राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस भारत में हर वर्ष 7 नवंबर को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य कैंसर के जोखिम, रोकथाम, शुरुआती लक्षणों, समय पर जाँच और उपचार के बारे में आम लोगों को जागरूक करना है। इस दिवस की घोषणा सितंबर 2014 में तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने की थी। 7 नवंबर की तारीख नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक मैरी क्यूरी की जयंती के सम्मान में चुनी गई, जिनका जन्म 7 नवंबर 1867 को वारसा में हुआ था।
यह दिवस एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य संदेश देता है—कैंसर का नाम सुनकर डरने या जाँच टालने के बजाय सही जानकारी, जोखिम में कमी, लक्षणों की समय पर चिकित्सकीय जाँच और जरूरत पड़ने पर शीघ्र उपचार की दिशा में कदम उठाना चाहिए। कैंसर एक ही बीमारी नहीं, बल्कि अनेक प्रकार की बीमारियों का समूह है। हर कैंसर के कारण, लक्षण, जाँच और उपचार अलग हो सकते हैं। इसलिए जागरूकता के साथ वैज्ञानिक और व्यक्ति-केंद्रित चिकित्सा सलाह भी जरूरी है।
राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस की शुरुआत कब और क्यों हुई?
19 सितंबर 2014 को केरल के तिरुवनंतपुरम में एक कार्यक्रम के दौरान तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने घोषणा की कि हर वर्ष 7 नवंबर को देशभर में राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस मनाया जाएगा। उस समय सरकार ने कैंसर की जल्दी पहचान, शुरुआती लक्षणों पर ध्यान देने और कैंसर का जोखिम बढ़ाने वाली जीवनशैली से बचाव को जन-अभियान का हिस्सा बनाने पर जोर दिया था।
इस पहल के पीछे एक बड़ी चिंता यह थी कि अनेक मरीजों में कैंसर का पता बीमारी के उन्नत चरण में चलता है। देर से पहचान होने पर उपचार अधिक जटिल हो सकता है और इलाज का खर्च भी बढ़ सकता है। इस दिवस के जरिए लोगों को सरकारी अस्पतालों, CGHS और अन्य सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में उपलब्ध जाँच सेवाओं की जानकारी लेने तथा असामान्य लक्षण दिखने पर चिकित्सकीय सलाह लेने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस और 4 फरवरी को मनाया जाने वाला विश्व कैंसर दिवस अलग-अलग अवसर हैं। भारत में 7 नवंबर का राष्ट्रीय दिवस देश के भीतर कैंसर की रोकथाम और शुरुआती पहचान पर ध्यान केंद्रित करता है, जबकि विश्व कैंसर दिवस अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता और कार्रवाई का मंच है।
7 नवंबर का मैरी क्यूरी से संबंध
मैरी क्यूरी का जन्म 7 नवंबर 1867 को वारसा में हुआ था। वह भौतिकी और रसायन विज्ञान के क्षेत्र में अपने असाधारण योगदान के लिए जानी जाती हैं। पियरे क्यूरी के साथ उन्होंने रेडियोधर्मिता के अध्ययन को आगे बढ़ाया और पोलोनियम तथा रेडियम की खोज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें 1903 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार और 1911 में रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला। वह दो अलग-अलग विज्ञान विषयों में नोबेल पुरस्कार पाने वाली पहली व्यक्ति थीं।
रेडियोधर्मिता और विकिरण के वैज्ञानिक अध्ययन ने चिकित्सा में विकिरण के उपयोग तथा कैंसर के उपचार में रेडियोथेरेपी के विकास की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि तैयार करने में योगदान दिया। हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि मैरी क्यूरी ने अकेले रेडियोथेरेपी का आविष्कार किया था। कैंसर उपचार में विकिरण का चिकित्सकीय उपयोग अनेक वैज्ञानिकों, चिकित्सकों और तकनीकी विशेषज्ञों के क्रमिक शोध का परिणाम है।
कैंसर क्या है?
हमारे शरीर में कोशिकाएँ सामान्य रूप से नियंत्रित तरीके से बढ़ती और विभाजित होती हैं। पुरानी या क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की जगह नई कोशिकाएँ आती हैं। जब कोशिकाओं के भीतर आनुवंशिक बदलावों के कारण यह नियंत्रण बिगड़ जाता है और असामान्य कोशिकाएँ अनियंत्रित ढंग से बढ़ने लगती हैं, तो कैंसर विकसित हो सकता है। कुछ कैंसर आसपास के ऊतकों में फैलते हैं और रक्त या लसीका तंत्र के जरिए शरीर के दूसरे हिस्सों तक पहुँच सकते हैं। इस प्रक्रिया को मेटास्टेसिस कहा जाता है।

कैंसर के कई प्रकार होते हैं—जैसे स्तन, फेफड़े, मुख, गर्भाशय-ग्रीवा, बड़ी आंत, प्रोस्टेट, रक्त और त्वचा के कैंसर। इनके जोखिम कारक और शुरुआती संकेत एक जैसे नहीं होते। किसी व्यक्ति में जोखिम कारक मौजूद होने का अर्थ यह नहीं कि उसे कैंसर निश्चित रूप से होगा; इसी तरह जोखिम कारक न दिखने पर भी कैंसर हो सकता है।
भारत में कैंसर का बढ़ता सार्वजनिक स्वास्थ्य महत्व
भारत में कैंसर का बोझ स्वास्थ्य व्यवस्था, परिवारों और मरीजों के लिए एक बड़ी चुनौती है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम के अनुमानों के अनुसार, देश में 2024 के दौरान कैंसर के नए मामलों की अनुमानित संख्या 15,33,055 थी। यह अनुमान है, किसी एक वर्ष में दर्ज किए गए सभी व्यक्तिगत मरीजों की प्रत्यक्ष गणना नहीं।
कैंसर के मामलों में वृद्धि के पीछे कई कारण हो सकते हैं—जनसंख्या का बढ़ना और उम्रदराज होना, तंबाकू और शराब का सेवन, कुछ संक्रमण, पर्यावरणीय और व्यावसायिक जोखिम, जीवनशैली में बदलाव तथा जाँच और निदान की बेहतर उपलब्धता। इसलिए बढ़ते आँकड़ों को किसी एक कारण से जोड़ना उचित नहीं है।
भारत सरकार का राष्ट्रीय गैर-संचारी रोग रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम (NP-NCD) मुख, स्तन और गर्भाशय-ग्रीवा के सामान्य कैंसरों की रोकथाम, स्क्रीनिंग, शुरुआती पहचान और रेफरल सेवाओं पर विशेष ध्यान देता है। 30 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों को लक्षित कर जनसंख्या-आधारित स्क्रीनिंग की व्यवस्था आयुष्मान आरोग्य मंदिरों और अन्य सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों के माध्यम से की जाती है। किस व्यक्ति को कौन-सी जाँच और कितनी बार चाहिए, यह स्थानीय कार्यक्रम, उम्र, लिंग, लक्षण, पारिवारिक इतिहास और व्यक्तिगत जोखिम के अनुसार स्वास्थ्यकर्मी तय करते हैं।

कैंसर के प्रमुख जोखिम कारक
कैंसर का विकास कई बार लंबे समय में अनेक कारकों के संयुक्त प्रभाव से होता है। कुछ जोखिम घटाए जा सकते हैं, जबकि कुछ—जैसे उम्र और आनुवंशिक प्रवृत्ति—व्यक्ति के नियंत्रण से बाहर होते हैं। प्रमुख परिवर्तनीय जोखिम कारकों में शामिल हैं:
- तंबाकू: सिगरेट, बीड़ी, सिगार, हुक्का, गुटखा, खैनी और अन्य धूम्ररहित तंबाकू मुख, गले, फेफड़े तथा कई अन्य कैंसरों का जोखिम बढ़ाते हैं। सेकंड-हैंड धुएँ से भी बचना चाहिए।
- शराब: शराब का सेवन कई प्रकार के कैंसर के जोखिम से जुड़ा है। सेवन कम करना या न करना जोखिम घटाने का एक महत्वपूर्ण कदम है।
- अस्वस्थ आहार और शारीरिक निष्क्रियता: अत्यधिक ऊर्जा-युक्त और पोषण की दृष्टि से असंतुलित भोजन, कम शारीरिक गतिविधि तथा अधिक वजन कुछ कैंसरों के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
- संक्रमण: ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV) का लगातार संक्रमण गर्भाशय-ग्रीवा के कैंसर का प्रमुख कारण है। हेपेटाइटिस बी और सी संक्रमण यकृत कैंसर का जोखिम बढ़ा सकते हैं।
- पराबैंगनी विकिरण: अत्यधिक UV exposure त्वचा कैंसर का जोखिम बढ़ा सकता है।
- वायु प्रदूषण और व्यावसायिक संपर्क: वायु प्रदूषण तथा कुछ औद्योगिक रसायनों, धूल और विकिरण के असुरक्षित संपर्क से कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है।
कैंसर की रोकथाम के लिए क्या करें?
हर कैंसर को रोकना संभव नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित कुछ कदम कई कैंसरों का जोखिम घटा सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, तंबाकू से दूरी, स्वस्थ वजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित भोजन, शराब से परहेज या सेवन में कमी और कुछ कैंसरकारी संक्रमणों से बचाव महत्वपूर्ण उपाय हैं।
- तंबाकू और निकोटीन उत्पादों का सेवन न करें; छोड़ने में कठिनाई हो तो प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी या तंबाकू-निरोधक सेवा की मदद लें।
- फल, सब्जियाँ, साबुत अनाज, दालें और विविध पौध-आधारित खाद्य पदार्थों को भोजन में शामिल करें।
- नियमित शारीरिक गतिविधि करें और स्वस्थ वजन बनाए रखने का प्रयास करें।
- शराब से बचें; शराब का कोई भी स्तर कैंसर के जोखिम से पूरी तरह मुक्त नहीं माना जा सकता।
- चिकित्सकीय सलाह और राष्ट्रीय दिशानिर्देशों के अनुसार HPV तथा हेपेटाइटिस बी टीकाकरण पर विचार करें।
- तेज धूप में त्वचा की सुरक्षा करें और कार्यस्थल पर सुरक्षा मानकों का पालन करें।
- किसी भी लगातार या असामान्य शारीरिक बदलाव को नजरअंदाज न करें।
शुरुआती लक्षण: किन संकेतों पर ध्यान दें?
कैंसर के शुरुआती चरण में कई बार स्पष्ट लक्षण नहीं होते। कुछ लक्षण सामान्य संक्रमण या दूसरी गैर-कैंसर बीमारियों में भी दिख सकते हैं। फिर भी निम्नलिखित बदलाव बने रहें, बार-बार हों या बढ़ते जाएँ तो डॉक्टर से जाँच कराना चाहिए:
- शरीर में नई गांठ या सूजन, विशेषकर स्तन या गर्दन में।
- मुंह में घाव या छाला जो ठीक न हो, सफेद या लाल धब्बा, आवाज में लगातार बदलाव या निगलने में कठिनाई।
- बिना स्पष्ट कारण लगातार खाँसी, आवाज बैठना या खाँसी में खून आना।
- मल-मूत्र की आदतों में लगातार बदलाव या मल में खून।
- असामान्य रक्तस्राव—जैसे रजोनिवृत्ति के बाद रक्तस्राव या सामान्य मासिक चक्र से अलग रक्तस्राव।
- तिल या त्वचा के किसी निशान के आकार, रंग या स्वरूप में बदलाव।
- बिना प्रयास के वजन कम होना, लंबे समय तक असामान्य थकान या लगातार अस्पष्ट दर्द।
इनमें से कोई लक्षण अपने-आप कैंसर का प्रमाण नहीं है। लेकिन लक्षणों की जाँच में देरी नहीं करनी चाहिए। चिकित्सक इतिहास, शारीरिक परीक्षण और जरूरत के अनुसार इमेजिंग, एंडोस्कोपी, प्रयोगशाला जाँच या बायोप्सी की सलाह दे सकते हैं। कैंसर की पुष्टि आम तौर पर उपयुक्त जाँचों के बाद ही होती है।

स्क्रीनिंग और शुरुआती निदान में अंतर
स्क्रीनिंग का अर्थ है ऐसे लोगों में, जिन्हें कोई स्पष्ट लक्षण नहीं है, किसी विशेष कैंसर या पूर्व-कैंसर अवस्था के संकेत खोजने के लिए निर्धारित जाँच करना। इसके विपरीत, शुरुआती निदान में लक्षण वाले व्यक्ति की समय पर चिकित्सकीय जाँच, निदान और उपचार तक पहुँच शामिल होती है। दोनों महत्वपूर्ण हैं, लेकिन हर व्यक्ति के लिए हर कैंसर की स्क्रीनिंग कराना सही नहीं है।
भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम में मुख, स्तन और गर्भाशय-ग्रीवा के कैंसरों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। मुख की जाँच प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी द्वारा की जा सकती है; स्तन कैंसर के लिए आयु और जोखिम के अनुसार चिकित्सकीय मूल्यांकन तथा उपयुक्त जाँच की सलाह दी जाती है; गर्भाशय-ग्रीवा के कैंसर की रोकथाम में HPV परीक्षण, पैप परीक्षण और पूर्व-कैंसर बदलावों की पहचान की भूमिका है। उपलब्ध सेवाएँ और अपनाए जाने वाले प्रोटोकॉल क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकते हैं।
मैमोग्राफी, पैप परीक्षण, HPV परीक्षण, कोलोनोस्कोपी, CT या अन्य जाँचें सभी लोगों के लिए एक जैसी या स्वतः आवश्यक नहीं होतीं। उदाहरण के लिए, बिना लक्षण वाले औसत जोखिम के व्यक्ति और अधिक जोखिम वाले व्यक्ति के लिए स्क्रीनिंग की रणनीति अलग हो सकती है। गलत या अनावश्यक स्क्रीनिंग से झूठे सकारात्मक नतीजे, चिंता और अतिरिक्त प्रक्रियाएँ हो सकती हैं। इसलिए स्क्रीनिंग का निर्णय चिकित्सकीय सलाह और मान्य दिशानिर्देशों के आधार पर होना चाहिए।
कैंसर का उपचार: डर नहीं, समय पर सही देखभाल
कैंसर का उपचार उसके प्रकार, चरण, कोशिकाओं की जैविक विशेषताओं, मरीज की समग्र सेहत और उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर करता है। उपचार में सर्जरी, रेडियोथेरेपी, कीमोथेरेपी, हार्मोन थेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी या इनके संयोजन का उपयोग हो सकता है। हर मरीज को सभी उपचारों की जरूरत नहीं होती।

समय पर निदान और उपयुक्त उपचार से कई कैंसरों में बेहतर परिणाम संभव हैं। मरीज और परिवार को ऑन्कोलॉजिस्ट तथा बहु-विषयक कैंसर देखभाल टीम से उपचार विकल्प, संभावित लाभ, दुष्प्रभाव, खर्च, पोषण, मानसिक स्वास्थ्य और पुनर्वास पर स्पष्ट बातचीत करनी चाहिए। उपचार बीच में रोकना, अप्रमाणित घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहना या चिकित्सकीय सलाह के बिना दवाएँ लेना नुकसानदेह हो सकता है।
भारत में सरकारी कैंसर सेवाएँ और सहायता
भारत सरकार राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत NP-NCD कार्यक्रम के माध्यम से कैंसर की रोकथाम, स्क्रीनिंग, शुरुआती निदान और उपयुक्त स्वास्थ्य संस्थानों तक रेफरल को मजबूत कर रही है। आयुष्मान आरोग्य मंदिर, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, जिला अस्पताल और उच्चतर कैंसर संस्थान इस व्यवस्था के अलग-अलग स्तरों पर भूमिका निभाते हैं। उपलब्ध सेवाओं, पात्रता और रेफरल प्रक्रिया की जानकारी नजदीकी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र से ली जा सकती है।
कैंसर के उपचार में आर्थिक सहायता और स्वास्थ्य बीमा योजनाओं की पात्रता मरीज की स्थिति तथा लागू सरकारी प्रावधानों पर निर्भर करती है। परिवारों को अस्पताल के सामाजिक कार्यकर्ता, मरीज सहायता डेस्क या संबंधित सरकारी स्वास्थ्य विभाग से उपलब्ध सहायता की जानकारी लेनी चाहिए।
परिवार, समुदाय और मीडिया की भूमिका
कैंसर जागरूकता केवल एक दिन का अभियान नहीं होना चाहिए। परिवारों में तंबाकू-मुक्त वातावरण, स्वस्थ भोजन, नियमित गतिविधि और स्वास्थ्य संबंधी खुली बातचीत को बढ़ावा देना जरूरी है। स्कूल, कार्यस्थल, पंचायत, स्वयंसेवी संगठन और स्थानीय स्वास्थ्य संस्थान जागरूकता शिविर, जोखिम-आधारित परामर्श और उपलब्ध स्क्रीनिंग सेवाओं की जानकारी साझा कर सकते हैं।

मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह कैंसर से जुड़ी खबरों में सनसनी, भय और चमत्कारी इलाज के दावों से बचे। कैंसर को किसी व्यक्ति की गलती या नैतिक कमजोरी के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। मरीजों की निजता और गरिमा का सम्मान करते हुए प्रमाण-आधारित जानकारी, उपचार की वास्तविक संभावनाएँ और सहायता सेवाएँ सामने लानी चाहिए।
राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस: याद रखने योग्य बातें
- तिथि: 7 नवंबर, हर वर्ष
- शुरुआत की घोषणा: सितंबर 2014
- घोषणा करने वाले: तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन
- तिथि चुनने का कारण: मैरी क्यूरी की जयंती; जन्म 7 नवंबर 1867
- मुख्य उद्देश्य: कैंसर की रोकथाम, जोखिम में कमी, शुरुआती लक्षणों की पहचान, स्क्रीनिंग और समय पर उपचार के प्रति जागरूकता
- भारत में प्रमुख सार्वजनिक स्क्रीनिंग फोकस: मुख, स्तन और गर्भाशय-ग्रीवा के सामान्य कैंसर; कार्यक्रम में 30 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों को लक्षित किया जाता है।
निष्कर्ष
राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस हमें याद दिलाता है कि कैंसर के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत सही जानकारी और समय पर कार्रवाई से होती है। तंबाकू से दूरी, स्वस्थ जीवनशैली, टीकाकरण, जोखिम के अनुरूप स्क्रीनिंग और असामान्य लक्षणों पर शीघ्र चिकित्सकीय सलाह—ये सभी कदम महत्वपूर्ण हैं। साथ ही, कैंसर से जूझ रहे लोगों को सहानुभूति, गरिमा, आर्थिक-सामाजिक सहयोग और वैज्ञानिक उपचार उपलब्ध कराना समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था की साझा जिम्मेदारी है।
संदेश: कैंसर के लक्षणों को छिपाएँ नहीं, जाँच को टालें नहीं और अप्रमाणित उपचारों पर भरोसा न करें। जागरूक रहें, चिकित्सकीय सलाह लें और समय पर उपचार की दिशा में कदम बढ़ाएँ।
