कोलकाता। कोलकाता नगर निगम के चुनाव की प्रतीक्षा कर रहे शहरवासियों के सामने अब एक नया प्रशासनिक सवाल खड़ा हो गया है। वार्ड स्तर पर को-ऑर्डिनेटर नियुक्त करने की मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की घोषणा ने नगर निगम की अंतरिम व्यवस्था को लेकर बहस तेज कर दी है। इस चर्चा के केंद्र में मौजूदा प्रशासक स्मिता पांडे की भूमिका और 1972 से 1985 के बीच निगम में लागू मनोनीत प्रतिनिधियों की व्यवस्था है। उस दौर में शिवप्रसाद समाद्दार का नाम वार्ड स्तर पर प्रशासनिक प्रतिनिधित्व के संदर्भ में लिया जाता रहा है।
वर्तमान स्थिति की तुलना पुराने दौर से करते हुए यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या कोलकाता एक बार फिर लंबे समय तक निर्वाचित पार्षदों के बिना काम करेगा। हालांकि, मौजूदा कानूनी और प्रशासनिक परिस्थितियों को पुराने घटनाक्रम के समान मानना जल्दबाजी होगी। फिलहाल चुनाव की तारीख, वार्ड परिसीमन और प्रशासक की शक्तियों से जुड़े मुद्दे अदालत तथा प्रशासनिक प्रक्रिया के बीच हैं।
हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश से चुनाव कार्यक्रम पर असर
नवंबर के अंतिम सप्ताह में कोलकाता नगर निगम चुनाव की घोषणा होने की अटकलें लगाई जा रही थीं। लेकिन शुक्रवार को कलकत्ता हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद इन संभावनाओं पर विराम लग गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अदालत ने कहा है कि वार्डों के परिसीमन से संबंधित मामले का निपटारा होने तक नगर निगम चुनाव की अधिसूचना जारी नहीं की जा सकती। इस मामले में प्रशासक की शक्तियों और वार्डों की संख्या बढ़ाने की प्रक्रिया की वैधता पर भी सवाल उठाए गए हैं।
परिसीमन चुनाव की तैयारी का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, क्योंकि इसी के आधार पर वार्डों की सीमाएं और मतदाताओं का प्रतिनिधित्व तय होता है। जब परिसीमन पर कानूनी विवाद लंबित हो, तब चुनाव कार्यक्रम आगे बढ़ाने को लेकर अनिश्चितता पैदा होना स्वाभाविक है। अदालत के अंतरिम आदेश ने इसी अनिश्चितता को और स्पष्ट कर दिया है।

1972 से 1985 तक मनोनीत प्रतिनिधियों का दौर
कोलकाता नगर निगम के इतिहास में 1972 से 1985 के बीच लगभग 13 वर्षों तक वार्ड स्तर पर मनोनीत प्रतिनिधियों के जरिए नागरिकों से संपर्क बनाए रखने की व्यवस्था रही थी। उस समय निर्वाचित पार्षदों के स्थान पर वार्डों में मनोनीत लोगों को जिम्मेदारी दी जाती थी। उन्हें औपचारिक रूप से मनोनीत पार्षद कहा जाता था। इस व्यवस्था का उद्देश्य स्थानीय जरूरतों और नागरिक समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाने के लिए वार्ड स्तर पर संपर्क बनाए रखना था।
मुख्यमंत्री की ओर से वार्ड को-ऑर्डिनेटर नियुक्त करने की घोषणा को इसी ऐतिहासिक व्यवस्था के संदर्भ में देखा जा रहा है। जब निर्वाचित पार्षद मौजूद नहीं हों, तब सड़क, सफाई, जलापूर्ति और अन्य स्थानीय नागरिक सेवाओं से जुड़ी शिकायतों के लिए लोगों को किसी संपर्क व्यक्ति की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि, को-ऑर्डिनेटरों की भूमिका, अधिकार और जवाबदेही किस तरह तय होगी, इस पर स्पष्ट विवरण सामने आना बाकी है।
जवाबदेही और राजनीतिक प्रभाव को लेकर सवाल
वार्ड को-ऑर्डिनेटर व्यवस्था को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक बहस भी सामने आई है। निर्वाचित पार्षद सीधे मतदाताओं से जनादेश प्राप्त करते हैं और उनका कार्यकाल तथा जवाबदेही चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी होती है। इसके विपरीत, मनोनीत या नियुक्त प्रतिनिधि की जवाबदेही किस संस्था या अधिकारी के प्रति होगी, यह अहम प्रश्न है। यदि नियुक्ति का आधार और अधिकार स्पष्ट नहीं हुए तो स्थानीय स्तर पर राजनीतिक प्रभाव और प्रशासनिक जिम्मेदारी के बीच अंतर को लेकर विवाद पैदा हो सकता है।
दूसरी ओर, निर्वाचित बोर्ड की अनुपस्थिति में नागरिक सेवाओं को बाधित नहीं होने देना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है। इसलिए किसी अस्थायी संपर्क व्यवस्था की जरूरत और उसके लोकतांत्रिक जवाबदेही ढांचे के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण होगा।

1985 में फिर लौटा था निर्वाचित बोर्ड
नगर निगम के इतिहास में 1985 का वर्ष महत्वपूर्ण माना जाता है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, 1980 में नए कानून की व्यवस्था तैयार हुई और जनवरी 1984 में इसे प्रभावी किया गया। वामपंथी नेतृत्व की योजना 1981-82 के दौरान चुनाव कराने की थी, लेकिन 18 वर्ष की उम्र में मतदान के अधिकार से जुड़ा मामला अदालत में लंबित रहने के कारण चुनाव टल गया। अंततः 1985 में चुनाव हुए और 30 जुलाई को नए निर्वाचित नगर निगम बोर्ड ने कार्यभार संभाला।
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण मौजूदा हालात की तुलना उस समय से की जा रही है। फिर भी दोनों अवधियों के कानून, राजनीतिक परिस्थितियां और प्रशासनिक ढांचे में अंतर है। इतिहास की तुलना मौजूदा विवाद को समझने में मदद कर सकती है, लेकिन उससे भविष्य का नतीजा तय नहीं होता।
स्मिता पांडे के सामने प्रशासनिक चुनौती
मौजूदा प्रशासक स्मिता पांडे के सामने एक ओर निर्वाचित बोर्ड के अभाव में शहर की नागरिक सेवाओं को सुचारु बनाए रखने की जिम्मेदारी है, वहीं दूसरी ओर परिसीमन से जुड़े मामले के अदालत में लंबित रहने के दौरान प्रशासनिक व्यवस्था संभालनी है। वार्ड को-ऑर्डिनेटरों की नियुक्ति से स्थानीय कामकाज को गति मिलेगी या प्रशासनिक शक्तियों का नया स्तर बनेगा, यह नियुक्ति के नियम और अधिकार स्पष्ट होने के बाद ही समझा जा सकेगा।
फिलहाल कोलकाता के सामने दो सवाल हैं—नगर निगम चुनाव की अधिसूचना कब जारी हो पाएगी और निर्वाचित पार्षदों की वापसी तक वार्ड स्तर पर नागरिकों की समस्याओं का समाधान किस व्यवस्था से होगा। स्मिता पांडे की भूमिका की तुलना शिवप्रसाद समाद्दार से की जा रही है, लेकिन यह तुलना अभी राजनीतिक-प्रशासनिक बहस का हिस्सा है, कोई तय निष्कर्ष नहीं।

