Bihar Fatty Liver Screening: 18 महीने में 30 साल से अधिक उम्र के लोगों की होगी स्क्रीनिंग, 25 हजार स्वास्थ्यकर्मियों को मिलेगा प्रशिक्षण; शोध में बिहार के 58.5% प्रतिभागियों में मिले MASLD के संकेत
पटना। बिहार में फैटी लिवर (Fatty Liver) की बढ़ती स्वास्थ्य चुनौती से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग अब राज्यव्यापी अभियान शुरू करने जा रहा है। ‘स्वस्थ लिवर–स्वस्थ बिहार’ अभियान के तहत अगले 18 महीनों में राज्य के सभी 38 जिलों में 30 वर्ष से अधिक उम्र के करीब 26 लाख लोगों की स्वास्थ्य जांच की जाएगी। बिहार में फैटी लिवर और मेटाबॉलिक बीमारियों को लेकर सामने आए शोध के आंकड़े भी इस पहल की जरूरत को रेखांकित करते हैं। वर्ष 2025 में प्रकाशित MAP Study में बिहार के 540 प्रतिभागियों में से 316 यानी 58.5 प्रतिशत में मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीएटोटिक लिवर डिजीज (MASLD) दर्ज की गई। हालांकि, यह आंकड़ा पूरे बिहार की आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं करता, लेकिन राज्य में इस समस्या को लेकर बड़े स्तर पर जांच और जागरूकता की जरूरत जरूर बताता है।
सोमवार को पटना स्थित स्वास्थ्य विभाग के सभागार में स्वास्थ्य मंत्री श्री निशांत और स्वास्थ्य सचिव श्री कुमार रवि की संयुक्त अध्यक्षता में आयोजित उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में इस अभियान की रूपरेखा तैयार की गई। बैठक में निर्णय लिया गया कि यकृत एवं पित्त विज्ञान संस्थान (Institute of Liver and Biliary Sciences-ILBS), नई दिल्ली के तकनीकी सहयोग से बिहार के सभी 38 जिलों में फैटी लिवर की जांच और रोकथाम के लिए विशेष अभियान चलाया जाएगा। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े ILBS के निदेशक सह चांसलर डॉ. एस.के. सरीन के साथ भी अभियान के क्रियान्वयन पर विस्तार से चर्चा हुई।
Bihar Fatty Liver Screening: 18 महीने में 26 लाख लोगों की जांच का लक्ष्य
स्वास्थ्य विभाग ने इस अभियान के तहत 18 महीनों में करीब 26 लाख लोगों की स्क्रीनिंग का लक्ष्य रखा है। इसमें 30 वर्ष से अधिक आयु के लोग शामिल होंगे। अभियान का उद्देश्य फैटी लिवर की शुरुआती पहचान करना, जोखिम वाले लोगों को समय पर चिकित्सकीय सलाह उपलब्ध कराना और बीमारी के प्रति आम लोगों में जागरूकता बढ़ाना है।

फैटी लिवर ऐसी स्थिति है, जिसमें लिवर में जरूरत से ज्यादा वसा जमा होने लगती है। शुरुआती अवस्था में कई लोगों को इसके स्पष्ट लक्षण महसूस नहीं होते। यही वजह है कि बड़ी संख्या में लोग इस समस्या से अनजान रह सकते हैं। यदि समय रहते इसकी पहचान और रोकथाम नहीं की जाए तो कुछ मामलों में यह गंभीर लिवर संबंधी बीमारी का रूप ले सकती है।
बिहार में फैटी लिवर: शोध के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता
बिहार में फैटी लिवर को लेकर उपलब्ध शोध इस समस्या की गंभीरता की ओर संकेत करते हैं। 2025 में प्रकाशित MAP Study में बिहार के 540 प्रतिभागियों में से 316 में MASLD दर्ज की गई। इसका अनुपात 58.5 प्रतिशत रहा। यह मेटाबॉलिक जोखिमों से जुड़ी लिवर में वसा जमा होने की बीमारी है।
इसके अलावा समस्तीपुर में दिसंबर 2022 से मई 2023 के बीच किए गए एक अध्ययन में नए डायबिटीज मरीजों की जांच की गई थी। इसमें शामिल 148 लोगों में से 109 में अल्ट्रासाउंड के जरिए लिवर संबंधी बीमारी की पहचान हुई। यानी अध्ययन के प्रतिभागियों में इसका अनुपात करीब 73.7 प्रतिशत था।
ये दोनों अध्ययन अलग-अलग समूहों पर किए गए थे। इसलिए इनके आंकड़ों को पूरे बिहार की आबादी में फैटी लिवर से पीड़ित लोगों का प्रतिशत या मरीजों की कुल संख्या नहीं माना जा सकता। कोरोना महामारी के बाद बिहार में फैटी लिवर के मरीज कितने बढ़े हैं, इसका भी कोई प्रमाणित राज्यव्यापी तुलनात्मक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। फिर भी ये शोध बताते हैं कि खासकर डायबिटीज और अन्य मेटाबॉलिक जोखिमों से जूझ रहे लोगों की लिवर जांच को गंभीरता से लेने की जरूरत है।

एक नजर में पूरी खबर
- 26 लाख लोगों की जांच – 18 महीने में लक्ष्य।
- 38 जिले शामिल – पूरे बिहार में चलेगा अभियान।
- 58.5% का आंकड़ा – MAP Study में बिहार के 540 प्रतिभागियों में 316 में MASLD दर्ज।
- 73.7% का आंकड़ा – समस्तीपुर अध्ययन में 148 डायबिटीज मरीजों में 109 में लिवर संबंधी बीमारी।
- 25 हजार स्वास्थ्यकर्मी – डॉक्टर, नर्स और लैब तकनीशियनों को प्रशिक्षण।
- 150 मास्टर ट्रेनर – अभियान को जमीन पर उतारने की तैयारी।
- घर-घर जागरूकता – आशा, एएनएम और जीविका दीदियों की होगी भूमिका।
- मुख्य उद्देश्य – फैटी लिवर की समय पर पहचान और रोकथाम।
नोट: शोध के प्रतिशत अध्ययन में शामिल प्रतिभागियों के हैं, पूरे बिहार की आबादी के नहीं।
आशा, एएनएम और जीविका दीदियां घर-घर पहुंचाएंगी जागरूकता
बिहार स्वास्थ्य विभाग इस अभियान को पहले से संचालित गैर-संचारी रोग नियंत्रण कार्यक्रम (NCD Programme) और आयुष्मान आरोग्य मंदिरों से जोड़कर लागू करेगा। इसका उद्देश्य लोगों को उनके घर के नजदीक ही प्रारंभिक जांच और स्वास्थ्य संबंधी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना है।
इसमें आशा कार्यकर्ताओं, एएनएम, सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों (CHO) और जीविका दीदियों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। इनके माध्यम से घर-घर जाकर लोगों को फैटी लिवर के खतरे, बचाव के उपाय और नियमित स्वास्थ्य जांच की जरूरत के बारे में जागरूक किया जाएगा। साथ ही प्रारंभिक स्वास्थ्य जांच में भी इनकी मदद ली जाएगी।
यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच और बीमारी के प्रति जागरूकता की कमी के कारण कई बार लोग शुरुआती जांच नहीं करा पाते। स्थानीय स्वास्थ्य नेटवर्क के माध्यम से इस अंतर को कम करने की कोशिश होगी।

25 हजार स्वास्थ्यकर्मियों को दिया जाएगा विशेष प्रशिक्षण
26 लाख लोगों की जांच के लक्ष्य को पूरा करने के लिए स्वास्थ्य विभाग बड़े स्तर पर मानव संसाधन तैयार करेगा। इसके तहत 150 मास्टर ट्रेनरों सहित करीब 25 हजार स्वास्थ्यकर्मियों, डॉक्टरों, नर्सों और लैब तकनीशियनों को विशेष प्रशिक्षण देने की योजना बनाई गई है।
प्रशिक्षण में फैटी लिवर की शुरुआती पहचान, जांच प्रक्रिया और मरीजों को आवश्यक चिकित्सकीय परामर्श उपलब्ध कराने पर जोर दिया जाएगा। मास्टर ट्रेनरों के माध्यम से जिलों में स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षित किया जाएगा, ताकि अभियान को एक समान व्यवस्था के तहत संचालित किया जा सके।
DM और प्रमंडलीय आयुक्त करेंगे अभियान की निगरानी
अभियान को निर्धारित समय में पूरा करने के लिए जिला, प्रमंडल और राज्य स्तर पर नियमित समीक्षा की व्यवस्था की जाएगी। जिला स्तर पर जिलाधिकारी, प्रमंडल स्तर पर प्रमंडलीय आयुक्त और राज्य स्तर पर स्वास्थ्य मंत्री इसकी प्रगति की समीक्षा करेंगे।
स्वास्थ्य मंत्री निशांत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि अभियान को पूरी गंभीरता और प्राथमिकता के साथ लागू किया जाए। उन्होंने कहा कि फैटी लिवर की समय पर पहचान और रोकथाम से मधुमेह, उच्च रक्तचाप तथा हृदय रोग जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है। इसके लिए लोगों को नियमित स्वास्थ्य जांच, संतुलित खानपान और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के प्रति जागरूक करना भी जरूरी है।

सिर्फ जांच नहीं, इलाज और फॉलोअप भी होगी असली परीक्षा
बिहार में फैटी लिवर की रोकथाम के लिए शुरू होने जा रहा यह अभियान स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने एक बड़ी जिम्मेदारी लेकर आया है। 26 लाख लोगों की स्क्रीनिंग करना अपने आप में बड़ा लक्ष्य है, लेकिन इसकी वास्तविक सफलता जांच के बाद की व्यवस्था पर निर्भर करेगी।
जिन लोगों में फैटी लिवर या उससे जुड़े जोखिम सामने आएंगे, उनके लिए आगे की जांच, विशेषज्ञ चिकित्सकीय परामर्श, जरूरत पड़ने पर रेफरल और नियमित फॉलोअप की व्यवस्था जरूरी होगी। इसके साथ ही संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि और वजन नियंत्रित रखने के प्रति लोगों की आदतों में बदलाव लाना भी महत्वपूर्ण होगा।
कोरोना महामारी के बाद जीवनशैली और गैर-संचारी रोगों को लेकर बढ़ी चर्चा के बीच बिहार सरकार की यह पहल महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अब देखना होगा कि 18 महीनों में 26 लाख लोगों की जांच का लक्ष्य कितना पूरा होता है और शुरुआती पहचान के बाद मरीजों को उपचार की सुविधा कितनी प्रभावी ढंग से मिल पाती है।
बैठक में राज्य स्वास्थ्य समिति, बिहार के कार्यपालक निदेशक डॉ. नवल किशोर चौधरी, स्वास्थ्य मंत्री के आप्त सचिव श्री कौशलेंद्र कुमार सहित स्वास्थ्य विभाग के कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।

