पुण्यतिथि विशेष | 7 नवंबर | बिहार | पुलिस सेवा, साहित्य और लोकजीवन
पुलिस सेवा को अक्सर कानून-व्यवस्था और अपराध नियंत्रण तक सीमित करके देखा जाता है, लेकिन कुछ अधिकारी ऐसे भी हुए जिन्होंने प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ साहित्य, पत्रकारिता और सामाजिक विमर्श में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। बद्री नारायण सिन्हा ऐसे ही बहुआयामी व्यक्तित्व थे। बिहार कैडर के 1952 बैच के भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी होने के साथ-साथ वे हिंदी के साहित्यकार, आलोचक, कवि और पत्रकार भी थे। वे ‘बिहार पुलिस पत्रिका’ के संस्थापक-संपादक रहे और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले संपूर्ण क्रांति आंदोलन के निकट से जुड़े रहे।
दरभंगा के ग्रामीण परिवेश से उच्च प्रशासनिक सेवा तक
बद्री नारायण सिन्हा का जन्म 4 अप्रैल 1930 को बिहार के दरभंगा जिले के सरामोहनपुर गांव में हुआ था। उनका बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता, लेकिन शिक्षा के प्रति उनकी गंभीरता ने उन्हें आगे बढ़ाया। उन्होंने दरभंगा के सी. एम. कॉलेज से स्नातक शिक्षा प्राप्त की और 1949 में पटना विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. की डिग्री हासिल की। उस समय उनकी आयु लगभग 19 वर्ष बताई जाती है।
उच्च शिक्षा के बाद उन्होंने अध्यापन को अपना शुरुआती पेशा बनाया। वे दरभंगा के सी. एम. कॉलेज में अंग्रेजी के व्याख्याता रहे और बाद में रांची कॉलेज में भी अध्यापन किया। साहित्य और शिक्षा से जुड़ा यह अनुभव उनके व्यक्तित्व में बौद्धिक अनुशासन और विश्लेषण की क्षमता विकसित करने वाला रहा। वर्ष 1952 में उनका चयन भारतीय पुलिस सेवा में हुआ और वे बिहार कैडर में शामिल हुए।

बिहार पुलिस में सेवा और विभिन्न जिलों की जिम्मेदारियां
बद्री नारायण सिन्हा ने पुलिस सेवा में कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। शुरुआती वर्षों में वे सासाराम में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे। इसके बाद बिहार मिलिट्री पुलिस में कमान की जिम्मेदारियां संभालीं। उन्होंने चंपारण और भागलपुर में पुलिस अधीक्षक के रूप में सेवा दी। मुजफ्फरपुर में रेलवे पुलिस अधीक्षक तथा रांची में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के पद पर भी कार्य किया।
जून 1971 में उन्हें पुलिस उपमहानिरीक्षक (DIG) के पद पर पदोन्नत किया गया और बिहार पुलिस मैनुअल के पुनरीक्षण से जुड़ी समिति का सदस्य-सचिव बनाया गया। बिहार पुलिस मैनुअल के ऐतिहासिक विवरण में भी उल्लेख है कि इस पुनरीक्षण का काम 1 जून 1971 से शुरू हुआ और बद्री नारायण सिन्हा को इसके लिए विशेष रूप से चुना गया था। उन्होंने प्रश्नावली तैयार करने और नियमावली को अद्यतन करने के काम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1972 से 1974 के बीच उन्होंने रांची स्थित नेशनल कोल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन में मुख्य सुरक्षा अधिकारी के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई। इसके बाद वे पटना में पुलिस उपमहानिरीक्षक, सेंट्रल रेंज रहे। अपने अंतिम कार्यकाल में वे बिहार पुलिस के अपराध अन्वेषण विभाग (CID) में DIG के पद पर कार्यरत थे। 7 नवंबर 1979 को पटना में उनका निधन हुआ। कुछ पारिवारिक जीवन-वृत्तों में निधन की तारीख 8 नवंबर भी दर्ज है; इसलिए तिथि के संबंध में स्रोतों में अंतर मिलता है।
‘बिहार पुलिस पत्रिका’ के संस्थापक-संपादक
बद्री नारायण सिन्हा का एक महत्वपूर्ण योगदान पुलिस विभाग के भीतर अध्ययन, विचार-विमर्श और लेखन की संस्कृति को प्रोत्साहित करना था। वे ‘बिहार पुलिस पत्रिका’ के संस्थापक-संपादक थे। यह पत्रिका बिहार पुलिस का आधिकारिक प्रकाशन थी। उन्होंने इसे केवल विभागीय सूचनाओं का माध्यम नहीं, बल्कि पुलिसकर्मियों के बौद्धिक विकास, प्रशासनिक अनुभवों और सामाजिक प्रश्नों पर विमर्श का मंच बनाने की दिशा में काम किया।

उनकी दृष्टि में पुलिस अधिकारी का काम केवल दंडात्मक कार्रवाई करना नहीं था। समाज की संरचना, स्थानीय परिस्थितियों, युवाओं की आकांक्षाओं और आर्थिक-सामाजिक तनावों को समझना भी प्रभावी पुलिसिंग का हिस्सा था। यही दृष्टिकोण उनके लेखन और पुलिस प्रशासन दोनों में दिखाई देता है।
साहित्य, आलोचना और अपराध-विज्ञान में योगदान
सिन्हा हिंदी साहित्य में आलोचक, कवि और गद्यकार के रूप में सक्रिय रहे। उनकी आलोचनात्मक कृति प्राथमिकी 1965 में प्रकाशित हुई और इसके बाद आज तक की नामक पुस्तक सामने आई। आधुनिक हिंदी कविता से जुड़ी उनकी पुस्तक तत्का आदमी (कुछ सूचीकरणों में शीर्षक के वर्तनी-रूप अलग मिलते हैं) 1966 में प्रकाशित बताई जाती है। उन्होंने गांधीजी के जीवन और विचारों पर भी लेखन किया। उनकी हिंदी कृति अब बहु से सब जन हिताय के अंग्रेजी रूपांतरण Man Thou Can का प्रकाशन उनके निधन के बाद हुआ।
उनकी उल्लेखनीय पुस्तकों में अपराधिकी का विशेष स्थान है। यह हिंदी में अपराध-विज्ञान (Criminology) पर उनका अध्ययन था। उन्होंने अपराध को केवल कानून तोड़ने की घटना मानकर नहीं देखा, बल्कि उसके पीछे मौजूद सामाजिक परिस्थितियों और मानवीय व्यवहार को समझने की आवश्यकता पर बल दिया। उनकी अन्य रचनाओं में Students’ Revolt, मैना के उलझ गए डैना और एक अर्थी एक जनाजा का उल्लेख मिलता है। उनकी लेखनी में साहित्यिक संवेदना के साथ सामाजिक यथार्थ की समझ भी दिखाई देती है।
जेपी आंदोलन और संपूर्ण क्रांति से संबंध
1970 के दशक में बिहार में भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और प्रशासनिक अव्यवस्था के विरुद्ध छात्रों तथा नागरिकों का असंतोष व्यापक जनांदोलन में बदल रहा था। जयप्रकाश नारायण ने इस आंदोलन को नेतृत्व दिया और इसे ‘संपूर्ण क्रांति’ का स्वरूप प्रदान किया। बद्री नारायण सिन्हा जयप्रकाश नारायण के निकट सहयोगियों में गिने जाते थे। उनके लेखन और बाद में प्रकाशित विवरणों से स्पष्ट होता है कि उन्होंने इस ऐतिहासिक आंदोलन को केवल राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि बिहार के सामाजिक और लोकतांत्रिक जीवन में आए बड़े बदलाव के रूप में देखा।

उनकी पुस्तक JP’s Movement में 1974 से 1977 के बीच चले आंदोलन का प्रत्यक्षदर्शी दृष्टिकोण से विवरण मिलता है। इस कृति का हिंदी रूपांतरण जयप्रकाश आंदोलन: एक झलक नाम से भी प्रकाशित हुआ। यह लेखन उस दौर के राजनीतिक वातावरण, जनभागीदारी और लोकतांत्रिक संघर्ष को समझने के लिए उपयोगी सामग्री है। उनका जेपी से जुड़ाव उनके सार्वजनिक जीवन के उस पक्ष को सामने लाता है जिसमें प्रशासनिक अनुभव और लोकतांत्रिक चेतना एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं।
नक्सलवाद पर विचार: पुलिस कार्रवाई से आगे सामाजिक समझ
बद्री नारायण सिन्हा के प्रशासनिक चिंतन का एक उल्लेखनीय पक्ष नक्सलवादी आंदोलन के प्रति उनका विश्लेषण था। CID और नक्सल-विरोधी अभियानों से जुड़े दायित्वों के दौरान उन्होंने 1975 में अंग्रेजी दैनिक The Searchlight में ‘From Naxalbari to Ekbari’ शीर्षक से लेखों की शृंखला लिखी। इनमें उन्होंने नक्सलवाद को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानने के बजाय उसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारणों को समझने की जरूरत पर जोर दिया।
उनका तर्क था कि उग्रवाद से निपटने के लिए पुलिस कार्रवाई के साथ सामाजिक सुधार, स्थानीय विश्वास और जनजीवन की समस्याओं का समाधान भी आवश्यक है। यह दृष्टिकोण उस समय के पुलिस विमर्श में महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह सुरक्षा-नीति को व्यापक सामाजिक संदर्भ में देखने की मांग करता था।
सम्मान और अंतिम वर्ष
पुलिस सेवा में विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें 1971 में इंडियन पुलिस मेडल से सम्मानित किया गया। अगस्त 1979 में, निधन से कुछ महीने पहले, उन्हें राष्ट्रपति पुलिस पदक भी प्रदान किया गया। वे पुलिस प्रशिक्षण संस्थानों और प्रशासनिक प्रशिक्षण मंचों पर व्याख्यान देते थे तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहते थे।

7 नवंबर 1979 को पटना में उनके निधन के साथ बिहार ने एक ऐसे अधिकारी और साहित्यकार को खो दिया जिसने वर्दी और कलम—दोनों के माध्यम से सार्वजनिक जीवन में योगदान दिया। उनके जीवन की स्मृति केवल पदों और पदकों में नहीं, बल्कि पुलिस पत्रिका की स्थापना, पुलिस मैनुअल के पुनरीक्षण, साहित्यिक कृतियों, अपराध-विज्ञान पर लेखन और जेपी आंदोलन के दस्तावेजीकरण में भी सुरक्षित है।
बद्री नारायण सिन्हा की विरासत
बद्री नारायण सिन्हा का जीवन इस बात का उदाहरण है कि प्रशासनिक सेवा और बौद्धिक-सामाजिक प्रतिबद्धता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। उन्होंने पुलिस अधिकारी के रूप में कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी निभाई, वहीं लेखक के रूप में समाज की जटिलताओं को समझने और उन पर विचार करने का प्रयास किया। वे बिहार पुलिस के इतिहास, हिंदी साहित्य और जेपी आंदोलन के अध्ययन—तीनों के लिए एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व हैं। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना उस परंपरा को सम्मान देना है जिसमें ज्ञान, संवेदना, संस्थागत निर्माण और सार्वजनिक उत्तरदायित्व साथ-साथ चलते हैं।
