Dinman Times
  • वीडियो
  • वेब स्टोरीज
Sign In
  • होम
  • देश
    • बिहार
    • उत्तर प्रदेश
    • दिल्‍ली
    • झारखण्‍ड
    • उत्तराखंड
    • पश्चिम बंगाल
  • राजनीति
  • टेक्नोलॉजी
  • अपराध
  • बिज़नेस
  • मनोरंजन
  • खेल
  • करियर
  • धर्म
  • स्वास्थ्य
  • लाइफस्टाइल
  • मौसम
Reading: 7 अक्टूबर 1930: भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा—तीन नौजवान, तीन भूमिकाएं और एक अमर कहानी
साझा करें
Notification
Font ResizerAa
Dinman Times
  • वेब स्टोरीज
  • होम
  • देश
  • राजनीति
  • टेक्नोलॉजी
  • अपराध
  • बिज़नेस
  • मनोरंजन
  • खेल
  • करियर
  • धर्म
  • स्वास्थ्य
  • लाइफस्टाइल
  • मौसम
Search
  • होम
  • देश
    • बिहार
    • उत्तर प्रदेश
    • दिल्‍ली
    • झारखण्‍ड
    • उत्तराखंड
    • पश्चिम बंगाल
  • राजनीति
  • टेक्नोलॉजी
  • अपराध
  • बिज़नेस
  • मनोरंजन
  • खेल
  • करियर
  • धर्म
  • स्वास्थ्य
  • लाइफस्टाइल
  • मौसम
Follow US
© 2026. All Rights Reserved.

Home - देश - 7 अक्टूबर 1930: भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा—तीन नौजवान, तीन भूमिकाएं और एक अमर कहानी

7 अक्टूबर 1930: भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा—तीन नौजवान, तीन भूमिकाएं और एक अमर कहानी

प्रशांत कुमार
Last updated: अक्टूबर 7, 2026 3:11 अपराह्न
By : प्रशांत कुमार
Published on : 3 सप्ताह पहले
7 अक्टूबर 1930 को भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा
7 अक्टूबर 1930 को भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा
साझा करें

एक अदालत ने तीन युवाओं को मौत की सजा सुनाई थी, लेकिन इतिहास ने उसी दिन तीन ऐसे नाम लिखे जिन्हें मिटाने में अंग्रेजी हुकूमत भी नाकाम रही

इतिहास की कुछ तारीखें सिर्फ घटनाओं को दर्ज नहीं करतीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सवाल छोड़ जाती हैं। 7 अक्टूबर 1930 ऐसी ही तारीख थी। लाहौर षड्यंत्र केस में ब्रिटिश सरकार की विशेष अदालत ने भगत सिंह, शिवराम हरि राजगुरु और सुखदेव थापर को फांसी की सजा सुनाई। करीब 300 पन्नों के फैसले में तीनों को अलग-अलग आरोपों और भूमिकाओं के आधार पर दोषी ठहराया गया।

लेकिन इस कहानी को केवल “भगत सिंह को फांसी की सजा” कहकर खत्म कर देना इतिहास के साथ नाइंसाफी होगी।

क्योंकि इस मुकदमे में भगत सिंह सिर्फ एक नाम नहीं थे, राजगुरु सिर्फ उनका साथ देने वाले साथी नहीं थे और सुखदेव सिर्फ तीसरा नाम नहीं था। तीनों की अपनी अलग भूमिका थी, अपनी अलग पहचान थी और क्रांतिकारी आंदोलन में अपनी अलग जगह थी।

Dinman Times ads 728-90

एक निशानेबाज क्रांतिकारी, एक वैचारिक-संगठनकर्ता और एक ऐसा युवा चेहरा जिसने औपनिवेशिक सत्ता को खुली चुनौती दी—इन तीनों की कहानी मिलकर लाहौर षड्यंत्र केस को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक निर्णायक अध्याय बनाती है।

ये भी पढ़े

रहुई बाजार में डेयरी एवं किराना दुकान से 4.040 किलो गांजा बरामद, दो कारोबारी गिरफ्तार
यूपी MLC चुनाव में सपा की जीत के बाद अखिलेश की अपील, जुलूस नहीं निकालने को कहा
MLC चुनाव नतीजों से कांग्रेस की ‘वोट चोरी’ मुहिम पर सवाल, रामलीला मैदान रैली से पहले BJP-JDU का हमला
मछली मारने के विवाद में महिला की मौत, पटना में इलाज के दौरान तोड़ा दम

पहले समझिए, 7 अक्टूबर को हुआ क्या था?

सबसे पहले एक जरूरी तथ्य।

7 अक्टूबर 1930 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी नहीं दी गई थी। उस दिन उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई थी।

फांसी करीब साढ़े पांच महीने बाद 23 मार्च 1931 को दी गई। विशेष ट्रिब्यूनल ने 7 अक्टूबर के फैसले में मूल रूप से 27 अक्टूबर 1930 को फांसी की तारीख तय की थी, लेकिन कानूनी प्रक्रिया के चलते उस तारीख पर फांसी नहीं हो सकी। बाद में प्रिवी काउंसिल तक मामला पहुंचा और अंततः तीनों को 23 मार्च 1931 की शाम लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दी गई।

Dinman Times ads 728-90

यही अंतर 7 अक्टूबर की कहानी को समझने के लिए सबसे जरूरी है।


कहानी शुरू होती है लाला लाजपत राय की मौत से

1928 में साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर में प्रदर्शन हुआ। पुलिस की कार्रवाई में लाला लाजपत राय घायल हुए और 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई।

क्रांतिकारी युवाओं ने इसे ब्रिटिश दमन का परिणाम माना। हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन यानी HSRA से जुड़े युवाओं ने पुलिस अधिकारी जेम्स ए. स्कॉट को निशाना बनाने की योजना बनाई, जिसे लाठीचार्ज के लिए जिम्मेदार माना जाता था।

लेकिन 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में एक पहचान की गलती ने इतिहास की दिशा बदल दी।

Dinman Times ads 728-90

जिस व्यक्ति को स्कॉट समझा गया, वह असल में असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस जॉन पी. सॉन्डर्स था।

सॉन्डर्स की हत्या के मामले में भगत सिंह और राजगुरु की भूमिका प्रत्यक्ष गोली चलाने वालों के रूप में सामने आई, जबकि सुखदेव को योजना और संगठनात्मक भूमिका के लिए अभियोजन पक्ष ने महत्वपूर्ण माना। बाद में यही मामला लाहौर षड्यंत्र केस की बुनियाद बना।


राजगुरु: वह निशानेबाज जिसने गोली चलाने में भूमिका निभाई

जब भगत सिंह का नाम लिया जाता है तो अक्सर राजगुरु का नाम उसके तुरंत बाद आता है, लेकिन राजगुरु की अपनी पहचान को समझना जरूरी है।

शिवराम हरि राजगुरु महाराष्ट्र के खेड क्षेत्र से आने वाले युवा क्रांतिकारी थे। वे HSRA से जुड़े और हथियार चलाने तथा निशानेबाजी में दक्ष माने जाते थे।

Dinman Times ads 728-90

17 दिसंबर 1928 को सॉन्डर्स पर हुए हमले में राजगुरु और भगत सिंह ने गोली चलाई थी। चंद्रशेखर आजाद ने पीछे से सुरक्षा और बच निकलने की कार्रवाई में भूमिका निभाई।

यानी जिस घटना को बाद में लाहौर षड्यंत्र केस का सबसे बड़ा आधार बनाया गया, उसमें राजगुरु कोई सहायक किरदार नहीं थे।

वे उस कार्रवाई के प्रत्यक्ष भागीदार थे।

यही कारण था कि 7 अक्टूबर 1930 के फैसले में राजगुरु को भी मौत की सजा सुनाई गई।

Dinman Times ads 728-90

सुखदेव: बंदूक से ज्यादा संगठन की ताकत

अगर राजगुरु को इस कहानी के साहसी और कुशल निशानेबाज के रूप में देखा जाता है, तो सुखदेव थापर को क्रांतिकारी संगठन की रीढ़ के रूप में समझना ज्यादा उचित होगा।

सुखदेव का नाम अक्सर भगत सिंह और राजगुरु के साथ एक साथ लिया जाता है, लेकिन उनकी भूमिका अलग थी।

लाहौर षड्यंत्र केस के फैसले में सुखदेव को सॉन्डर्स की हत्या की योजना से जुड़े होने के साथ-साथ क्रांतिकारी संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए दोषी ठहराया गया। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों में उन्हें बम बनाने, नए सदस्यों को संगठन में जोड़ने और HSRA की गतिविधियों में नेतृत्वकारी भूमिका से जोड़ा गया है।

यानी सुखदेव की ताकत केवल हथियार उठाने में नहीं थी।

Dinman Times ads 728-90

वे लोगों को जोड़ते थे, संगठन खड़ा करते थे और क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए जमीन तैयार करते थे।

यही वजह है कि 7 अक्टूबर के फैसले में अदालत ने उनकी भूमिका को भगत सिंह के बराबर गंभीर माना।


भगत सिंह: विचार, कार्रवाई और अदालत को मंच बना देने वाला युवा

भगत सिंह की भूमिका इस पूरी कहानी में सबसे व्यापक थी।

सॉन्डर्स हत्याकांड से जुड़े होने के अलावा वे 8 अप्रैल 1929 के केंद्रीय विधानसभा बम मामले में भी गिरफ्तार हुए थे। विधानसभा में फेंके गए बम जान लेने के उद्देश्य से नहीं थे; उनका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के दमनकारी कानूनों के खिलाफ राजनीतिक संदेश देना और अपनी गिरफ्तारी के जरिए विचारों को व्यापक मंच देना था।

Dinman Times ads 728-90

यहीं से भगत सिंह की रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है।

वे अदालत से बचना नहीं चाहते थे; वे अदालत को बोलने का मंच बनाना चाहते थे।

लाहौर षड्यंत्र केस में भी यही रवैया दिखाई दिया। उनके लिए मुकदमा केवल कानूनी लड़ाई नहीं था। वह ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपने विचार रखने का अवसर भी था।


अदालत में आठ मिनट तक गूंजते रहे क्रांतिकारी स्वर

इस मुकदमे की शुरुआती कार्यवाही से जुड़ा एक कम चर्चित तथ्य आज भी बेहद दिलचस्प है।

Dinman Times ads 728-90

5 मई 1930 को विशेष ट्रिब्यूनल में सुनवाई शुरू हुई। दस्तावेजों के अनुसार आरोपियों ने अदालत में क्रांतिकारी नारे लगाए और इसके बाद करीब आठ मिनट तक एक क्रांतिकारी गीत गाया। अदालत को उसका अनुवाद तक मंगवाना पड़ा।

यह घटना इस बात का संकेत थी कि आरोपियों ने अदालत को सिर्फ कानूनी प्रक्रिया के रूप में स्वीकार नहीं किया था।

वे उसे अपने विचारों का मंच बना रहे थे।


अंग्रेजों ने क्यों बनाया विशेष ट्रिब्यूनल?

लाहौर षड्यंत्र केस सामान्य गति से आगे नहीं बढ़ रहा था। अभियोजन पक्ष के गवाहों की संख्या बहुत ज्यादा थी। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार अभियोजन ने 457 गवाहों की गवाही दर्ज करने के बाद अपना पक्ष बंद किया। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने मुकदमे को तेजी से पूरा करने के लिए विशेष ट्रिब्यूनल बनाया।

Dinman Times ads 728-90

वायसराय लॉर्ड इरविन के अध्यादेश के तहत गठित इस ट्रिब्यूनल को सामान्य अदालत से अलग अधिकार दिए गए थे।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि कुछ परिस्थितियों में कार्यवाही आरोपियों की गैरमौजूदगी में भी आगे बढ़ सकती थी और सामान्य अपील के अधिकार भी सीमित कर दिए गए थे।

यही कारण है कि इस मुकदमे को लेकर बाद में न्यायिक प्रक्रिया और उसकी निष्पक्षता पर गंभीर बहस हुई।


300 पन्नों का फैसला और तीन अलग-अलग भूमिकाएं

फिर आया 7 अक्टूबर 1930।

Dinman Times ads 728-90

विशेष ट्रिब्यूनल ने करीब 300 पन्नों का फैसला सुनाया।

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा दी गई।

लेकिन फैसले की खास बात यह भी थी कि अदालत ने तीनों की भूमिकाओं को अलग-अलग तरीके से देखा।

भगत सिंह को सॉन्डर्स की हत्या में भागीदारी और क्रांतिकारी षड्यंत्र में प्रमुख भूमिका के लिए दोषी ठहराया गया।

Dinman Times ads 728-90

राजगुरु को सॉन्डर्स की हत्या में प्रत्यक्ष भागीदारी के लिए मौत की सजा मिली।

सुखदेव को साजिश में शामिल होने, संगठन में नेतृत्वकारी भूमिका, बम निर्माण और नए सदस्यों की भर्ती जैसे आरोपों से जोड़ते हुए दोषी ठहराया गया। फैसले में अदालत ने उनकी भूमिका को भगत सिंह से कम नहीं माना।

इस तरह 7 अक्टूबर का फैसला तीन अलग-अलग क्रांतिकारी भूमिकाओं को एक ही फांसी के फंदे तक ले गया।

10 सबसे कम चर्चित तथ्य: भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव

1. 7 अक्टूबर को फांसी नहीं हुई थी
सबसे पहले यह भ्रम दूर करना जरूरी है। 7 अक्टूबर 1930 को तीनों को फांसी की सजा सुनाई गई थी, जबकि वास्तविक फांसी 23 मार्च 1931 को हुई। फैसले में शुरुआती तौर पर 27 अक्टूबर 1930 को फांसी की तारीख तय की गई थी।

Dinman Times ads 728-90

2. फैसला करीब 300 पन्नों का था
जिस फैसले ने तीनों युवाओं को मौत की सजा दी, वह कोई संक्षिप्त आदेश नहीं था। लाहौर षड्यंत्र केस का फैसला लगभग 300 पन्नों का बताया जाता है।

3. अदालत ने सामान्य न्यायिक प्रक्रिया से अलग रास्ता अपनाया
ब्रिटिश सरकार ने विशेष अध्यादेश के जरिए तीन जजों का स्पेशल ट्रिब्यूनल बनाया। इस व्यवस्था में सामान्य अपील और पुनरीक्षण के रास्ते सीमित कर दिए गए थे और कुछ परिस्थितियों में आरोपियों की गैरमौजूदगी में भी सुनवाई आगे बढ़ सकती थी।

4. अभियोजन ने सैकड़ों गवाह पेश किए थे
मामले में अभियोजन पक्ष के गवाहों की संख्या इतनी बड़ी थी कि मुकदमा लंबा खिंचने लगा। 26 अगस्त 1930 तक अभियोजन 457 गवाहों की गवाही दर्ज कर चुका था और इसके बाद उसने शेष गवाहों को छोड़कर अपना पक्ष बंद कर दिया।

5. अभियोजन का मामला पांच सरकारी गवाहों पर काफी निर्भर था
मुकदमे में जय गोपाल, फणींद्र नाथ घोष, मनमोहन बनर्जी, हंस राज वोहरा और ललित कुमार मुखर्जी जैसे सरकारी गवाहों यानी approvers की गवाही महत्वपूर्ण थी। कानूनी विवरण के अनुसार भगत सिंह और अन्य आरोपियों के खिलाफ प्रत्यक्ष सबूतों के बजाय इन गवाहियों पर अभियोजन ने काफी भरोसा किया।

Dinman Times ads 728-90

6. 5 मई 1930 को अदालत में करीब आठ मिनट तक क्रांतिकारी गीत गूंजा
विशेष ट्रिब्यूनल की शुरुआती कार्यवाही से जुड़ा एक बेहद रोचक प्रसंग है। आरोपियों ने अदालत में क्रांतिकारी नारे लगाए और करीब आठ मिनट तक एक क्रांतिकारी गीत गाया। अदालत को उसका अनुवाद तक मंगवाना पड़ा। इससे पता चलता है कि उनके लिए अदालत सिर्फ मुकदमे की जगह नहीं, बल्कि विचार व्यक्त करने का मंच भी थी।

7. राजगुरु और भगत सिंह की भूमिका अलग-अलग लेकिन प्रत्यक्ष थी
सॉन्डर्स हत्याकांड में भगत सिंह और राजगुरु ने गोली चलाई थी। मूल निशाना पुलिस अधिकारी जे.ए. स्कॉट था, लेकिन पहचान की गलती के कारण जे.पी. सॉन्डर्स मारे गए। इस घटना ने बाद में लाहौर षड्यंत्र केस को निर्णायक आधार दिया।

8. सुखदेव की भूमिका केवल ‘साथी’ की नहीं थी
सुखदेव को अक्सर भगत सिंह और राजगुरु के साथ केवल तीसरे नाम के तौर पर याद किया जाता है, जबकि क्रांतिकारी संगठन में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी। लाहौर षड्यंत्र मामले में उन्हें संगठनात्मक गतिविधियों और साजिश से जुड़ी भूमिका के लिए दोषी ठहराया गया था। यानी तीनों की भूमिकाएं अलग थीं, लेकिन मुकदमे में तीनों को समान रूप से गंभीर सजा मिली।

9. फांसी टालने के लिए आखिरी दिन तक कानूनी कोशिशें होती रहीं
27 अक्टूबर 1930 की प्रस्तावित फांसी प्रिवी काउंसिल में कानूनी चुनौती के कारण टल गई। फरवरी-मार्च 1931 में भी उन्हें बचाने के लिए कई कानूनी प्रयास हुए। यहां तक कि 22 मार्च 1931, यानी फांसी से एक दिन पहले, लाहौर हाईकोर्ट में दो और याचिकाएं दाखिल की गई थीं। 23 मार्च की सुबह दोनों याचिकाएं खारिज हो गईं और उसी शाम तीनों को फांसी दे दी गई।

Dinman Times ads 728-90

10. अंग्रेजों ने शव भी सामान्य तरीके से नहीं सौंपे
ब्रिटिश प्रशासन को डर था कि अंतिम संस्कार के दौरान बड़ा जनआंदोलन हो सकता है। इसलिए तीनों के शवों का अंतिम संस्कार गुप्त रूप से, अंधेरे में सतलुज के किनारे किया गया। सरकारी दस्तावेजों में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि प्रशासन लोकप्रिय प्रतिक्रिया से भयभीत था।

💡 सबसे दिलचस्प बात

इन दस तथ्यों में शायद सबसे बड़ा संदेश यही है कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की कहानी सिर्फ फांसी की कहानी नहीं है। यह एक ऐसे मुकदमे की कहानी है जिसमें अदालत, कानून, गवाह, अपील, जेल, विचार और क्रांतिकारी राजनीति—सब एक साथ टकरा रहे थे।

अंग्रेजों ने तीनों के शरीर खत्म किए, लेकिन जिस विचार को वे अदालत के फैसले से खत्म करना चाहते थे, वही विचार आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक हार बन गया।


सबसे चौंकाने वाला तथ्य: फांसी की तारीख भी तय हो गई थी

फैसला सुनाते समय ब्रिटिश सरकार ने इंतजार नहीं किया।

Dinman Times ads 728-90

27 अक्टूबर 1930 को तीनों को फांसी देने की तारीख तय कर दी गई थी।

लेकिन फांसी उस दिन नहीं हुई।

मामला आगे कानूनी चुनौती तक पहुंचा। चूंकि विशेष अध्यादेश के कारण सामान्य अपील का रास्ता सीमित था, इसलिए प्रिवी काउंसिल का दरवाजा खटखटाया गया। इस प्रक्रिया के कारण 27 अक्टूबर की फांसी टल गई।

बाद में प्रिवी काउंसिल ने चुनौती खारिज कर दी।

Dinman Times ads 728-90

लेकिन तब तक देश में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को बचाने की मांग जोर पकड़ चुकी थी।


एक पिता बेटे को बचाना चाहता था, लेकिन बेटा सिद्धांतों से पीछे नहीं हटना चाहता था

भगत सिंह के पिता किशन सिंह ने बेटे की जान बचाने की कोशिश की। उन्होंने विशेष ट्रिब्यूनल के सामने उसके पक्ष में याचिका दी और बेटे की बेगुनाही की बात कही।

लेकिन भगत सिंह इस कदम से बेहद नाराज हुए।

उन्होंने अपने पिता को लिखा कि उनकी जिंदगी को उनके सिद्धांतों की कीमत पर बचाना उचित नहीं होगा। उनका कहना था कि उनकी जिंदगी इतनी मूल्यवान नहीं कि उसे उनके विचारों की कीमत पर खरीदा जाए।

Dinman Times ads 728-90

यह प्रसंग भगत सिंह के व्यक्तित्व को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी है।

लेकिन यहां भी यह याद रखना जरूरी है कि यह सिर्फ भगत सिंह की कहानी नहीं थी।

उसी फांसी के फंदे तक राजगुरु और सुखदेव भी समान दृढ़ता के साथ पहुंचे।


मौत सामने थी, फिर भी जेल में किताबों की मांग

भगत सिंह की जेल जिंदगी का एक कम चर्चित पहलू उनकी पढ़ने की आदत थी।

Dinman Times ads 728-90

जेल में रहते हुए वे किताबें मंगवाते और राजनीतिक दर्शन, इतिहास तथा समाज व्यवस्था पर पढ़ते थे। उनकी चिट्ठियों और जेल से जुड़े दस्तावेजों से उनके गहरे बौद्धिक अध्ययन का पता चलता है। पंजाब आर्काइव्स ने 2018 में मुकदमे से जुड़े कई दस्तावेज और पत्र प्रदर्शित भी किए थे, जो पहले व्यापक रूप से सार्वजनिक नहीं थे।

इससे एक बात साफ होती है—

इन युवाओं की क्रांति केवल बंदूक की क्रांति नहीं थी; उसके पीछे विचार भी थे।


और फिर आई 23 मार्च 1931 की शाम

7 अक्टूबर 1930 को सुनाई गई सजा करीब साढ़े पांच महीने बाद अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंची।

Dinman Times ads 728-90

23 मार्च 1931 की शाम लाहौर सेंट्रल जेल में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गई।

आम तौर पर जेलों में फांसी सुबह दी जाती थी, लेकिन तीनों की फांसी शाम को हुई। उपलब्ध कानूनी-ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार ब्रिटिश प्रशासन को बाहर जमा हो रहे जनाक्रोश और संभावित विरोध की चिंता थी।

शवों को भी परिजनों को सामान्य तरीके से नहीं सौंपा गया। ब्रिटिश प्रशासन को डर था कि अंतिम संस्कार बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है।

लेकिन जिस जनाक्रोश से अंग्रेज डर रहे थे, उसे रोका नहीं जा सका।

Dinman Times ads 728-90

तीन नाम, तीन भूमिकाएं, एक विरासत

भगत सिंह—विचार और विद्रोह का चेहरा।

राजगुरु—साहस और प्रत्यक्ष कार्रवाई का प्रतीक।

सुखदेव—संगठन, योजना और क्रांतिकारी नेटवर्क की मजबूत कड़ी।

इन तीनों को सिर्फ एक साथ उच्चारित किए जाने वाले तीन नामों की तरह देखना उनके इतिहास को छोटा कर देना है।

Dinman Times ads 728-90

लाहौर षड्यंत्र केस में उनकी भूमिकाएं अलग थीं, लेकिन मंजिल एक थी।

7 अक्टूबर 1930 को ब्रिटिश अदालत ने तीनों को मौत की सजा सुनाई। करीब 300 पन्नों के फैसले में उनके खिलाफ अपना निर्णय लिखा गया। 27 अक्टूबर को फांसी देने की योजना बनी। कानूनी लड़ाई चली। अपीलें खारिज हुईं। देश में विरोध बढ़ा।

और अंततः 23 मार्च 1931 की शाम अंग्रेजी सरकार ने तीनों की जिंदगी खत्म कर दी।

लेकिन यहीं ब्रिटिश सत्ता की सबसे बड़ी भूल हुई।

Dinman Times ads 728-90

उन्होंने तीन शरीर खत्म किए थे, तीन विचार नहीं।

राजगुरु की निशानेबाजी, सुखदेव का संगठन और भगत सिंह की वैचारिक बेचैनी—तीनों मिलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की ऐसी विरासत बन गए, जिसे फांसी का फंदा भी नहीं मिटा सका।

इसलिए 7 अक्टूबर 1930 सिर्फ भगत सिंह को फांसी की सजा सुनाए जाने की तारीख नहीं है।

यह उस दिन की याद है जब ब्रिटिश हुकूमत ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव—तीन युवाओं को अपराधी साबित करने की कोशिश की, लेकिन इतिहास ने उन्हें शहीद बना दिया।

Dinman Times ads 728-90

और शायद इस कहानी की सबसे ताकतवर पंक्ति यही है—

अदालत ने तीनों की मौत लिखी थी, लेकिन भारत की जनता ने उसी फैसले के हाशिये पर तीन अमर नाम लिख दिए—भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव।

TAGGED:Freedom Fightersभगत सिंहराजगुरुसुखदेव
ख़बर साझा करें
Facebook Whatsapp Whatsapp Telegram Email Print
पिछली ख़बर Ben Duncan Death Prince William Friend प्रिंस विलियम के दोस्त की होटल की छत से गिरकर मौत, पीछे छोड़ी करीब 90 हजार पाउंड की संपत्ति
अगली ख़बर France Protest 2026: 2.66 लाख लोगों का प्रदर्शन France Protest: स्कूलों की बैरिकेड से सड़कों तक पहुंचा फ्रांस का गुस्सा, 2.66 लाख लोग उतरे, आंसू गैस, गिरफ्तारियां और पुलिस पर गंभीर सवाल
Google prefered

गूगल पर फेवरेट बनाएँ

ये भी पढ़ें

रहुई बाजार में 4.040 किलो गांजा बरामद, दो गिरफ्तार

रहुई बाजार में डेयरी एवं किराना दुकान से 4.040 किलो गांजा बरामद, दो कारोबारी गिरफ्तार

Hyundai Bayon

Hyundai Bayon की कीमत और EMI का हिसाब, जानें खरीदने पर कितना आएगा खर्च

यूपी MLC चुनाव: अखिलेश की विजयी सपा उम्मीदवारों से अपील

यूपी MLC चुनाव में सपा की जीत के बाद अखिलेश की अपील, जुलूस नहीं निकालने को कहा

MLC चुनाव नतीजे: रामलीला रैली से पहले कांग्रेस पर दबाव

MLC चुनाव नतीजों से कांग्रेस की ‘वोट चोरी’ मुहिम पर सवाल, रामलीला मैदान रैली से पहले BJP-JDU का हमला

रामायण फिल्म: 100 देशों में 50 हजार स्क्रीन्स पर रिलीज

‘रामायण’ की वैश्विक उड़ान, 100 से ज्यादा देशों में 50 हजार स्क्रीन्स पर रिलीज की तैयारी

Dinman Ads

Get Connected with us on social networks

Facebook-f X-twitter Instagram Youtube Linkedin-in

Poppular Categories

  • बिहार
  • देश
  • अपराध
  • राजनीति
  • मनोरंजन
  • धर्म
  • विदेश
  • खेल
  • टेक्नोलॉजी
  • बिज़नेस

Download APP

Google-play Apple
  • About us
  • Privacy Policy
  • Terms and Condition
  • Cookies Policy
  • Contact us
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?