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Home - देश - 2 करोड़ लोगों का पेट भरता है; फिर दुनिया इस फसल से अनजान क्यों?

2 करोड़ लोगों का पेट भरता है; फिर दुनिया इस फसल से अनजान क्यों?

आभा शुक्ला
Last updated: सितम्बर 30, 2026 11:12 पूर्वाह्न
By : आभा शुक्ला
Published on : 16 घंटे पहले
Enset: 2 करोड़ लोगों का पेट भरने वाली ‘भूख के खिलाफ फसल’
Enset: 2 करोड़ लोगों का पेट भरने वाली ‘भूख के खिलाफ फसल’
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केले जैसा दिखने वाला एन्सेट 10 मीटर तक ऊंचा हो सकता है; सूखा झेलने और सालभर जरूरत के हिसाब से काटे जाने की क्षमता इसे खास बनाती है, वैज्ञानिकों के मुताबिक अफ्रीका के बड़े हिस्से में फैल सकती है इसकी खेती।

दुनिया में कुछ ही फसलें ऐसी हैं जिन पर इंसानों की खाद्य व्यवस्था बहुत ज्यादा निर्भर है। चावल, गेहूं और मक्का जैसे अनाज दुनिया की बड़ी आबादी को भोजन देते हैं। लेकिन अफ्रीका के इथियोपिया में एक ऐसी फसल भी है, जो दुनिया भर में लगभग अनजान है और फिर भी 2 करोड़ से ज्यादा लोगों की खाद्य जरूरत का महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है।

इसका नाम है एन्सेट (Ensete ventricosum)।

इसे स्थानीय तौर पर और वैज्ञानिक जगत में ‘Tree Against Hunger’ यानी ‘भूख के खिलाफ पेड़’ कहा जाता है। हालांकि नाम में पेड़ है, लेकिन एन्सेट असल में केले के परिवार का एक विशाल शाकाहारी पौधा है। इसका आकार इतना बड़ा हो सकता है कि दूर से यह किसी पेड़ जैसा दिखाई देता है। यह करीब 10 मीटर तक ऊंचा हो सकता है और इसकी पत्तियां लगभग 5 मीटर तक लंबी हो सकती हैं।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि एन्सेट अफ्रीका के कई हिस्सों में जंगली रूप में पाया जाता है, लेकिन फसल के रूप में इसका घरेलूकरण यानी व्यवस्थित कृषि उपयोग मुख्य रूप से इथियोपिया के दक्षिण-पश्चिमी उच्चभूमि क्षेत्रों में ही हुआ। यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे दुनिया की उन फसलों में गिनते हैं, जिनमें बड़ी संभावनाएं होने के बावजूद वैश्विक स्तर पर बहुत कम ध्यान दिया गया।

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‘केले जैसा’ दिखता है, लेकिन खाना अलग हिस्से से बनता है

एन्सेट को देखकर सबसे पहले केले की याद आती है। दोनों एक ही परिवार यानी Musaceae से जुड़े हैं। इसलिए इसे अंग्रेजी में ‘False Banana’ यानी नकली केला भी कहा जाता है।

लेकिन दोनों में एक बड़ा अंतर है।

केले में मुख्य भोजन फल होता है, जबकि एन्सेट में किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसका फल नहीं, बल्कि pseudostem यानी आभासी तना और जमीन के नीचे मौजूद corm यानी कंदनुमा हिस्सा है।

एन्सेट का असली तना लकड़ी का नहीं होता। इसकी पत्तियों के आधार एक-दूसरे के ऊपर कसकर लिपटते जाते हैं और इससे तने जैसा मजबूत ढांचा बनता है। इसी को pseudostem कहा जाता है।

इसके नीचे जमीन में एक मोटा, मांसल corm होता है। दोनों हिस्सों में मौजूद स्टार्च को निकालकर अलग-अलग खाद्य पदार्थ बनाए जाते हैं।

एन्सेट के पीले या नारंगी फल बाहर से छोटे केले जैसे दिख सकते हैं। उनमें गूदा मौजूद होता है, लेकिन बड़े और कठोर काले बीज होने के कारण इन्हें सामान्य केले की तरह फल के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाता।


महीनों तक चलती है खाने की तैयारी

एन्सेट को भोजन में बदलने की प्रक्रिया भी सामान्य अनाज की तरह आसान नहीं है। इसके pseudostem और corm को काटकर, साफ करके और पीसकर स्टार्चयुक्त गूदा तैयार किया जाता है।

इस सामग्री को पारंपरिक तरीके से जमीन के भीतर गड्ढों में रखकर किण्वित यानी ferment किया जाता है। यह प्रक्रिया कई महीनों तक चल सकती है और कुछ मामलों में करीब एक साल तक भी पहुंचती है।

इससे तैयार होने वाला प्रमुख खाद्य पदार्थ कोचो (Kocho) है। यह एक तरह का स्टार्चयुक्त, किण्वित खाद्य पदार्थ है, जिसे इथियोपिया में कई तरह के भोजन के साथ खाया जाता है।

एन्सेट के दूसरे हिस्सों से बुल्ला (Bulla) और अमीचो (Amicho) भी तैयार किए जाते हैं। कंद को आलू की तरह उबालकर इस्तेमाल किया जा सकता है, जबकि pseudostem से निकले स्टार्चयुक्त पदार्थ को प्रसंस्करण के बाद भोजन में बदला जाता है।

यानी यह ऐसी फसल है जिसे खेत से निकालते ही खाने के बजाय स्थानीय ज्ञान और लंबे समय से विकसित पारंपरिक तकनीक के जरिए भोजन में बदला जाता है।


सिर्फ 60 पौधे, 5 लोगों के परिवार के लिए सालभर का खाना

एन्सेट को ‘भूख के खिलाफ पेड़’ कहे जाने के पीछे सिर्फ इसकी लोकप्रियता नहीं, बल्कि इसके कई कृषि गुण हैं।

Kew के अनुसार, अनुमान है कि करीब 60 एन्सेट पौधे पांच लोगों के परिवार को एक साल तक भोजन दे सकते हैं। वहीं एक व्यक्ति के लिए लगभग 15 पौधों का अनुमान भी Kew की सामग्री में दिया गया है। यह आंकड़ा परिस्थितियों, किस्म और उत्पादन पर निर्भर करता है, इसलिए इसे एक सामान्य अनुमान के रूप में समझना चाहिए, निश्चित नियम के तौर पर नहीं।

एन्सेट की एक और बड़ी खासियत है कि इसे हर साल गेहूं या मक्का की तरह दोबारा बोना जरूरी नहीं होता।

यह बहुवर्षीय पौधा है। कुछ पौधे कई वर्षों तक खेत में बढ़ते रह सकते हैं और फूल आने से पहले जरूरत के हिसाब से काटे जा सकते हैं। पुराने शोध के मुताबिक, यह कई वर्षों तक बढ़ सकता है और इस दौरान किसान अलग-अलग समय पर इसकी कटाई कर सकते हैं।

यही लचीलापन इसे खाद्य संकट के समय खास बनाता है।

अगर किसी साल दूसरी फसल खराब हो जाए, तो खेत में मौजूद एन्सेट को जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल किया जा सकता है। Kew के शोध में यह भी पाया गया कि इथियोपिया के छोटे किसान गंभीर सूखे के बाद एन्सेट की खेती बढ़ाते हैं, यानी यह फसल उनके लिए संकट के समय खाद्य सुरक्षा का सहारा बनती है।


सूखा आया तो भी एन्सेट काम आता है

जलवायु परिवर्तन के दौर में एन्सेट की अहमियत यहीं से बढ़ जाती है।

यह कई दूसरी प्रमुख खाद्य फसलों की तुलना में सूखे को बेहतर ढंग से सहन कर सकता है। साथ ही इसे रोगों के प्रति भी अपेक्षाकृत सहनशील माना जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि एन्सेट हर सूखे या हर बीमारी से सुरक्षित है, बल्कि यह है कि इसकी कुछ जैविक विशेषताएं इसे बदलती जलवायु में उपयोगी बनाती हैं।

इसके अलावा एन्सेट का इस्तेमाल सिर्फ भोजन के लिए नहीं होता।

इससे मिलने वाले रेशे का उपयोग निर्माण और बुनाई में किया जाता है। इसकी पत्तियों का इस्तेमाल छत, पैकेजिंग और अन्य घरेलू कामों में हो सकता है। पौधे के कुछ हिस्से पशुओं के चारे के रूप में भी काम आते हैं। स्थानीय समुदायों में इसके कुछ रूपों का इस्तेमाल पारंपरिक चिकित्सा और धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में भी होता है।

इस तरह एन्सेट एक ऐसी फसल है जिसमें भोजन के अलावा भी कई उपयोग जुड़े हुए हैं।


फिर सवाल: दुनिया में क्यों नहीं फैला?

यहीं से एन्सेट की सबसे बड़ी पहेली शुरू होती है।

जंगली एन्सेट पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका के बड़े हिस्से में पाया जाता है। लेकिन इसकी खेती और घरेलू किस्मों का विकास मुख्य रूप से इथियोपिया में ही हुआ।

आम तौर पर जब कोई फसल किसी क्षेत्र में सफल होती है तो व्यापार, प्रवास और कृषि विस्तार के जरिए वह दूसरे देशों तक पहुंचती है। आलू और टमाटर इसके बड़े उदाहरण हैं, जो अपने मूल क्षेत्र से निकलकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों की खेती का हिस्सा बन गए।

एन्सेट के साथ ऐसा नहीं हुआ।

वैज्ञानिकों के मुताबिक इसके पीछे भूगोल, इतिहास, संस्कृति और कृषि ज्ञान—चारों का मिश्रण हो सकता है।


इथियोपिया की ऊंची जमीन ने बनाया ‘कृषि द्वीप’

एन्सेट की घरेलू खेती दक्षिण-पश्चिमी इथियोपिया के उच्चभूमि क्षेत्रों से जुड़ी है। ये इलाके समुद्र तल से काफी ऊंचाई पर हैं और वहां की जलवायु एन्सेट के लिए अनुकूल है।

Kew के शोध के मुताबिक, इथियोपिया की ऊंची जमीन को आसपास के अपेक्षाकृत गर्म और शुष्क निचले इलाकों से एक तरह की प्राकृतिक बाधा मिलती है। इस भौगोलिक स्थिति ने संभवतः एन्सेट आधारित कृषि के बाहर फैलने को सीमित किया।

लेकिन सिर्फ मौसम इसका कारण नहीं है।

एन्सेट को भोजन में बदलने की पूरी प्रक्रिया सदियों के स्थानीय अनुभव से विकसित हुई है। कौन-सी किस्म किस इलाके में अच्छी होती है, कब पौधे को काटना है, कैसे छीलना है, कैसे गूदा निकालना है, कितना समय ferment करना है और किस तरह भोजन बनाना है—इन सबके लिए स्थानीय ज्ञान जरूरी है।

यानी किसी दूसरे देश में सिर्फ एन्सेट का पौधा पहुंचा देना पर्याप्त नहीं होगा।


जंगली एन्सेट और घरेलू एन्सेट में भी फर्क

यहां एक और महत्वपूर्ण बात है।

अफ्रीका के दूसरे हिस्सों में मिलने वाला जंगली एन्सेट, इथियोपिया में सदियों से विकसित घरेलू किस्मों जैसा खाद्य उपयोगी नहीं हो सकता। Kew के शोध में जंगली एन्सेट को अपेक्षाकृत कड़वा और कम स्वादिष्ट बताया गया है। दूसरी ओर, इथियोपिया में किसानों ने अलग-अलग परिस्थितियों और जरूरतों के अनुसार इसकी अनेक स्थानीय किस्में विकसित और संरक्षित की हैं।

यही वजह है कि एन्सेट को दूसरे देशों में ले जाने का सवाल केवल ‘पौधा वहां उगा सकता है या नहीं’ तक सीमित नहीं है। इसके साथ आनुवंशिक विविधता, स्थानीय किस्में और सदियों का कृषि ज्ञान भी जुड़ा है।


Ethiopia अपने पौधों के संसाधनों को लेकर सतर्क

एन्सेट के अंतरराष्ट्रीय विस्तार के रास्ते में एक और मुद्दा है—जैव-संसाधनों की सुरक्षा और लाभ का बंटवारा।

इथियोपिया अपने जैविक संसाधनों और स्थानीय फसलों को लेकर सतर्क रहा है। इससे पहले देश की पारंपरिक फसल टेफ (Teff) से जुड़े पेटेंट विवाद ने भी यह सवाल उठाया था कि किसी देश की सदियों पुरानी जैविक और कृषि विरासत से दूसरे पक्ष किस तरह लाभ हासिल कर सकते हैं।

इसलिए एन्सेट को दूसरे देशों में ले जाने की प्रक्रिया केवल वैज्ञानिक नहीं, बल्कि भरोसे, नियमों और यह सुनिश्चित करने से भी जुड़ी है कि इसके मूल समुदायों और देश को उचित लाभ मिले।

यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एन्सेट के विस्तार की बात करते समय access and benefit sharing यानी संसाधन तक पहुंच और उससे होने वाले लाभ के उचित बंटवारे की चर्चा भी महत्वपूर्ण हो जाती है।


Kew में पहुंचा तो चार साल बाद खिला

एन्सेट को दुनिया के दूसरे हिस्सों में उगाने की संभावना सिर्फ कंप्यूटर मॉडल तक सीमित नहीं है।

इंग्लैंड के Royal Botanic Gardens, Kew में भी एन्सेट को उगाया गया। Kew और इथियोपियाई शोधकर्ताओं के बीच लंबे समय से वैज्ञानिक सहयोग रहा है, जिसकी मदद से पौधे का अध्ययन और संरक्षण किया गया।

Kew के अनुसार, वहां एन्सेट को पहली बार 2019 में लाया गया था, जब पौधा लगभग 30 सेंटीमीटर ऊंचा था। इसके बाद अप्रैल 2023 में Temperate House में पहली बार एन्सेट में फूल आया।

यह इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे यह भी दिखा कि इथियोपिया के बाहर नियंत्रित परिस्थितियों में पौधे को लंबे समय तक विकसित किया जा सकता है।

हालांकि इसे सीधे बड़े पैमाने पर व्यावसायिक खेती की सफलता मानना सही नहीं होगा। किसी पौधे का एक botanical garden में उग जाना और हजारों किसानों के लिए किसी नए इलाके में आर्थिक रूप से सफल फसल बन जाना दो अलग बातें हैं।


12 गुना तक बढ़ सकता है खेती का क्षेत्र?

यही वह हिस्सा है जिसने वैज्ञानिकों का ध्यान सबसे ज्यादा खींचा है।

2022 में Environmental Research Letters में प्रकाशित एक मॉडलिंग अध्ययन में शोधकर्ताओं ने देखा कि वर्तमान जलवायु और भविष्य के कुछ जलवायु परिदृश्यों में एन्सेट किन इलाकों में उग सकता है।

अध्ययन का निष्कर्ष था कि एन्सेट की संभावित खेती का क्षेत्र मौजूदा क्षेत्र की तुलना में करीब 12 गुना तक बढ़ सकता है। संभावित इलाके सिर्फ इथियोपिया तक सीमित नहीं थे, बल्कि केन्या और युगांडा सहित उप-सहारा अफ्रीका के अन्य हिस्सों में भी उपयुक्त क्षेत्र मिलने की संभावना जताई गई।

मॉडलिंग के एक व्यापक अनुमान में एन्सेट की संभावित खेती से करीब 11.15 करोड़ अतिरिक्त लोगों तक खाद्य सुरक्षा पहुंचाने की क्षमता का आंकड़ा सामने आया था।

लेकिन यहां एक बात बहुत जरूरी है—11.15 करोड़ लोगों का आंकड़ा वास्तविक रूप से इतने लोगों को भोजन मिलना नहीं है। यह जलवायु और भौगोलिक उपयुक्तता के मॉडल पर आधारित संभावित क्षमता है। वास्तविक दुनिया में इसके लिए बीज/planting material, स्थानीय किस्में, जमीन, पानी, किसान का ज्ञान, प्रसंस्करण व्यवस्था, बाजार और सरकारी नीतियां जैसी कई चीजें जरूरी होंगी।


एन्सेट की खेती करना भी आसान नहीं

अगर एन्सेट इतना उपयोगी है तो इसे हर जगह क्यों नहीं लगाया जा रहा? इसका एक कारण इसकी मेहनत वाली खेती और processing भी है।

पारंपरिक तरीके से एन्सेट की कटाई और प्रसंस्करण काफी श्रमसाध्य है। इसमें पौधे को काटना, छीलना, गूदा निकालना, पीसना और ferment करना पड़ता है।

इस काम का बड़ा हिस्सा महिलाओं द्वारा किया जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस प्रक्रिया को कम मेहनत वाला बनाने के लिए कई इथियोपियाई विश्वविद्यालयों में mechanized यानी मशीन आधारित समाधान विकसित किए जा रहे हैं, लेकिन उनका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल अभी सीमित है।

यानी एन्सेट को वैश्विक फसल बनाने के लिए सिर्फ यह साबित करना काफी नहीं कि पौधा उग सकता है। यह भी जरूरी है कि किसान इसे कम मेहनत, बेहतर आय और सुरक्षित तरीके से उगा और संसाधित कर सकें।


स्वाद और स्थानीय पसंद भी बड़ी वजह

फसल का सफल होना केवल उसकी जैविक क्षमता पर निर्भर नहीं करता।

लोग उसे खाना पसंद करते हैं या नहीं, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

एन्सेट से बने कोचो जैसे खाद्य पदार्थ इथियोपिया के कुछ समुदायों के लिए पारंपरिक भोजन हैं, लेकिन बाहर के लोगों के लिए इसका स्वाद और बनावट अलग अनुभव हो सकता है। इसलिए किसी नए देश में एन्सेट को लोकप्रिय बनाने के लिए स्थानीय खान-पान के साथ उसका तालमेल भी जरूरी होगा।

सदियों में विकसित स्थानीय ज्ञान भी इसकी ताकत है और विस्तार की चुनौती भी।


विडंबना: दुनिया को विकल्प चाहिए, इथियोपिया में खेती घट रही

एन्सेट की कहानी का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है।

एक तरफ वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन और खाद्य असुरक्षा से निपटने वाली संभावित फसल मान रहे हैं। दूसरी तरफ इथियोपिया के कुछ पारंपरिक इलाकों में इसकी खेती कम हो रही है।

Kew और Addis Ababa University के 2025 के अध्ययन में दक्षिण-पश्चिमी इथियोपिया के 20 सांस्कृतिक क्षेत्रों में 400 से ज्यादा किसानों के साथ बातचीत की गई।

इनमें करीब 60% किसानों ने बताया कि पिछले कुछ दशकों में एन्सेट के लिए इस्तेमाल होने वाली जमीन कम हुई है। कुछ किसानों ने बताया कि पहले उनके खेत का बड़ा हिस्सा एन्सेट के लिए इस्तेमाल होता था, लेकिन अब वहां मक्का और आलू जैसी फसलों की खेती बढ़ गई है।

किसानों ने घरेलू खपत में भी गिरावट बताई। अध्ययन के अनुसार, कुछ इलाकों में बुजुर्ग किसानों ने बताया कि करीब 20 साल पहले कोचो दिन में तीन बार तक खाया जाता था, जबकि अब इसका सेवन काफी कम हो गया है।

यानी जिस फसल को दुनिया संभावित ‘भविष्य की फसल’ के तौर पर देख रही है, उसके पारंपरिक किसान खुद दूसरी फसलों की ओर बढ़ रहे हैं।


एन्सेट की असली ताकत सिर्फ भोजन नहीं, विविधता भी है

एन्सेट की एक बड़ी वैज्ञानिक संपत्ति इसकी आनुवंशिक और स्थानीय विविधता है।

2019 के Kew material में शोधकर्ताओं ने अलग-अलग स्थानीय नामों वाली 1,500 से ज्यादा किस्मों/नामों का रिकॉर्ड मिलने की बात कही थी, जबकि Kew की बाद की परियोजनाओं में सैकड़ों नामित varieties और स्थानीय genetic diversity के संरक्षण पर काम जारी है।

यह विविधता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अलग-अलग किस्में अलग जलवायु, मिट्टी, रोग और उपयोग के लिए अनुकूल हो सकती हैं।

भविष्य में अगर जलवायु और कृषि परिस्थितियां बदलती हैं तो इन्हीं स्थानीय किस्मों से ऐसे गुण मिल सकते हैं जो नई परिस्थितियों में फसल सुधार के काम आएं।

इसलिए वैज्ञानिकों के लिए जंगली एन्सेट का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है। जंगली पौधों में मौजूद आनुवंशिक विविधता भविष्य के breeding programmes के लिए उपयोगी हो सकती है।


किसान भी बचा रहे हैं, वैज्ञानिक भी खोज रहे हैं

Kew और उसके सहयोगी संगठनों ने एन्सेट की दुर्लभ किस्मों को बचाने के लिए स्थानीय किसानों के साथ संरक्षण कार्यक्रम भी चलाए हैं। विचार यह है कि किसानों को ऐसी किस्में उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए जो धीरे-धीरे खेती से गायब हो रही हैं।

यहां बात सिर्फ किसी पौधे को बचाने की नहीं है। इसके साथ जुड़ा है स्थानीय ज्ञान, भोजन की परंपरा, कृषि तकनीक, जैव-विविधता और भविष्य की खाद्य सुरक्षा।

यही वजह है कि वैज्ञानिक एन्सेट को सिर्फ एक ‘अजीब पौधा’ नहीं, बल्कि एक संभावित underutilised food-security crop यानी कम इस्तेमाल की गई खाद्य-सुरक्षा फसल के रूप में देखते हैं।


एन्सेट को जानिए: एक नजर में

खासियतजानकारी
वैज्ञानिक नामEnsete ventricosum
परिवारMusaceae यानी केला परिवार
आम नामFalse Banana, Abyssinian Banana
खास उपनामTree Against Hunger
ऊंचाईकरीब 10 मीटर तक
मुख्य खाद्य हिस्साPseudostem और underground corm
प्रमुख खाद्य पदार्थKocho, Bulla, Amicho
इथियोपिया में निर्भर आबादी2 करोड़ से ज्यादा
परिवार के लिए अनुमानकरीब 60 पौधे/5 सदस्यीय परिवार/एक साल
प्रमुख खेती क्षेत्रदक्षिण-पश्चिमी इथियोपिया के उच्चभूमि इलाके
खास गुणबहुवर्षीय, सूखा-सहनशील, लचीली कटाई
संभावित विस्तारमौजूदा खेती क्षेत्र से करीब 12 गुना तक
मॉडलिंग में संभावित अतिरिक्त आबादीकरीब 11.15 करोड़ तक
2025 अध्ययन400+ किसान, 20 सांस्कृतिक क्षेत्र
वर्तमान चुनौतीखेती में कमी, श्रमसाध्य processing और स्थानीय ज्ञान का संरक्षण

दुनिया की थाली के लिए एन्सेट का संदेश

एन्सेट की कहानी यह नहीं कहती कि गेहूं, चावल या मक्का की जगह अब यही फसल ले लेगी। बल्कि यह एक बड़ा सवाल सामने रखती है—क्या दुनिया ने खाद्य सुरक्षा के लिए बहुत कम फसलों पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता बना ली है?

जलवायु बदल रही है, सूखा और मौसम की अनिश्चितता बढ़ रही है और खेती को कम संसाधनों में ज्यादा भोजन पैदा करना है। ऐसे में केवल सबसे लोकप्रिय फसलों पर निर्भर रहने के बजाय उन स्थानीय फसलों को भी समझना जरूरी हो सकता है, जिन्हें सदियों से किसान अलग-अलग परिस्थितियों में बचाते और इस्तेमाल करते आए हैं।

एन्सेट उनमें से एक है।

यह इथियोपिया के लिए सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि भोजन, संस्कृति, स्थानीय ज्ञान और जैव-विविधता का हिस्सा है। और दुनिया के लिए शायद एक याद दिलाने वाली कहानी—कि भविष्य की खाद्य सुरक्षा का कोई महत्वपूर्ण विकल्प जरूरी नहीं कि आज की सबसे प्रसिद्ध फसलों में ही छिपा हो। कभी-कभी वह किसी ऐसे पौधे में भी हो सकता है, जिसे दुनिया का बड़ा हिस्सा अभी पहचानता तक नहीं।

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Byआभा शुक्ला
आभा शुक्ला पत्रकारिता, जनसंपर्क और कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन के क्षेत्र में 5+ वर्षों के अनुभव वाली पत्रकार एवं कम्युनिकेशन प्रोफेशनल हैं। पटना से जुड़ीं आभा को समाचार शोध, रिपोर्टिंग, कंटेंट डेवलपमेंट, मीडिया आउटरीच और जनसंपर्क अभियानों का अनुभव है। उन्होंने Zee News में ट्रेनी जर्नलिस्ट के रूप में समाचार शोध, रिपोर्टिंग और कंटेंट डेवलपमेंट का अनुभव हासिल किया। इसके बाद UNE Consultant में PR Executive के तौर पर मीडिया आउटरीच, PR कैंपेन और कॉर्पोरेट इवेंट्स पर काम किया। TCS में Associate के रूप में उन्होंने डेटा मैनेजमेंट, रिसर्च और सूचना प्रबंधन से जुड़ी जिम्मेदारियां संभालीं। आभा शुक्ला तथ्यपरक, शोध-आधारित और प्रभावी पत्रकारिता के माध्यम से सामाजिक एवं समसामयिक मुद्दों को पाठकों तक पहुंचाने में रुचि रखती हैं।
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