Madhya Pradesh Cheetah News: वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व में चीतों के लिए करीब 439 हेक्टेयर क्षेत्र में आधुनिक बोमा और सुरक्षा व्यवस्था तैयार की गई है।
मध्य प्रदेश में चीता संरक्षण परियोजना को अब एक और बड़ा विस्तार मिलने जा रहा है। कूनो नेशनल पार्क और गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य के बाद अब वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व चीतों का तीसरा ठिकाना बनने जा रहा है।
चीतों के सुरक्षित स्थानांतरण और नए वातावरण में अनुकूलन के लिए यहां करीब 439 हेक्टेयर क्षेत्र में विशेष व्यवस्थाएं तैयार की गई हैं। आधुनिक बाड़ों यानी बोमा, सुरक्षा व्यवस्था, निगरानी और जरूरी सुविधाओं से लैस इस क्षेत्र में कूनो से चीते लाए जाने हैं।
वन्यजीव संरक्षण सप्ताह के समापन के मौके पर मध्य प्रदेश में चीता संरक्षण के लिहाज से एक महत्वपूर्ण कदम उठाया जा रहा है। 7 अक्टूबर 2026 को मुख्यमंत्री मोहन यादव वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व में कूनो से लाए गए दो चीतों को छोड़े जाने की प्रक्रिया का शुभारंभ करेंगे। अधिकारियों के मुताबिक नर चीता ‘ठोलो’ और मादा ‘CCB-3’ को नए आवास में लाने की तैयारी की गई है। इसके साथ ही सागर और बुंदेलखंड क्षेत्र देश के चीता संरक्षण अभियान के नए केंद्र के रूप में उभरेंगे।

कूनो के बाद अब तीसरा चीता आवास
भारत में चीता पुनर्स्थापना परियोजना के तहत सबसे पहले कूनो नेशनल पार्क को चीतों के लिए तैयार किया गया था। इसके बाद मध्य प्रदेश के ही गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य में चीतों को बसाया गया। अब वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व को तीसरे आवास के तौर पर विकसित किया गया है।
राज्य के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चीतों की आबादी बढ़ने के साथ एक ही स्थान पर निर्भरता कम करना संरक्षण रणनीति का अहम हिस्सा है। आधिकारिक वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व की जानकारी के मुताबिक इस क्षेत्र को कूनो और गांधीसागर के बाद तीसरे चीता आवास के रूप में विकसित करने की अनुमति दी गई थी।
439 हेक्टेयर में तैयार हुआ चीता बाड़ा
चीतों को सीधे खुले जंगल में छोड़ने के बजाय शुरुआती चरण में उन्हें सॉफ्ट-रिलीज बाड़े यानी बोमा में रखा जाएगा। करीब 439 हेक्टेयर क्षेत्र में तैयार इस व्यवस्था को कई हिस्सों में बांटा गया है। यहां सुरक्षा के साथ निगरानी और चीतों के नए वातावरण में अनुकूलन की व्यवस्था की गई है।
रिपोर्टों के अनुसार बाड़े में इलेक्ट्रिक फेंसिंग और चौबीसों घंटे निगरानी जैसी व्यवस्थाएं भी की गई हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अफ्रीकी मूल के चीतों को नए वातावरण में धीरे-धीरे अनुकूल होने का अवसर मिले और उनके व्यवहार, स्वास्थ्य तथा गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा सके।

वन विभाग ने चीतों की सुरक्षा, निगरानी और स्वास्थ्य देखभाल से जुड़ी व्यवस्थाओं को भी मजबूत किया है। इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर वनकर्मियों को प्रशिक्षण और ग्रामीण इलाकों में जागरूकता अभियान चलाने पर भी काम किया गया है।
पहली बार टाइगर रिजर्व में चीता-टाइगर सह-अस्तित्व की बड़ी चुनौती
वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व का महत्व केवल इसके तीसरे चीता आवास बनने तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र पहले से ही बाघों का घर है। रिपोर्टों के अनुसार रिजर्व में करीब 30 बाघ मौजूद हैं। ऐसे में यहां चीतों को बसाना चीता और बाघ के एक ही बड़े परिदृश्य में सह-अस्तित्व की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयोग माना जा रहा है।
चीता खुले घास के मैदान और शिकार की उपलब्धता वाले क्षेत्रों को पसंद करता है, जबकि बाघ का क्षेत्र और व्यवहार अलग होता है। इसलिए दोनों प्रजातियों के बीच प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय दबाव और शिकार आधार को लेकर वैज्ञानिक निगरानी जरूरी होगी।
यही कारण है कि नए आवास में चीतों को तत्काल पूरे क्षेत्र में छोड़ने के बजाय पहले सुरक्षित बाड़े में रखकर उनके व्यवहार और अनुकूलन को देखा जाएगा।

2,339 वर्ग किलोमीटर में फैला है रिजर्व
वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा टाइगर रिजर्व है और करीब 2,339 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। यह सागर, दमोह और नरसिंहपुर जिलों तक विस्तृत है। रिजर्व में जंगल, घासभूमि और विभिन्न वन्यजीवों के लिए अनुकूल प्राकृतिक क्षेत्र मौजूद हैं।
इस क्षेत्र में चीतल, चिंकारा और ब्लैकबक जैसे शिकार प्रजातियों की मौजूदगी भी चीता पुनर्स्थापना के लिए महत्वपूर्ण मानी गई है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और भारतीय वन्यजीव संस्थान से जुड़े आकलनों में नौरादेही क्षेत्र को चीतों के स्थानांतरण के लिए उपयुक्त पाया गया था।
बुंदेलखंड में बढ़ सकता है वन्यजीव पर्यटन
चीतों के आने का असर सिर्फ वन्यजीव संरक्षण तक सीमित रहने की उम्मीद नहीं है। सागर और पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र में वन्यजीव पर्यटन को इससे नई गति मिल सकती है।
कूनो में चीता आने के बाद जिस तरह पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को लेकर रुचि बढ़ी, उसी तरह वीरांगना दुर्गावती में चीता सफारी और वन्यजीव पर्यटन की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं। होटल, होमस्टे, स्थानीय परिवहन, गाइड, वाहन चालक, हस्तशिल्प और छोटे कारोबार से जुड़े लोगों को इससे अप्रत्यक्ष लाभ मिलने की संभावना है।

हालांकि पर्यटन का विस्तार तभी टिकाऊ होगा जब इसे वन्यजीवों के संरक्षण और स्थानीय समुदायों के हितों के साथ संतुलित तरीके से आगे बढ़ाया जाए।
क्यों जरूरी है चीतों के लिए नए ठिकाने?
भारत में 1952 में चीते को विलुप्त घोषित किया गया था। इसके बाद अफ्रीकी देशों से चीतों को भारत लाकर उन्हें दोबारा भारतीय पारिस्थितिकी तंत्र में स्थापित करने की परियोजना शुरू हुई।
कूनो में चीतों की संख्या और शावकों के जन्म के साथ परियोजना ने विस्तार हासिल किया है। हाल की रिपोर्टों के अनुसार भारत में चीतों की संख्या 60 तक पहुंच चुकी है, जिनमें बड़ी संख्या मध्य प्रदेश में है।
ऐसे में संरक्षण वैज्ञानिकों के लिए अगली चुनौती सिर्फ संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि चीतों के लिए कई सुरक्षित और टिकाऊ आवास तैयार करना है। यही वजह है कि कूनो से आगे गांधीसागर और अब वीरांगना दुर्गावती जैसे नए स्थान विकसित किए जा रहे हैं।

सिर्फ चीता लाना नहीं, पूरा इकोसिस्टम तैयार करना होगा
वीरांगना दुर्गावती में चीते लाने की तैयारी के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही रहेगा कि नए आवास में चीतों की लंबी अवधि की सफलता कैसी रहती है।
इसके लिए पर्याप्त शिकार, पानी, सुरक्षित घासभूमि, मानव दबाव को नियंत्रित करना, वनकर्मियों की ट्रेनिंग, स्वास्थ्य निगरानी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी बेहद जरूरी होगी।
आधिकारिक रिजर्व की जानकारी के अनुसार चीतों के लिए बाड़े के स्थान का चयन और सुरक्षा संबंधी SOP की तैयारी मई 2026 में पूरी की गई थी। इससे साफ है कि यहां चीता स्थानांतरण के लिए कई चरणों में तैयारी की गई है।
अब कूनो से आगे बढ़ रहा है Project Cheetah
कूनो ने भारत में चीता पुनर्स्थापना की शुरुआत का चेहरा बनाया। गांधीसागर ने इसे दूसरे बड़े आवास तक पहुंचाया और अब वीरांगना दुर्गावती इस परियोजना को मध्य प्रदेश के एक और बड़े वन परिदृश्य तक ले जा रही है।

439 हेक्टेयर के सुरक्षित बाड़े में शुरुआती अनुकूलन से लेकर आगे खुले जंगल में चीतों की मौजूदगी तक का सफर इस परियोजना के अगले चरण की असली परीक्षा होगा।
अगर यहां चीते सफलतापूर्वक अनुकूलित होते हैं, शिकार आधार कायम रहता है और मानव-वन्यजीव संघर्ष को नियंत्रित रखा जाता है, तो वीरांगना दुर्गावती न केवल मध्य प्रदेश का तीसरा चीता आवास बनेगा, बल्कि भारत में चीता संरक्षण के लिए एक और महत्वपूर्ण मॉडल के रूप में विकसित हो सकता है।
