23 अक्टूबर 1923 को राजस्थान के सीकर जिले के खाचरियावास गांव में जन्मे भैरों सिंह शेखावत भारतीय राजनीति के उन नेताओं में गिने जाते हैं जिन्होंने राज्य की राजनीति से देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों में से एक—उपराष्ट्रपति—तक का सफर तय किया। उनकी जयंती पर उनके सार्वजनिक जीवन, प्रशासनिक पहल और राजनीतिक विरासत को याद किया जाता है।
किसान परिवार से राष्ट्रीय राजनीति तक का सफर
भैरों सिंह शेखावत का जन्म एक किसान परिवार में हुआ था। शुरुआती जीवन की आर्थिक चुनौतियों के बीच उन्होंने हाई स्कूल तक शिक्षा प्राप्त की। परिवार की जिम्मेदारियों के कारण उन्हें कम उम्र में ही कामकाज की ओर ध्यान देना पड़ा। आगे चलकर उनका सार्वजनिक जीवन राजस्थान की विधानसभा और राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ गया।
वर्ष 1952 में वे राजस्थान विधानसभा के सदस्य चुने गए। उनका लंबा राजनीतिक सफर जनसंघ से शुरू हुआ और बाद में वे भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए। वे कई दशकों तक राजस्थान की राजनीति में सक्रिय रहे और विधानसभा में सत्ता पक्ष तथा विपक्ष—दोनों भूमिकाओं में काम किया।
तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री
भैरों सिंह शेखावत ने राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में तीन कार्यकाल संभाले—1977 से 1980, 1990 से 1992 और 1993 से 1998 तक। उनके प्रशासनिक कार्यकाल में गरीबी उन्मूलन और ग्रामीण आजीविका से जुड़े कार्यक्रमों पर विशेष जोर दिया गया। ‘अंत्योदय’, ‘फूड फॉर वर्क’ और ‘अपना गांव, अपना काम’ जैसी पहलों का उद्देश्य जरूरतमंद परिवारों और ग्रामीण समुदायों तक सहायता पहुंचाना था।

उनकी राजनीतिक पहचान केवल चुनावी सफलता तक सीमित नहीं रही। वे लंबे समय तक राजस्थान विधानसभा में विपक्ष के नेता भी रहे। उनके समर्थक उन्हें जमीनी अनुभव, संगठनात्मक क्षमता और प्रशासनिक समझ के लिए याद करते हैं, जबकि उनके कार्यकाल का मूल्यांकन राजस्थान के सामाजिक और राजनीतिक संदर्भों में किया जाता है।
भारत के उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति
19 अगस्त 2002 को भैरों सिंह शेखावत ने भारत के उपराष्ट्रपति का पद संभाला। इस भूमिका में वे राज्यसभा के पदेन सभापति भी रहे। उनका कार्यकाल 21 जुलाई 2007 तक चला। इस तरह राज्य की राजनीति में दशकों तक सक्रिय रहने के बाद उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर संसदीय कार्यवाही और संवैधानिक जिम्मेदारियों में योगदान दिया।
उपराष्ट्रपति के रूप में उनकी भूमिका ने उन्हें भारतीय संसदीय लोकतंत्र के महत्वपूर्ण संस्थागत पद पर स्थापित किया। राज्यसभा के सभापति के तौर पर सदन की कार्यवाही का संचालन और संसदीय परंपराओं का निर्वहन उनके दायित्वों का हिस्सा था।
सामाजिक मुद्दों पर रुख और सार्वजनिक विरासत
शेखावत ने ग्रामीण विकास, गरीबी उन्मूलन और सामाजिक सुधार से जुड़े मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से काम किया। उनके जीवन और राजनीतिक कार्यों पर चर्चा करते समय उनके प्रशासनिक फैसलों, सामाजिक पहलों और उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों—तीनों को साथ रखकर देखना जरूरी है। किसी भी लंबे राजनीतिक जीवन की तरह उनकी विरासत भी सार्वजनिक उपलब्धियों, विचारों और आलोचनात्मक मूल्यांकन का हिस्सा है।

15 मई 2010 को जयपुर में उनका निधन हो गया। राजस्थान में उन्हें अक्सर ‘बाबोसा’ के नाम से याद किया जाता है। उनकी जयंती इस बात का अवसर है कि देश के संवैधानिक पदों पर रहे नेताओं के योगदान के साथ-साथ लोकतांत्रिक संस्थाओं, जनसेवा और जवाबदेही के महत्व पर भी विचार किया जाए।
जयंती पर क्यों याद किए जाते हैं भैरों सिंह शेखावत?
भैरों सिंह शेखावत का जीवन राजस्थान की राजनीति से राष्ट्रीय संवैधानिक जिम्मेदारी तक पहुंचने की एक उल्लेखनीय यात्रा था। मुख्यमंत्री के रूप में उनके तीन कार्यकाल, ग्रामीण और गरीब तबकों के लिए शुरू की गई योजनाएं तथा उपराष्ट्रपति और राज्यसभा सभापति के रूप में उनकी भूमिका उनके सार्वजनिक जीवन के प्रमुख पड़ाव हैं। 23 अक्टूबर को उनकी जयंती पर उनकी राजनीतिक विरासत और भारतीय लोकतंत्र में उनके योगदान को याद किया जाता है।
