बछवाड़ा/बेगूसराय: गंगा के बाढ़ के पानी से बड़े इलाके की सुरक्षा करने वाले Gupta-Lakhminia Bandh तटबंध को जेसीबी से काटे जाने की सूचना ने प्रशासन और स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ा दी है। जानकारी के मुताबिक, असामाजिक तत्वों ने तटबंध के एक हिस्से को जेसीबी की मदद से काट दिया।
घटना की जानकारी मिलते ही जल संसाधन विभाग के अधिकारी और स्थानीय पुलिस मौके पर पहुंची और पूरे मामले की जांच शुरू कर दी। फिलहाल प्रशासन की प्राथमिकता बांध की सुरक्षा सुनिश्चित करना और क्षतिग्रस्त हिस्से की स्थिति का आकलन करना है।
यह घटना इसलिए गंभीर मानी जा रही है क्योंकि गुप्ता-लखमिनिया कोई सामान्य ग्रामीण सड़क या मिट्टी का बांध नहीं है। यह गंगा बाढ़ से बचाव के लिए बनाया गया महत्वपूर्ण तटबंध है, जिसके दक्षिणी हिस्से में लंबे समय से बड़ी आबादी रहती है।

सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार यह तटबंध गंगा के उत्तरी किनारे की सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा है और इसका विस्तार एनएच-31 के चकिया/बीटीपीएस क्षेत्र से शुरू होकर बलिया के निकट तक जाता है। बिहार विधानसभा में दिए गए सरकारी जवाब के अनुसार गुप्ता-लखमिनिया तटबंध की लंबाई करीब 35.05 किलोमीटर है।

जेसीबी से बांध काटे जाने की सूचना के बाद क्यों बढ़ी चिंता?
तटबंध का मूल उद्देश्य ही नदी के बढ़ते जलस्तर और बाढ़ के पानी को आबादी वाले क्षेत्र में प्रवेश करने से रोकना है। ऐसे में यदि किसी हिस्से को मशीन से काटकर कमजोर किया जाता है तो यह सिर्फ सड़क या आवागमन से जुड़ा मामला नहीं रह जाता, बल्कि बाढ़ सुरक्षा से सीधे जुड़ा विषय बन जाता है।
स्थानीय स्तर पर घटना की सूचना सामने आने के बाद जल संसाधन विभाग के अधिकारियों का घटनास्थल पर पहुंचना इसी संवेदनशीलता को दर्शाता है। पुलिस भी मामले की पड़ताल में जुटी है। अब जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा यह पता लगाना होगा कि तटबंध को किस स्थान पर, कितनी लंबाई या चौड़ाई में और किस उद्देश्य से काटा गया।
साथ ही यह भी देखा जाएगा कि इससे तटबंध की संरचनात्मक मजबूती पर कितना असर पड़ा है।
यदि कटे हुए हिस्से से पानी का प्रवाह शुरू होता है या नदी का दबाव बढ़ता है तो स्थिति गंभीर हो सकती है। इसलिए विभाग के सामने तत्काल चुनौती केवल कटे हिस्से को भरने की नहीं, बल्कि उसकी तकनीकी मजबूती की जांच और जरूरत के मुताबिक स्थायी सुरक्षा कार्य करने की भी होगी।

गुप्ता-लखमिनिया बांध की क्या है उपयोगिता ?
गुप्ता-लखमिनिया तटबंध की सबसे बड़ी उपयोगिता गंगा की बाढ़ से आबादी और कृषि क्षेत्र की सुरक्षा है। बेगूसराय जिले के कई प्रखंड गंगा की बाढ़ से प्रभावित होते रहे हैं।
2026 में भी गंगा का जलस्तर बढ़ने के दौरान बेगूसराय सदर, बरौनी, बछवाड़ा, तेघड़ा, मटिहानी, बलिया, साहेबपुरकमाल और शाम्हो-अकहा-कुरहा जैसे इलाके बाढ़ की चपेट में आए थे। उस दौरान गुप्ता-लखमिनिया बांध पर कई स्थानों पर बालू भरे बोरे रखने और निगरानी की जानकारी सामने आई थी।
इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह तटबंध इस इलाके के लिए कितना महत्वपूर्ण है। बारिश और गंगा के जलस्तर में वृद्धि के दौरान तटबंध नदी और आबादी के बीच एक महत्वपूर्ण सुरक्षा अवरोध की भूमिका निभाता है।
2020 में भी गंगा का जलस्तर तेजी से बढ़ने के दौरान गुप्ता-लखमिनिया बांध पर दबाव बढ़ गया था। उस समय निपनियां-मधुरापुरा के समीप बाढ़ का पानी बांध के करीब पहुंच गया था और आसपास के कई गांवों के निचले हिस्से जलमग्न हो गए थे।

यानी यह तटबंध केवल कागज पर दर्ज कोई परियोजना नहीं है, बल्कि बाढ़ के समय जमीन पर उसकी उपयोगिता लगातार सामने आती रही है।
बांध से जुड़ा है लंबा इतिहास, लेकिन निर्माण की तारीख पर सरकारी रिकॉर्ड जरूरी
गुप्ता-लखमिनिया बांध का इतिहास भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उपलब्ध पुराने दस्तावेज बताते हैं कि यह तटबंध कम से कम 1990 के दशक से गंगा की बाढ़ और कटाव के खिलाफ सुरक्षा व्यवस्था का अहम हिस्सा रहा है। 1995 में गंगा से जुड़े एक संसदीय विमर्श में गुप्ता-लखमिनिया बांध का उल्लेख विस्तार से हुआ था।
उस समय गंगा के कटाव से विस्थापित परिवारों के बांध पर पहुंचने और तटबंध की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई थी।
हालांकि उपलब्ध प्रमाणित स्रोतों में इस तटबंध के मूल निर्माण का सटीक वर्ष स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं मिला है। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि इसका निर्माण किसी खास वर्ष में हुआ था। लेकिन पुराने सरकारी और संसदीय दस्तावेज यह जरूर साबित करते हैं कि कई दशक से यह क्षेत्र की बाढ़ सुरक्षा व्यवस्था में मौजूद रहा है।

पुराने रिकॉर्ड में गंगा कटाव, तटबंध की मजबूती और विस्थापित परिवारों की समस्या का उल्लेख यह भी बताता है कि गुप्ता-लखमिनिया बांध की कहानी सिर्फ बाढ़ रोकने तक सीमित नहीं रही है। इसके आसपास रहने वाले लोगों का जीवन, खेती, आवागमन और पुनर्वास जैसे मुद्दे भी लंबे समय से इससे जुड़े रहे हैं।
35 किलोमीटर से अधिक लंबा है तटबंध
गुप्ता-लखमिनिया तटबंध को लेकर बिहार विधानसभा में सरकार की ओर से दिए गए जवाब में इसकी लंबाई 35.05 किलोमीटर बताई गई थी। बाद में जल संसाधन विभाग से एनओसी मिलने के बाद इस पूरी लंबाई में 3.75 मीटर चौड़ाई वाले मार्ग के मजबूतीकरण का काम पूरा किए जाने की जानकारी भी विधानसभा के रिकॉर्ड में दर्ज है। यह काम 30 नवंबर 2023 तक पूरा होने की बात कही गई थी।
इससे यह भी स्पष्ट होता है कि तटबंध का महत्व केवल बाढ़ नियंत्रण तक सीमित नहीं है। इसके ऊपर या इससे जुड़े मार्ग का इस्तेमाल स्थानीय आवागमन के लिए भी होता है। इसी कारण इसे मजबूत करने और चौड़ा करने की मांग भी समय-समय पर उठती रही है।
2014 के बिहार सरकार के दस्तावेज में चकिया से एनएच-31, लखमिनिया और बलिया होते हुए गुप्ता-लखमिनिया बांध के रास्ते को विकसित करने की योजना का भी उल्लेख मिलता है। इससे इस मार्ग के परिवहन महत्व का पता चलता है।

बाढ़ के समय बन जाता है जीवनरेखा जैसा रास्ता
गुप्ता-लखमिनिया बांध के आसपास रहने वाले लोगों के लिए इसका महत्व दोहरा है। एक तरफ यह बाढ़ से सुरक्षा देने वाला तटबंध है, तो दूसरी तरफ इससे जुड़ा मार्ग कई गांवों के लिए संपर्क का महत्वपूर्ण साधन है।
बाढ़ के समय जब आसपास के सामान्य रास्ते पानी में डूब जाते हैं, तब ऊंचे तटबंध पर बना या उससे जुड़ा रास्ता लोगों, प्रशासन, पुलिस, राहत टीम और आपातकालीन सेवाओं के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। पूर्व में भी इस मार्ग को बाढ़ के दौरान प्रशासनिक आवाजाही के लिए उपयोगी बताया गया है।
इसके अलावा तटबंध से जुड़े क्षेत्र में खेती करने वाले किसानों के लिए भी इसकी भूमिका अहम है। गंगा के आसपास के इलाकों में खेती और बाढ़ का चक्र एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ है। तटबंध की सुरक्षा कमजोर होने का सीधा असर खेतों, फसलों और ग्रामीण आबादी पर पड़ सकता है।
बांध की सड़क को विकसित करने पर भी होता रहा है काम
समय के साथ गुप्ता-लखमिनिया बांध से जुड़े मार्ग को बेहतर बनाने की दिशा में भी सरकारी स्तर पर काम हुआ है। 2022 में बिहार विधानसभा में सरकार ने बताया था कि जल संसाधन विभाग से एनओसी प्राप्त करने के बाद पथ निर्माण विभाग द्वारा करीब 35.05 किलोमीटर लंबे हिस्से में एकल लेन सड़क के मजबूतीकरण का काम किया जा रहा है।

2023 में इस मजबूतीकरण कार्य के पूरा होने की जानकारी विधानसभा रिकॉर्ड में दी गई। इसके साथ ही तटबंध को भविष्य में चौड़ा करने की संभावनाओं पर भी विचार किए जाने की बात कही गई थी।
2025 में मुख्यमंत्री की बेगूसराय यात्रा के दौरान भी गुप्ता-लखमिनिया बांध के चौड़ीकरण और नए रिंग बांध से जुड़े प्रस्तावों पर चर्चा हुई थी। इससे साफ है कि यह तटबंध क्षेत्र की बाढ़ सुरक्षा के साथ-साथ यातायात और क्षेत्रीय विकास की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
अब जांच के बाद साफ होगी पूरी तस्वीर
फिलहाल जेसीबी से बांध काटे जाने की घटना में सबसे अहम सवाल यही है कि तटबंध को किसने और किस उद्देश्य से काटा? क्या इसे जानबूझकर कमजोर करने की कोशिश की गई या इसके पीछे कोई अन्य कारण था? इसका जवाब पुलिस और विभागीय जांच के बाद ही सामने आएगा।
लेकिन घटना ने एक बार फिर गुप्ता-लखमिनिया तटबंध की संवेदनशीलता को सामने ला दिया है। जिस तटबंध पर बाढ़ के मौसम में नदी का दबाव रहता है, वहां बिना अनुमति किसी भी तरह की खुदाई या कटाव सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।

ऐसे में स्थानीय लोगों की नजर अब प्रशासन की कार्रवाई पर है। उम्मीद यही होगी कि जांच के साथ-साथ तटबंध के क्षतिग्रस्त हिस्से की तकनीकी जांच, तत्काल सुरक्षा और आवश्यकता पड़ने पर मजबूत मरम्मत भी सुनिश्चित की जाए, ताकि गंगा का जलस्तर बढ़ने की स्थिति में किसी बड़े खतरे की आशंका न रहे।
फिलहाल पुलिस और जल संसाधन विभाग की जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि तटबंध को काटने की घटना के पीछे कौन लोग थे और इसका वास्तविक उद्देश्य क्या था।
