स्टारलिंक की भारत में एंट्री में देरी पर मुकेश अंबानी को घेरा, पूछा—‘क्या अंबानी ही भारत के असली बॉस हैं?’ कमल हासन ने याद दिलाया—भारत लोकतंत्र है, कोई कॉलोनी नहीं; अब Elon Musk के अपने राजनीतिक और कारोबारी रिश्तों पर भी उठ रहे सवाल
भारत में स्टारलिंक की एंट्री में देरी पर Elon Musk ने मुकेश अंबानी पर तंज कसा और पूछा कि क्या अंबानी ही भारत के असली बॉस हैं? अभिनेता और राज्यसभा सांसद कमल हासन ने जवाब दिया कि भारत लोकतंत्र है, कोई कॉलोनी नहीं।
लेकिन भारत में कारोबारी प्रभाव पर सवाल उठाने वाले मस्क को अपने कारोबारी हितों और राजनीतिक रिश्तों का हिसाब भी देना चाहिए। आखिर जब बात सत्ता और कारोबार के रिश्तों की हो, तो सवाल सिर्फ दूसरों से क्यों—जवाबदेही अपनी भी होनी चाहिए।
पहले अमेरिका का हिसाब देखिए, जहां मस्क ने ट्रंप के चुनाव में झोंके करोड़ों डॉलर
द वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में मस्क ने डोनाल्ड ट्रंप और अन्य रिपब्लिकन उम्मीदवारों के समर्थन में कम से कम 28.8 करोड़ डॉलर खर्च किए। यह चुनाव में किसी एक दानदाता की सबसे बड़ी राजनीतिक रकमों में शामिल थी।

राजनीतिक चंदा देना गैरकानूनी नहीं है। लेकिन जब कोई कारोबारी चुनाव में इतनी बड़ी रकम लगाता है और फिर सत्ता के शीर्ष नेतृत्व के साथ सरकारी कामकाज में भूमिका निभाता है, तो उसके राजनीतिक प्रभाव और कारोबारी हितों पर सवाल भी उठेंगे। भारत में उद्योगपतियों के प्रभाव पर सवाल पूछने वाले मस्क को इस कसौटी पर अपने रिकॉर्ड से भी गुजरना चाहिए।
सरकारी ठेकों से खड़ा हुआ कारोबार, फिर सरकारी खर्च पर सवाल
द न्यूयॉर्क टाइम्स की अक्टूबर 2024 की पड़ताल के मुताबिक, स्पेसएक्स और मस्क की एक अन्य कंपनी को पिछले दशक में कम से कम 15.4 अरब डॉलर के अमेरिकी सरकारी ठेके मिले थे। द वॉशिंगटन पोस्ट की 2025 की पड़ताल ने मस्क के कारोबारी उपक्रमों को मिले सरकारी ठेकों, ऋणों, सब्सिडी और कर-छूटों का कुल मूल्य करीब 38 अरब डॉलर बताया। यह अलग-अलग प्रकार की सहायता का कुल मूल्य था, केवल नकद अनुदान नहीं।
स्पेसएक्स अमेरिकी सरकारी एजेंसियों के लिए अंतरिक्ष और उपग्रह संबंधी काम करती है, जबकि टेस्ला को भी सरकारी नीतियों और प्रोत्साहन योजनाओं से लाभ मिला है। सरकारी ठेके लेना गलत नहीं है, लेकिन जब कारोबार को सरकारी फैसलों और नीतियों से लाभ मिलता हो, तो कारोबारी प्रभाव पर सवाल सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहने चाहिए।
मस्क को भी बताना चाहिए कि सरकारी सहायता से जुड़े अपने कारोबारी हितों को वह किस नजर से देखते हैं।

DOGE में भूमिका: खर्च घटाने की जिम्मेदारी और अपनी कंपनियों के हितों का सवाल
ट्रंप प्रशासन में मस्क सरकारी खर्च और कामकाज में कटौती के अभियान डिपार्टमेंट ऑफ गवर्नमेंट एफिशिएंसी (DOGE) से जुड़े। इसी दौरान अमेरिकी सांसदों ने उनकी सरकारी भूमिका और स्पेसएक्स जैसी कंपनियों के सरकारी अनुबंधों के बीच संभावित हितों के टकराव पर सवाल उठाए।
यह किसी अपराध के सिद्ध होने का मामला नहीं, बल्कि सरकारी फैसलों और निजी कारोबारी हितों के बीच पारदर्शिता का सवाल है। जब मस्क खुद सरकारी कामकाज में बदलाव की भूमिका में थे और उनकी कंपनियां सरकारी एजेंसियों के साथ कारोबार कर रही थीं, तो जवाबदेही का सवाल उनसे भी बनता है। भारत में नियमों पर सवाल उठाने से पहले इस कसौटी को अपने मामले में भी लागू करना चाहिए।
ट्रंप से दोस्ती केवल मंच साझा करने तक सीमित नहीं रही
मस्क ने ट्रंप के चुनाव अभियान का समर्थन किया और चुनाव के बाद सरकारी कामकाज में बदलाव के अभियान से जुड़े। जून 2025 में टैक्स और खर्च संबंधी विधेयक को लेकर दोनों के बीच सार्वजनिक विवाद हुआ। ट्रंप ने मस्क की कंपनियों को मिलने वाली सरकारी सहायता पर निशाना साधा, जबकि मस्क ने ट्रंप की नीतियों की आलोचना की।
यह घटनाक्रम दिखाता है कि मस्क के राजनीतिक संबंध और कारोबारी हित अमेरिकी सरकारी नीतियों से अलग नहीं हैं। इससे किसी गुप्त सौदे का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, लेकिन उनके प्रभाव और हितों पर सवाल पूछना उतना ही जायज है जितना भारत में किसी उद्योगपति से जवाब मांगना।

चुनाव से ठीक पहले हर दिन 10 लाख डॉलर बांटने की योजना पर भी उठा था विवाद
2024 के अमेरिकी चुनाव से पहले मस्क की राजनीतिक समिति America PAC ने कुछ अहम राज्यों में पंजीकृत मतदाताओं के बीच रोजाना 10 लाख डॉलर देने की योजना शुरू की। फिलाडेल्फिया के जिला अटॉर्नी ने इस पर मुकदमा दायर करते हुए कानूनी सवाल उठाए। पेन्सिल्वेनिया के एक न्यायाधीश ने चुनाव से पहले योजना पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया।
मुकदमा दायर होना दोष साबित होना नहीं है। लेकिन चुनाव में इतनी बड़ी रकम और राजनीतिक संगठन के इस्तेमाल का मामला यह जरूर दिखाता है कि मस्क अमेरिकी राजनीति में केवल दर्शक नहीं थे। ऐसे में भारत में राजनीतिक और कारोबारी प्रभाव की बात करते समय उनके अपने रिकॉर्ड को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आखिर भारत के नियमों पर इतना गुस्सा क्यों?
स्टारलिंक को भारत में कारोबार शुरू करने के लिए सुरक्षा संबंधी शर्तें और स्पेक्ट्रम आवंटन जैसी प्रक्रियाएं पूरी करनी हैं। रॉयटर्स की 9 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने एकाधिकार के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि भारत किसी क्षेत्र में एकाधिकार की अनुमति नहीं देता। रिपोर्ट के अनुसार, स्टारलिंक, यूटेलसैट-वनवेब और जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस को नियामकीय और सुरक्षा संबंधी शर्तों से गुजरना है।
मस्क को लगता है कि उनकी कंपनी के साथ भेदभाव हो रहा है, तो वह प्रमाण के साथ सवाल उठा सकते हैं। लेकिन कारोबारी देरी से यह साबित नहीं होता कि कोई उद्योगपति भारत को चला रहा है। और यदि मस्क भारतीय कारोबारी प्रभाव पर सवाल पूछते हैं, तो उन्हें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि अमेरिका में उनके अपने राजनीतिक संपर्कों और सरकारी कारोबार का प्रभाव जांच और बहस के दायरे में आता है।

कमल हासन का जवाब: भारत किसी अरबपति की निजी कंपनी नहीं
कमल हासन ने मस्क के बयान के जवाब में भारत की लोकतांत्रिक संप्रभुता पर जोर दिया। उनका संदेश था कि भारत विदेशी कंपनियों का स्वागत कर सकता है, लेकिन देश का भविष्य उसके नागरिक तय करेंगे, कोई अरबपति नहीं।
स्टारलिंक दूरदराज के इलाकों में इंटरनेट का विकल्प बन सकती है, लेकिन कंपनी को सुरक्षा और नियामकीय शर्तें पूरी करनी होंगी। सरकार की जिम्मेदारी है कि मंजूरी की प्रक्रिया पारदर्शी हो और सभी कंपनियों को समान अवसर मिले। किसी कंपनी की कारोबारी मांग अपने-आप में देश की नीति तय करने का आधार नहीं बन सकती।
असली सवाल अंबानी बनाम मस्क नहीं, नियम बनाम कारोबारी दबाव है
भारत में रिलायंस जियो और एयरटेल जैसे बड़े दूरसंचार समूह हैं। स्टारलिंक नई प्रतिस्पर्धा ला सकती है, खासकर उन इलाकों में जहां पारंपरिक नेटवर्क पहुंचाना मुश्किल है। लेकिन किसी भी कंपनी को सुरक्षा और नियामकीय शर्तों से छूट नहीं मिल सकती। साथ ही, सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि नियम पारदर्शी हों और मंजूरी में अनावश्यक देरी न हो।
मस्क के पास भेदभाव के प्रमाण हैं, तो उन्हें सामने रखना चाहिए। लेकिन किसी उद्योगपति को देश का असली बॉस बताने के लिए ठोस आधार चाहिए। दूसरी तरफ, मस्क की कंपनियों को मिले अमेरिकी सरकारी ठेके, सहायता और चुनाव में उनका भारी राजनीतिक खर्च भी सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा हैं। कारोबारी प्रभाव का सवाल उठे, तो हिसाब दोनों तरफ होना चाहिए।

मस्क साहब, आईना सिर्फ भारत को मत दिखाइए
मस्क तकनीक की दुनिया के बड़े उद्यमी हैं और उनकी कंपनियों ने अंतरिक्ष, इलेक्ट्रिक वाहनों तथा सैटेलाइट इंटरनेट में काम किया है। लेकिन तकनीकी सफलता किसी कारोबारी को दूसरे देश की व्यवस्था पर फैसला सुनाने का विशेषाधिकार नहीं देती।
भारत में कारोबारी और राजनीतिक प्रभाव पर सवाल पूछना जायज है। मगर वही सवाल अमेरिका में मस्क के राजनीतिक चंदे, सरकारी ठेकों और सत्ता से उनके रिश्तों पर भी लागू होते हैं। दूसरों से जवाब मांगने वाले को अपने रिकॉर्ड पर उठने वाले सवालों का जवाब देने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
भारत लोकतंत्र है, किसी अरबपति का निजी कारोबार नहीं। यहां किस कंपनी को बाजार में उतरने की अनुमति मिलेगी, यह फैसला किसी उद्योगपति की नाराजगी या सोशल मीडिया पर किए गए तंज से नहीं, बल्कि कानून, पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और देशहित के आधार पर होना चाहिए।
