एक कमरे में रखी परमाणु घड़ियों से तय होता है देश का समय; बैंक, टेलीकॉम, पावर ग्रिड, रेलवे और डेटा सेंटरों को भारतीय स्रोत से समय मिलाना होगा, NavIC और White Rabbit नेटवर्क से बनेगा सुरक्षित टाइम सिस्टम
नई दिल्ली। घड़ी में सुबह के 10 बजकर 15 मिनट दिख रहे हैं। मोबाइल, कंप्यूटर, बैंक सर्वर, रेलवे सिस्टम और शेयर बाजार—सब अपने-अपने काम में व्यस्त हैं। लेकिन सवाल यह है कि इन सभी को कैसे पता चलता है कि अभी ठीक 10:15 बजे हैं?
भारत में इस सवाल का जवाब नई दिल्ली की सीएसआईआर-राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (CSIR-NPL) की उस व्यवस्था में छिपा है, जहां देश का आधिकारिक समय यानी Indian Standard Time (IST) तैयार और सुरक्षित रखा जाता है।
अब सरकार इस समय को सिर्फ आम इस्तेमाल की घड़ी का समय नहीं, बल्कि देश के कानूनी और आधिकारिक कामकाज का एक समान संदर्भ बनाने जा रही है। 27 अगस्त 2026 को अधिसूचित Legal Metrology (Indian Standard Time) Rules, 2026 के मुताबिक कानूनी, प्रशासनिक, व्यावसायिक और दूसरे आधिकारिक कामों में IST को मानक समय संदर्भ बनाया जाएगा। नियम 29 अगस्त को राजपत्र में प्रकाशित हुए और 180 दिन बाद, यानी 25 फरवरी 2027 से लागू होंगे।
आखिर NPL में कैसे बनता है भारतीय समय?
IST किसी दीवार पर लगी एक सामान्य घड़ी से तय नहीं होता। CSIR-NPL में बेहद सटीक सीजियम (Cesium) परमाणु घड़ियों और हाइड्रोजन मेजर जैसी तकनीकों से राष्ट्रीय समयमान को बनाए रखा जाता है। NPL के मुताबिक उसकी टाइम स्केल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर BIPM यानी International Bureau of Weights and Measures के UTC से ट्रेसेबल है। सरल भाषा में कहें तो NPL भारत के समय को दुनिया के वैज्ञानिक समयमान से लगातार जोड़कर रखता है।
भारत का IST, UTC(NPLI) से 5 घंटे 30 मिनट आगे होता है। नए नियमों में NPL को देश के प्राथमिक समयमान की देखरेख और IST की प्राप्ति का जिम्मा दिया गया है।
NPL की टाइम-फ्रीक्वेंसी मेट्रोलॉजी व्यवस्था इतनी सटीक है कि वहां इस्तेमाल होने वाली परमाणु घड़ियों की सटीकता सामान्य घड़ियों से बिल्कुल अलग स्तर की है। NPL के अनुसार उसकी मौजूदा व्यवस्था करीब तीन लाख साल में लगभग एक सेकंड के स्तर की स्थिरता रखती है।
2027 से क्या बदलेगा?
अभी भी देश में IST ही सामान्य समय है, लेकिन डिजिटल दुनिया में हर सिस्टम समय के लिए एक ही स्रोत पर निर्भर नहीं करता। कई कंप्यूटर और नेटवर्क अपने समय को अलग-अलग सर्वर या विदेशी सैटेलाइट-आधारित स्रोतों से सिंक्रोनाइज करते हैं। इससे कुछ सिस्टमों में छोटे-छोटे समय अंतर पैदा हो सकते हैं।
नए नियमों का मकसद यही अंतर खत्म करना है। बैंकिंग और डिजिटल पेमेंट, टेलीकॉम, रेलवे, एयरपोर्ट, पावर सिस्टम, सरकारी रिकॉर्ड, वित्तीय सेवाएं और डेटा सेंटर जैसे महत्वपूर्ण सिस्टमों को अधिकृत और IST से ट्रेसेबल स्रोत के साथ अपना समय सिंक्रोनाइज करना होगा।
मसलन, किसी बैंकिंग सिस्टम में किसी ट्रांजैक्शन का टाइमस्टैम्प, किसी टेलीकॉम नेटवर्क का लॉग या किसी सर्वर की गतिविधि दर्ज होती है तो अलग-अलग सिस्टमों के समय में अंतर होने पर घटनाओं का सही क्रम तय करना मुश्किल हो सकता है। एक समान समय संदर्भ से ऐसे रिकॉर्ड को आपस में मिलाना आसान होगा।
सिर्फ सैटेलाइट पर निर्भर नहीं रहेगा सिस्टम
इस पूरी योजना का एक अहम हिस्सा NavIC है। नए नियमों में NavIC को भी अधिकृत भारतीय टाइमिंग स्रोतों में शामिल किया गया है। इसका मतलब यह नहीं कि हर सिस्टम को सीधे सैटेलाइट से ही समय लेना होगा। NPL, Regional Reference Standards Laboratories (RRSLs), ISRO, National Informatics Centre और अन्य अधिकृत स्रोतों के जरिए IST वितरित किया जा सकेगा।
इसके साथ सरकार ने White Rabbit Technology पर आधारित फाइबर नेटवर्क का परीक्षण भी किया है। जुलाई 2026 में बेंगलुरु के Regional Reference Standards Laboratory में IST Dissemination Demonstration Network शुरू किया गया। इस नेटवर्क ने बेंगलुरु और चेन्नई स्थित NSE के बीच सुरक्षित तरीके से IST पहुंचाने का प्रदर्शन किया। इसे Department of Consumer Affairs, CSIR-NPL और ISRO ने मिलकर विकसित किया है।
White Rabbit का फायदा यह है कि समय को केवल सैटेलाइट से नहीं, बल्कि जमीन पर मौजूद फाइबर नेटवर्क के जरिए भी बेहद सटीकता से वितरित किया जा सकता है। इससे सैटेलाइट सिग्नल में रुकावट, जामिंग या स्पूफिंग जैसी परिस्थितियों के दौरान वैकल्पिक व्यवस्था तैयार रखने में मदद मिलती है। नए नियमों में महत्वपूर्ण सिस्टमों के लिए साइबर सुरक्षा, वैकल्पिक टाइम-सिंक्रोनाइजेशन और जामिंग/स्पूफिंग जैसी परिस्थितियों के लिए contingency plan की जरूरत भी रखी गई है।
1947 में रखी नींव, अब देश की घड़ी की जिम्मेदारी
NPL की कहानी भी इस बदलाव को खास बनाती है। इसकी आधारशिला 4 जनवरी 1947 को जवाहरलाल नेहरू ने रखी थी और मुख्य भवन का उद्घाटन 21 जनवरी 1950 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने किया था। आज यही संस्थान भारत का National Metrology Institute है और देश के राष्ट्रीय माप standards के साथ-साथ IST का वैज्ञानिक आधार संभालता है।
यानी जिस दौर में देश अपना वैज्ञानिक और औद्योगिक ढांचा खड़ा कर रहा था, उसी दौर में बनी यह प्रयोगशाला अब डिजिटल भारत की एक और बुनियादी जरूरत—सटीक और भरोसेमंद समय—को संभाल रही है।
क्यों जरूरी है ‘एक देश, एक समय’?
समय की एक-दो सेकंड की गलती आम आदमी की घड़ी में शायद बड़ी बात न लगे। लेकिन जब करोड़ों रुपये के डिजिटल ट्रांजैक्शन, शेयर बाजार के ऑर्डर, टेलीकॉम लॉग, पावर ग्रिड, रेलवे नेटवर्क या सरकारी रिकॉर्ड की बात आती है, तब हर सिस्टम का एक ही भरोसेमंद समय संदर्भ महत्वपूर्ण हो जाता है।
इसीलिए फरवरी 2027 से शुरू होने वाला बदलाव सिर्फ इतना नहीं है कि देश में सबकी घड़ियां एक ही समय दिखाएं। असल बदलाव यह है कि भारत अपने महत्वपूर्ण डिजिटल और औद्योगिक सिस्टमों के लिए समय के स्रोत को भी ज्यादा नियंत्रित, ट्रेसेबल और स्वदेशी बनाना चाहता है।