरीबी दूर करने के लिए ठोस कार्रवाई की ओर प्रेरित करना है।
2026 की थीम: सभी के लिए सुरक्षित घर
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 2026–2028 की व्यापक थीम “United for Peace and Human Rights” है और 2026 का विशेष फोकस “Safe Homes for All” यानी सभी के लिए सुरक्षित घर है। सुरक्षित और स्थिर आवास केवल छत तक सीमित नहीं है; इसका संबंध सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक भागीदारी से भी है। जब किसी परिवार के पास सुरक्षित घर, स्वच्छ पानी, शौचालय और बुनियादी सुविधाएँ नहीं होतीं, तो गरीबी से बाहर निकलना और कठिन हो जाता है।

गरीबी केवल आय की कमी नहीं
गरीबी को अक्सर कम आमदनी से जोड़ा जाता है, लेकिन इसका स्वरूप कहीं व्यापक है। किसी परिवार के पास नियमित आय होने पर भी यदि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिलती, पोषण और स्वास्थ्य सेवाएँ सुलभ नहीं हैं, घर में स्वच्छ पेयजल या शौचालय नहीं है अथवा रोजगार अस्थिर है, तो वह कई स्तरों पर वंचना का सामना कर सकता है। इसी कारण गरीबी का आकलन करते समय आय के साथ-साथ स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन-स्तर के संकेतकों को भी देखना जरूरी है।
भारत का राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक (National Multidimensional Poverty Index) पोषण, बाल एवं किशोर मृत्यु, मातृ स्वास्थ्य, स्कूली शिक्षा, स्कूल में उपस्थिति, खाना पकाने के ईंधन, स्वच्छता, पेयजल, बिजली, आवास, बैंक खाते और संपत्ति जैसे संकेतकों को शामिल करता है। इससे नीति-निर्माताओं को यह समझने में मदद मिलती है कि किस क्षेत्र में किस तरह की सहायता की जरूरत है।
भारत में प्रगति और बाकी चुनौतियाँ
नीति आयोग की 2023 की राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक प्रगति समीक्षा के अनुसार, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के 2015–16 और 2019–21 दौरों के बीच भारत में बहुआयामी गरीबी में रहने वाली आबादी का अनुमानित अनुपात 24.85 प्रतिशत से घटकर 14.96 प्रतिशत हुआ। रिपोर्ट के अनुसार इस अवधि में लगभग 13.5 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए। यह महत्वपूर्ण प्रगति थी, लेकिन सर्वेक्षण की अवधि और मापने की पद्धति को ध्यान में रखते हुए आँकड़ों की व्याख्या करना चाहिए। गरीबी उन्मूलन का काम लगातार और बहुस्तरीय प्रयास मांगता है।
राष्ट्रीय औसत के पीछे राज्यों, जिलों और समुदायों के बीच बड़े अंतर छिपे हो सकते हैं। इसलिए योजनाओं का मूल्यांकन केवल कुल लाभार्थियों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से भी होना चाहिए कि सबसे वंचित परिवारों तक सेवाएँ पहुँचीं या नहीं, उनकी गुणवत्ता कैसी रही और क्या लोगों को स्थायी आजीविका के अवसर मिले।

बिहार के लिए यह दिवस क्यों अहम है?
बिहार ने बहुआयामी गरीबी कम करने में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। नीति आयोग की 2023 की समीक्षा में राज्य में बहुआयामी गरीबी का अनुमानित अनुपात 2015–16 के 51.89 प्रतिशत से घटकर 2019–21 में 33.76 प्रतिशत बताया गया। फिर भी यह आँकड़ा बताता है कि स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, स्वच्छता, आवास और सुरक्षित आजीविका के क्षेत्रों में निरंतर काम की जरूरत बनी हुई है। ये आँकड़े उस सर्वेक्षण अवधि के अनुमान हैं, आज की स्थिति का सीधा माप नहीं।
बिहार जैसे राज्य में ग्रामीण रोजगार, कृषि की उत्पादकता, कौशल प्रशिक्षण, स्थानीय उद्योग, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी, बच्चों का पोषण, गुणवत्तापूर्ण सरकारी शिक्षा और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएँ गरीबी घटाने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं। बाढ़ और अन्य जलवायु-संबंधी जोखिमों से प्रभावित परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा और आजीविका की बहाली भी जरूरी है। योजनाओं का लाभ तभी टिकाऊ होगा जब पात्र लोगों को समय पर जानकारी, आसान आवेदन प्रक्रिया और जवाबदेह सेवा-प्रणाली मिले।
सरकार, संस्थाओं और समुदाय की साझा भूमिका
- सामाजिक सुरक्षा: पात्र परिवारों तक खाद्य सुरक्षा, पेंशन, स्वास्थ्य सहायता और अन्य कल्याणकारी योजनाओं का समय पर लाभ पहुँचाना।
- शिक्षा और कौशल: बच्चों की नियमित उपस्थिति, सीखने की गुणवत्ता और युवाओं के लिए रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण पर ध्यान देना।
- स्वास्थ्य और पोषण: मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं, संतुलित पोषण, स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता तक समान पहुँच सुनिश्चित करना।
- सम्मानजनक रोजगार: सुरक्षित काम, उचित मजदूरी, कौशल विकास, छोटे उद्यमों और स्थानीय रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देना।
- लक्षित और पारदर्शी योजनाएँ: स्थानीय जरूरतों के अनुसार योजना बनाना, सामाजिक अंकेक्षण करना और शिकायतों का समयबद्ध निपटारा करना।
- लोगों की भागीदारी: गरीबी का सामना कर रहे परिवारों को योजना-निर्माण और मूल्यांकन में शामिल करना; उनके अनुभवों को निर्णयों का हिस्सा बनाना।
नागरिक क्या कर सकते हैं?
गरीबी उन्मूलन केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, हालांकि सार्वजनिक नीतियों और संस्थागत जवाबदेही की केंद्रीय भूमिका है। नागरिक स्थानीय स्तर पर जरूरतमंद परिवारों के लिए सम्मानजनक सहयोग, बच्चों की शिक्षा में मदद, कौशल और रोजगार से जुड़ी जानकारी साझा करने, भेदभाव का विरोध करने और सरकारी योजनाओं के बारे में प्रमाणित जानकारी फैलाने में योगदान दे सकते हैं। सहायता करते समय लोगों की निजता, स्वाभिमान और निर्णय लेने के अधिकार का सम्मान करना भी उतना ही जरूरी है।
संकल्प से आगे, मापने योग्य कार्रवाई जरूरी
अंतर्राष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन दिवस हमें याद दिलाता है कि गरीबी किसी व्यक्ति की असफलता का सरल पर्याय नहीं है। इसके पीछे अवसरों की कमी, असमानता, असुरक्षित रोजगार, कमजोर सार्वजनिक सेवाएँ और सामाजिक बहिष्कार जैसे कई कारण हो सकते हैं। इसलिए समाधान भी व्यापक होना चाहिए—ऐसी नीतियाँ जो लोगों को केवल तात्कालिक राहत न दें, बल्कि उन्हें सुरक्षित आवास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक आजीविका के स्थायी अवसर उपलब्ध कराएँ।

भारत और बिहार में गरीबी उन्मूलन का वास्तविक आकलन इस बात से होगा कि विकास का लाभ सबसे पीछे छूटे परिवारों तक कितना पहुँचा। 17 अक्टूबर का संदेश स्पष्ट है: गरीबी के बारे में बात करने के साथ-साथ प्रभावित लोगों को निर्णयों में भागीदार बनाना और प्रगति को ठोस परिणामों से मापना जरूरी है।
