महिलाओं, बालिकाओं और ट्रांसजेंडर से जुड़े मामलों में पुलिस की भूमिका केवल कानून लागू करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि शिकायतकर्ता के साथ व्यवहार, उसकी बात को गंभीरता से सुनना, उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना और मामले की जांच को संवेदनशील तरीके से आगे बढ़ाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसी दृष्टिकोण को पुलिसिंग व्यवस्था का हिस्सा बनाने के उद्देश्य से बिहार पुलिस मुख्यालय में ‘जेंडर रिस्पॉन्सिव पुलिसिंग’ (Gender Responsive Policing) विषय पर एक दिवसीय क्षमता संवर्द्धन कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में राज्य के सभी जिलों के महिला थानों के थानाध्यक्षों (SHOs) और प्रत्येक जिले से एक-एक महिला पुलिस पदाधिकारी ने हिस्सा लिया।
सरदार पटेल भवन स्थित बिहार पुलिस मुख्यालय के सभागार में आयोजित इस प्रशिक्षण का उद्देश्य पुलिस पदाधिकारियों को लैंगिक संवेदनशीलता, महिलाओं और बालिकाओं से जुड़े मामलों में पीड़ित-केंद्रित पुलिसिंग तथा ट्रांसजेंडर से संबंधित मामलों में उत्तरदायी और प्रभावी कार्रवाई के लिए तैयार करना रहा। कार्यक्रम में कानून, पुलिस प्रक्रिया, जेंडर आधारित हिंसा, भेदभाव और संवेदनशील पुलिस प्रतिक्रिया से जुड़े विषयों पर विशेषज्ञों ने प्रशिक्षण दिया।
पुलिसिंग में संवेदनशीलता को संस्थागत बनाने पर जोर
कार्यक्रम का उद्घाटन अपर पुलिस महानिदेशक, कमजोर वर्ग, अपराध अनुसंधान विभाग, बिहार, श्रीमती के. सुहिता अनुपम ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। अपने उद्घाटन संबोधन में उन्होंने जेंडर रिस्पॉन्सिव पुलिसिंग की आवश्यकता और पुलिस व्यवस्था में लैंगिक संवेदनशीलता को मजबूत करने के महत्व पर प्रकाश डाला।
उन्होंने पुलिस पदाधिकारियों से महिलाओं और बालिकाओं से संबंधित शिकायतों एवं मामलों में संवेदनशील, निष्पक्ष और पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया।

दरअसल, किसी महिला या बालिका के साथ अपराध होने के बाद पुलिस से उसकी पहली मुलाकात कई बार पूरी न्याय प्रक्रिया की दिशा तय कर सकती है। शिकायत दर्ज कराने से लेकर बयान, जांच, चिकित्सकीय प्रक्रिया, सुरक्षा और आगे की कानूनी कार्रवाई तक पुलिस का व्यवहार पीड़ित के भरोसे को प्रभावित करता है। ऐसे में जेंडर संवेदनशीलता को केवल प्रशिक्षण का विषय न मानकर पुलिस की रोजमर्रा की कार्यप्रणाली का हिस्सा बनाना इस पहल का महत्वपूर्ण पहलू है।
महिला थानों के SHO को विशेष रूप से किया गया शामिल
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह रही कि इसमें राज्य के सभी जिलों के महिला थानों के थानाध्यक्षों को शामिल किया गया। इसके अलावा प्रत्येक जिले से एक महिला पुलिस पदाधिकारी ने भी प्रशिक्षण में हिस्सा लिया।
महिला थाने महिलाओं से संबंधित शिकायतों और मामलों के लिए पुलिस व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसलिए इन थानों में तैनात पदाधिकारियों की जेंडर संबंधी समझ, कानूनी जानकारी और पीड़ितों के साथ संवाद की क्षमता का सीधा संबंध पुलिस सेवा की गुणवत्ता से जुड़ता है।
प्रशिक्षण के जरिए यह प्रयास किया गया कि अलग-अलग जिलों में महिलाओं, बालिकाओं और ट्रांसजेंडर से जुड़े मामलों की पुलिसिंग में संवेदनशीलता और पेशेवर मानकों को मजबूत किया जा सके।


UNFPA और विधि विशेषज्ञों की भागीदारी
कार्यक्रम में UNFPA बिहार के राज्य कार्यालय प्रमुख श्री ख्वाजा सादत नूर, चाणक्या राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (CNLU) की डॉ. आयुषी दुबे, सहायक प्राध्यापक डॉ. अमित जैन और इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ की अधिवक्ता सुश्री अंचल गुप्ता सहित अन्य अतिथि एवं पुलिस पदाधिकारी मौजूद रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत पुलिस अधीक्षक, कमजोर वर्ग, श्रीमती गरिमा के स्वागत भाषण से हुई। इसके बाद विभिन्न सत्रों में जेंडर आधारित हिंसा और भेदभाव की रोकथाम तथा पुलिसिंग में लैंगिक संवेदनशीलता को संस्थागत रूप से मजबूत करने पर चर्चा हुई।
UNFPA और विधि विशेषज्ञों की भागीदारी का महत्व इस लिहाज से भी है कि जेंडर आधारित मामलों में पुलिस की भूमिका केवल आपराधिक कार्रवाई तक सीमित नहीं है। ऐसे मामलों में सामाजिक संदर्भ, पीड़ित की स्थिति, कानूनी अधिकार और पुलिस प्रक्रिया—इन सभी पहलुओं को समझना आवश्यक होता है।
कानून के साथ व्यवहार और प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण
प्रशिक्षण में महिलाओं से संबंधित कानून एवं प्रक्रियाओं, पुलिस की भूमिका और मामलों में संवेदनशील एवं प्रभावी प्रतिक्रिया जैसे विषयों पर जानकारी दी गई।

जेंडर रिस्पॉन्सिव पुलिसिंग का मूल विचार यही है कि कानून सभी के लिए समान हो, लेकिन कानून लागू करते समय संबंधित व्यक्ति की सामाजिक और परिस्थितिजन्य जरूरतों को समझा जाए। महिलाओं और बालिकाओं से जुड़े मामलों में यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।
किसी पीड़िता की शिकायत को दर्ज करने में देरी, उसकी बात को संदेह की नजर से देखना, बार-बार वही घटना बताने के लिए मजबूर करना या उसकी निजता का ध्यान न रखना पुलिस और न्याय व्यवस्था के प्रति उसके विश्वास को प्रभावित कर सकता है। इसलिए संवेदनशील पुलिसिंग का उद्देश्य कानून की प्रक्रिया को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसे अधिक पीड़ित-केंद्रित और प्रभावी बनाना है।
ट्रांसजेंडर मामलों में भी संवेदनशील दृष्टिकोण पर जोर
कार्यक्रम में महिलाओं और बालिकाओं के साथ-साथ ट्रांसजेंडर से संबंधित मामलों में संवेदनशील और उत्तरदायी पुलिसिंग पर भी जोर दिया गया।
पुलिस व्यवस्था में जेंडर संवेदनशीलता की चर्चा अब केवल महिलाओं से जुड़े मामलों तक सीमित नहीं रह गई है। विभिन्न लैंगिक पहचान वाले लोगों के साथ पुलिस का व्यवहार, शिकायतों की सुनवाई और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी संस्थागत संवेदनशीलता का हिस्सा है।

इसलिए प्रशिक्षण में जेंडर आधारित मुद्दों को व्यापक संदर्भ में समझने और पुलिस प्रतिक्रिया को अधिक समावेशी बनाने पर जोर दिया गया।
विशेषज्ञों ने दिए व्यावहारिक प्रशिक्षण
कार्यक्रम में डॉ. अमित जैन, श्री अंकित मैकवान और सुश्री अंचल गुप्ता ने विषय विशेषज्ञ और रिसोर्स पर्सन के रूप में विभिन्न सत्रों में प्रशिक्षण दिया।
प्रशिक्षण के दौरान जेंडर संवेदनशील पुलिसिंग के व्यावहारिक पहलुओं, महिलाओं से संबंधित कानूनी प्रावधानों और पुलिस की जिम्मेदारियों पर चर्चा की गई। साथ ही विभिन्न परिस्थितियों में पुलिस की प्रतिक्रिया कैसी होनी चाहिए, इस पर भी व्यावहारिक जानकारी उपलब्ध कराई गई।
ऐसे प्रशिक्षण की उपयोगिता केवल सैद्धांतिक जानकारी तक सीमित नहीं होती। वास्तविक चुनौती तब आती है जब किसी पुलिस अधिकारी को थाने में किसी संवेदनशील मामले से निपटना होता है। उस समय कानून की जानकारी के साथ-साथ संवाद, धैर्य, निष्पक्षता और पीड़ित की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की क्षमता भी जरूरी होती है।

प्रशिक्षण के बाद जमीनी स्तर पर लागू करने की चुनौती
कार्यक्रम में शामिल पुलिस पदाधिकारियों ने जेंडर रिस्पॉन्सिव पुलिसिंग से जुड़े विषयों पर अपने अनुभव साझा किए और प्रशिक्षण से प्राप्त ज्ञान को अपने-अपने कार्यक्षेत्र में लागू करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।
यहीं से इस पहल की असली परीक्षा शुरू होती है। किसी भी क्षमता संवर्द्धन कार्यक्रम का प्रभाव तभी दिखाई देता है जब प्रशिक्षण के बाद थाने के स्तर पर व्यवहार और कार्यप्रणाली में बदलाव दिखाई दे। महिलाओं और बालिकाओं की शिकायतों की सुनवाई, प्राथमिकी दर्ज करने की प्रक्रिया, जांच की गुणवत्ता, पीड़ित की निजता और सुरक्षा तथा मामलों की निगरानी जैसे क्षेत्रों में यदि प्रशिक्षण का असर दिखता है, तभी इसका वास्तविक उद्देश्य पूरा माना जाएगा।
संपादकीय नजरिए से क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल?
जेंडर आधारित अपराधों से निपटने के लिए केवल कठोर कानून पर्याप्त नहीं होते। कानून का निष्पक्ष और संवेदनशील क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी है। पुलिस किसी पीड़ित व्यक्ति के लिए न्याय व्यवस्था का पहला संस्थागत संपर्क बिंदु होती है। इसलिए पुलिस का रवैया कई बार यह तय करता है कि पीड़ित आगे की कानूनी प्रक्रिया में कितना भरोसा महसूस करेगा।
बिहार पुलिस मुख्यालय का यह प्रशिक्षण इसी व्यापक जरूरत को संबोधित करने का प्रयास है। खास बात यह है कि इसमें राज्य के सभी जिलों के महिला थाना प्रभारियों और महिला पुलिस पदाधिकारियों को शामिल किया गया है, जिससे प्रशिक्षण का प्रभाव अलग-अलग जिलों तक पहुंचाने की संभावना बढ़ती है।

हालांकि किसी एक दिवसीय प्रशिक्षण से पुलिसिंग की पूरी व्यवस्था नहीं बदल सकती। इसके लिए निरंतर प्रशिक्षण, वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी, जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था और थाने के स्तर पर संवेदनशील प्रक्रियाओं का नियमित पालन आवश्यक होगा।
फिर भी, महिलाओं, बालिकाओं और ट्रांसजेंडर से जुड़े मामलों को केवल कानून-व्यवस्था के मुद्दे के बजाय मानवीय गरिमा, सुरक्षा और न्याय के प्रश्न के रूप में देखने की दिशा में यह प्रशिक्षण एक महत्वपूर्ण संस्थागत कदम है। इसकी वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि प्रशिक्षण कक्ष में सीखी गई संवेदनशीलता पुलिस थानों में शिकायत दर्ज कराने वाली महिलाओं और पीड़ितों के अनुभव में कितनी दिखाई देती है।
