Dinman Times
  • वीडियो
  • वेब स्टोरीज
Sign In
  • होम
  • देश
    • बिहार
    • उत्तर प्रदेश
    • दिल्‍ली
    • झारखण्‍ड
    • उत्तराखंड
    • पश्चिम बंगाल
  • राजनीति
  • टेक्नोलॉजी
  • अपराध
  • बिज़नेस
  • मनोरंजन
  • खेल
  • करियर
  • धर्म
  • स्वास्थ्य
  • लाइफस्टाइल
  • मौसम
Reading: अप्सरा रिएक्टर: भारत के परमाणु विज्ञान की वह ऐतिहासिक शुरुआत, जिसने आत्मनिर्भरता के सपने को दी नई उड़ान
साझा करें
Notification
Font ResizerAa
Dinman Times
  • वेब स्टोरीज
  • होम
  • देश
  • राजनीति
  • टेक्नोलॉजी
  • अपराध
  • बिज़नेस
  • मनोरंजन
  • खेल
  • करियर
  • धर्म
  • स्वास्थ्य
  • लाइफस्टाइल
  • मौसम
Search
  • होम
  • देश
    • बिहार
    • उत्तर प्रदेश
    • दिल्‍ली
    • झारखण्‍ड
    • उत्तराखंड
    • पश्चिम बंगाल
  • राजनीति
  • टेक्नोलॉजी
  • अपराध
  • बिज़नेस
  • मनोरंजन
  • खेल
  • करियर
  • धर्म
  • स्वास्थ्य
  • लाइफस्टाइल
  • मौसम
Follow US
© 2026. All Rights Reserved.

Home - देश - अप्सरा रिएक्टर: भारत के परमाणु विज्ञान की वह ऐतिहासिक शुरुआत, जिसने आत्मनिर्भरता के सपने को दी नई उड़ान

अप्सरा रिएक्टर: भारत के परमाणु विज्ञान की वह ऐतिहासिक शुरुआत, जिसने आत्मनिर्भरता के सपने को दी नई उड़ान

प्रशांत कुमार
Last updated: अक्टूबर 12, 2026 1:05 पूर्वाह्न
By : प्रशांत कुमार
Published on : 2 सप्ताह पहले
अप्सरा रिएक्टर: भारत के परमाणु विज्ञान की ऐतिहासिक शुरुआत
अप्सरा रिएक्टर: भारत के परमाणु विज्ञान की ऐतिहासिक शुरुआत
साझा करें

इतिहास विशेष | भारत के पहले परमाणु अनुसंधान रिएक्टर ‘अप्सरा’ की कहानी, जिसने देश में परमाणु विज्ञान, चिकित्सा अनुसंधान और स्वदेशी वैज्ञानिक क्षमताओं के विकास की नींव मजबूत की।

किसी देश के इतिहास में कुछ पल ऐसे होते हैं, जब प्रयोगशाला में हासिल हुई एक वैज्ञानिक सफलता आने वाली पीढ़ियों के सपनों का रास्ता खोल देती है। भारत के वैज्ञानिक इतिहास में ऐसा ही एक महत्वपूर्ण अध्याय है—अप्सरा परमाणु अनुसंधान रिएक्टर का निर्माण और उसका परिचालन।

आजादी के बाद भारत अनेक चुनौतियों से जूझ रहा था। देश को गरीबी, अशिक्षा और औद्योगिक पिछड़ेपन से बाहर निकालना था। वैज्ञानिक अनुसंधान की सुविधाएं सीमित थीं और आधुनिक तकनीक के अनेक क्षेत्रों में विदेशी देशों पर निर्भरता थी। ऐसे समय में परमाणु विज्ञान को देश के विकास से जोड़ने का सपना देखा गया।

इसी सपने को साकार करने की दिशा में भारत ने अपना पहला परमाणु अनुसंधान रिएक्टर विकसित किया, जिसका नाम रखा गया—‘अप्सरा’।

Dinman Times ads 728-90

4 अगस्त 1956 को मुंबई के पास ट्रॉम्बे में इस रिएक्टर ने क्रिटिकलिटी हासिल की। इसके साथ भारत ने परमाणु अनुसंधान के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम रखा। बाद में 20 जनवरी 1957 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसका औपचारिक उद्घाटन किया। यह एशिया का पहला अनुसंधान रिएक्टर था, जिसने उस दौर में भारतीय वैज्ञानिकों की तकनीकी क्षमता और महत्वाकांक्षा का परिचय दिया।

ये भी पढ़े

जगीर जू सफारी पहुंचे भारत-न्यूजीलैंड के रग्बी खिलाड़ी, वन्यजीवों और प्राकृतिक सौंदर्य का लिया आनंद
नालंदा विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय सामाजिक विज्ञान सम्मेलन संपन्न, राज्यपाल बोले— बिहार के विकास से ही साकार होगा विकसित भारत का सपना
अस्थावां में ब्राउन शुगर के कारोबार पर पुलिस का शिकंजा, तीन गिरफ्तार; 1.08 लाख रुपये नकद बरामद
नीतीश कुमार ने एसपीएम कॉलेज में विकास योजनाओं का किया उद्घाटन, निशांत कुमार के समर्थन में लगे नारे

अप्सरा की कहानी केवल एक मशीन के निर्माण की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद विज्ञान के सहारे अपने भविष्य की नई इबारत लिखना चाहता था।

डॉ. होमी जहांगीर भाभा का सपना और वैज्ञानिक भारत की परिकल्पना

अप्सरा रिएक्टर की कहानी डॉ. होमी जहांगीर भाभा के योगदान के बिना पूरी नहीं हो सकती। उन्हें भारतीय परमाणु कार्यक्रम का जनक कहा जाता है।

भाभा का मानना था कि परमाणु विज्ञान केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसका उपयोग चिकित्सा, कृषि, उद्योग, वैज्ञानिक अनुसंधान और देश की दीर्घकालिक तकनीकी क्षमता विकसित करने में भी किया जा सकता है।

Dinman Times ads 728-90

स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में भारत के सामने यह सवाल था कि क्या वह आधुनिक विज्ञान के अत्यंत जटिल क्षेत्रों में अपनी पहचान बना सकता है। भाभा और उनके सहयोगियों ने इस दिशा में संस्थागत आधार तैयार करने का प्रयास किया।

परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना 1948 में हुई और परमाणु ऊर्जा विभाग 1954 में अस्तित्व में आया। इन संस्थागत प्रयासों ने भारत के परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक प्रशासनिक और वैज्ञानिक आधार उपलब्ध कराया।

अप्सरा इसी व्यापक दृष्टि का महत्वपूर्ण परिणाम था। इसका उद्देश्य परमाणु ऊर्जा से बिजली बनाना नहीं, बल्कि परमाणु विज्ञान से जुड़े प्रयोगों और अनुसंधान के लिए एक ऐसी सुविधा तैयार करना था, जिसमें भारतीय वैज्ञानिक स्वयं काम कर सकें।

यह अंतर समझना जरूरी है। परमाणु अनुसंधान रिएक्टर और बिजली उत्पादन करने वाले परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों के उद्देश्य अलग हो सकते हैं। अप्सरा मुख्य रूप से वैज्ञानिक अनुसंधान, न्यूट्रॉन संबंधी अध्ययन और रेडियोआइसोटोप उत्पादन के लिए बनाया गया था।

Dinman Times ads 728-90

अप्सरा नाम क्यों रखा गया?

इस रिएक्टर का नाम भी अपने आप में दिलचस्प है।

‘अप्सरा’ भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में स्वर्ग की सुंदर नर्तकी अथवा जल से जुड़ी दिव्य स्त्री के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द है। इस नाम को चुनने के पीछे रिएक्टर की संरचना से जुड़ा एक रोचक संदर्भ था।

अप्सरा एक स्विमिंग पूल प्रकार का अनुसंधान रिएक्टर था। इसमें रिएक्टर कोर पानी से भरे एक विशेष पूल में स्थित था। नेहरू ने 20 जनवरी 1957 को इसके उद्घाटन समारोह में इसका नाम ‘अप्सरा’ रखा। उस अवसर पर उन्होंने इसके वैज्ञानिक और ऐतिहासिक महत्व को भी रेखांकित किया।

यह नाम भारतीय वैज्ञानिक इतिहास में इसलिए भी यादगार है, क्योंकि इसने एक अत्याधुनिक वैज्ञानिक सुविधा को भारतीय सांस्कृतिक पहचान से जोड़ दिया।

Dinman Times ads 728-90

नेहरू और भाभा के लिए वैज्ञानिक आधुनिकता तथा भारतीय सांस्कृतिक पहचान एक-दूसरे के विरोधी नहीं थे। अप्सरा का नाम इसी सोच की एक छोटी लेकिन उल्लेखनीय झलक प्रस्तुत करता है।

4 अगस्त 1956: वह दिन जब भारत ने परमाणु अनुसंधान में नई उपलब्धि हासिल की

अप्सरा की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उपलब्धि 4 अगस्त 1956 को सामने आई, जब उसने क्रिटिकलिटी हासिल की।

परमाणु रिएक्टर के संदर्भ में क्रिटिकलिटी का अर्थ है ऐसी स्थिति, जिसमें विखंडन से उत्पन्न न्यूट्रॉन आगे और विखंडन की प्रक्रिया को बनाए रख सकें। नियंत्रित परिस्थितियों में यह प्रक्रिया रिएक्टर के संचालन का आधार बनती है।

अप्सरा की डिजाइन और निर्माण में भारतीय वैज्ञानिकों तथा इंजीनियरों ने प्रमुख भूमिका निभाई। हालांकि, इसके शुरुआती ईंधन तत्व ब्रिटेन से प्राप्त किए गए थे। इसलिए इसकी उपलब्धि को स्वदेशी डिजाइन और निर्माण क्षमता की महत्वपूर्ण सफलता के रूप में देखना अधिक सटीक होगा, न कि प्रत्येक घटक के पूरी तरह स्वदेशी होने के दावे के रूप में।

Dinman Times ads 728-90

उस समय परमाणु तकनीक दुनिया के कुछ देशों में ही विकसित हो रही थी। ऐसे में भारत का अपना अनुसंधान रिएक्टर संचालित करना वैज्ञानिक प्रशिक्षण और तकनीकी अनुभव हासिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था।

इससे भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को रिएक्टर संचालन, न्यूट्रॉन भौतिकी, विकिरण संबंधी प्रयोगों और परमाणु अनुसंधान की व्यावहारिक चुनौतियों को समझने का अवसर मिला।

यह सफलता केवल उस दिन की उपलब्धि नहीं थी। इससे देश में आगे आने वाले अनुसंधान कार्यक्रमों के लिए अनुभव, विशेषज्ञता और संस्थागत क्षमता विकसित करने में मदद मिली।

चिकित्सा से कृषि तक: अनुसंधान में अप्सरा की भूमिका

आम लोगों के लिए परमाणु रिएक्टर का नाम सुनते ही अक्सर बिजली उत्पादन या परमाणु हथियारों का विचार सामने आता है। लेकिन अप्सरा जैसे अनुसंधान रिएक्टरों का महत्व इससे कहीं व्यापक था।

Dinman Times ads 728-90

अप्सरा का इस्तेमाल न्यूट्रॉन भौतिकी, पदार्थों पर न्यूट्रॉन विकिरण के प्रभाव, रेडियोआइसोटोप उत्पादन और विभिन्न वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए किया गया।

रेडियोआइसोटोप चिकित्सा क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उपयुक्त रेडियोआइसोटोप का इस्तेमाल कुछ बीमारियों की जांच और उपचार में किया जा सकता है। औद्योगिक क्षेत्र में भी इनका उपयोग विभिन्न सामग्रियों और उपकरणों की जांच के लिए होता है।

कृषि अनुसंधान में विकिरण संबंधी तकनीकों का इस्तेमाल पौधों और बीजों के गुणों का अध्ययन करने तथा नई किस्मों के विकास से जुड़े प्रयोगों में किया जा सकता है। ऐसे प्रयोगों के लिए वैज्ञानिकों को नियंत्रित अनुसंधान सुविधाओं की जरूरत होती है।

अप्सरा ने भारतीय शोधकर्ताओं को ऐसी सुविधाएं उपलब्ध कराने में योगदान दिया। इसके माध्यम से वैज्ञानिकों को प्रयोग करने, परिणामों का अध्ययन करने और परमाणु विज्ञान के विभिन्न अनुप्रयोगों को समझने का अवसर मिला।

Dinman Times ads 728-90

इसका व्यापक महत्व यही था कि परमाणु विज्ञान को केवल एक रणनीतिक विषय के रूप में नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, कृषि और औद्योगिक विकास में उपयोगी वैज्ञानिक साधन के रूप में भी विकसित किया जा सकता था।

भारतीय वैज्ञानिकों के प्रशिक्षण का महत्वपूर्ण केंद्र

किसी देश की वैज्ञानिक क्षमता केवल उपकरणों और प्रयोगशालाओं से नहीं बनती। उसके लिए प्रशिक्षित वैज्ञानिक, अनुभवी इंजीनियर, कुशल तकनीकी कर्मचारी और सुरक्षित संचालन की मजबूत व्यवस्था भी आवश्यक होती है।

अप्सरा ने भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को परमाणु रिएक्टर के संचालन और उससे जुड़े वैज्ञानिक प्रयोगों का व्यावहारिक अनुभव हासिल करने का अवसर दिया।

रिएक्टर के संचालन में तापीय परिस्थितियों, न्यूट्रॉन व्यवहार, विकिरण सुरक्षा और उपकरणों की निगरानी जैसे अनेक पहलुओं को समझना पड़ता है। इन प्रक्रियाओं का अनुभव आगे चलकर अन्य अनुसंधान सुविधाओं और परमाणु कार्यक्रमों के विकास में उपयोगी होता है।

Dinman Times ads 728-90

भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, अप्सरा ने दशकों तक शोधकर्ताओं को सेवाएं दीं। इसके संचालन से प्राप्त अनुभव ने भारत के परमाणु अनुसंधान कार्यक्रम के विकास में योगदान दिया।

इस दृष्टि से अप्सरा को केवल देश का पहला अनुसंधान रिएक्टर कहना पर्याप्त नहीं होगा। वह भारत में परमाणु विज्ञान की व्यावहारिक शिक्षा और प्रयोगात्मक अनुसंधान के शुरुआती केंद्रों में से एक था।

पांच दशक से अधिक की सेवा और फिर विराम

अप्सरा ने 1956 में परिचालन शुरू किया और पांच दशक से अधिक समय तक वैज्ञानिक अनुसंधान में उपयोगी भूमिका निभाई।

समय के साथ किसी भी वैज्ञानिक सुविधा के उपकरण, संरचनाएं और तकनीकी आवश्यकताएं बदलती हैं। आधुनिक सुरक्षा मानकों के अनुरूप सुधार और उन्नयन की जरूरत भी पैदा होती है।

Dinman Times ads 728-90

अप्सरा के पुराने रिएक्टर को 2009 में स्थायी रूप से बंद करने का निर्णय लिया गया। इसके बाद पुराने रिएक्टर के उन्नत संस्करण की दिशा में काम आगे बढ़ा।

10 सितंबर 2018 को अप्सरा-यू (Apsara-U) ने क्रिटिकलिटी हासिल की। यह पुराने अप्सरा की तुलना में अधिक क्षमता वाला उन्नत अनुसंधान रिएक्टर है। इसमें स्वदेशी रूप से विकसित कम संवर्धित यूरेनियम आधारित ईंधन का उपयोग किया जाता है।

अप्सरा-यू का विकास यह दर्शाता है कि वैज्ञानिक विरासत का अर्थ केवल पुरानी उपलब्धियों को याद करना नहीं है। उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा उस अनुभव को आगे की तकनीकी प्रगति में इस्तेमाल करना भी है।

पुराने अप्सरा ने जिस वैज्ञानिक यात्रा की शुरुआत की थी, उसके बाद भारत ने अनुसंधान रिएक्टरों, परमाणु विज्ञान और संबंधित तकनीकों के क्षेत्र में अपनी क्षमताओं का विस्तार किया।

Dinman Times ads 728-90

आत्मनिर्भर भारत की वैज्ञानिक यात्रा में अप्सरा का महत्व

आज जब भारत स्वदेशी तकनीक, अनुसंधान और विनिर्माण क्षमता को मजबूत करने की बात करता है, तब अप्सरा का इतिहास एक महत्वपूर्ण संदर्भ प्रदान करता है।

1950 के दशक में देश के पास आज जैसी वैज्ञानिक सुविधाएं और तकनीकी संसाधन नहीं थे। फिर भी वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और नीति निर्माताओं ने ऐसी परियोजनाओं पर काम किया, जिनसे आगे के अनुसंधान कार्यक्रमों के लिए आधार तैयार हुआ।

अप्सरा की उपलब्धि को समझने का सही तरीका यह है कि इसे भारतीय परमाणु अनुसंधान की शुरुआती संस्थागत सफलताओं में गिना जाए। यह अपने आप में पूरे परमाणु कार्यक्रम की उपलब्धि नहीं था, लेकिन उस व्यापक यात्रा का एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक पड़ाव जरूर था।

इसने भारतीय वैज्ञानिक समुदाय को प्रयोगात्मक अनुसंधान का अवसर दिया, रेडियोआइसोटोप के उत्पादन और उपयोग को आगे बढ़ाने में मदद की तथा रिएक्टर तकनीक के व्यावहारिक अनुभव को मजबूत किया।

Dinman Times ads 728-90

विज्ञान में किसी एक उपलब्धि का महत्व केवल उसके तत्काल परिणाम से तय नहीं होता। कई बार उसका सबसे बड़ा योगदान उन संभावनाओं में होता है, जिन्हें वह भविष्य के लिए खोलती है।

अप्सरा ने भारतीय परमाणु विज्ञान के लिए ऐसी ही संभावनाएं पैदा कीं।

इतिहास में दर्ज एक वैज्ञानिक उपलब्धि

अप्सरा की कहानी हमें याद दिलाती है कि देश की वैज्ञानिक प्रगति एक दिन में नहीं होती। उसके पीछे लंबे समय तक किए गए अनुसंधान, वैज्ञानिक संस्थानों का निर्माण, प्रशिक्षित मानव संसाधन और लगातार सीखने की प्रक्रिया होती है।

डॉ. होमी जहांगीर भाभा की वैज्ञानिक दृष्टि, भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों का योगदान तथा परमाणु अनुसंधान को राष्ट्रीय विकास से जोड़ने के प्रयास इस इतिहास के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।

Dinman Times ads 728-90

4 अगस्त 1956 को अप्सरा की क्रिटिकलिटी और 20 जनवरी 1957 को उसका औपचारिक उद्घाटन भारतीय विज्ञान के इतिहास में दो अलग-अलग लेकिन परस्पर जुड़े महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।

अप्सरा ने यह साबित किया कि सीमित संसाधनों के बावजूद वैज्ञानिक अनुसंधान में आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षा, संस्थागत प्रयास और तकनीकी दक्षता मिलकर नई राह बना सकते हैं।

अप्सरा रिएक्टर की विरासत केवल भारत के पहले परमाणु अनुसंधान रिएक्टर होने तक सीमित नहीं है। उसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि उसने भारतीय वैज्ञानिकों को परमाणु अनुसंधान की दुनिया में अनुभव हासिल करने और देश की तकनीकी क्षमता को आगे बढ़ाने का अवसर दिया।

यही कारण है कि अप्सरा को याद करना केवल अतीत के गौरव को दोहराना नहीं, बल्कि उस वैज्ञानिक सोच को सम्मान देना है, जिसने आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

Dinman Times ads 728-90
TAGGED:Apsara Reactorअप्सरा रिएक्टरपरमाणु अनुसंधानपरमाणु विज्ञान
ख़बर साझा करें
Facebook Whatsapp Whatsapp Telegram Email Print
पिछली ख़बर निदा फ़ाज़ली की ऐतिहासिक तस्वीर, प्रसिद्ध उर्दू शायर और गीतकार निदा फ़ाज़ली: अल्फ़ाज़ का वह जादूगर, जिसने जिंदगी के छोटे-छोटे एहसासों को अमर शायरी में बदल दिया
अगली ख़बर क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871: काली विरासत और विमुक्त समुदायों का संघर्ष जब जन्म ही बना दिया गया अपराध: क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट की काली विरासत और आजादी के बाद भी जारी संघर्ष
Google prefered

गूगल पर फेवरेट बनाएँ

ये भी पढ़ें

राजगीर जू सफारी पहुंचे भारत-न्यूजीलैंड के रग्बी खिलाड़ी

जगीर जू सफारी पहुंचे भारत-न्यूजीलैंड के रग्बी खिलाड़ी, वन्यजीवों और प्राकृतिक सौंदर्य का लिया आनंद

नालंदा विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय सामाजिक विज्ञान सम्मेलन संपन्न

नालंदा विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय सामाजिक विज्ञान सम्मेलन संपन्न, राज्यपाल बोले— बिहार के विकास से ही साकार होगा विकसित भारत का सपना

अस्थावां में ब्राउन शुगर पर पुलिस का शिकंजा, तीन गिरफ्तार

अस्थावां में ब्राउन शुगर के कारोबार पर पुलिस का शिकंजा, तीन गिरफ्तार; 1.08 लाख रुपये नकद बरामद

नीतीश कुमार ने एसपीएम कॉलेज में विकास योजनाओं का किया उद्घाटन

नीतीश कुमार ने एसपीएम कॉलेज में विकास योजनाओं का किया उद्घाटन, निशांत कुमार के समर्थन में लगे नारे

रहुई बाजार में 4.040 किलो गांजा बरामद, दो गिरफ्तार

रहुई बाजार में डेयरी एवं किराना दुकान से 4.040 किलो गांजा बरामद, दो कारोबारी गिरफ्तार

Dinman Ads

Get Connected with us on social networks

Facebook-f X-twitter Instagram Youtube Linkedin-in

Poppular Categories

  • बिहार
  • देश
  • अपराध
  • राजनीति
  • मनोरंजन
  • धर्म
  • विदेश
  • खेल
  • टेक्नोलॉजी
  • बिज़नेस

Download APP

Google-play Apple
  • About us
  • Privacy Policy
  • Terms and Condition
  • Cookies Policy
  • Contact us
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

Lost your password?