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मुक्केबाजी के इतिहास में जो फ्रेज़ियर (Joe Frazier) का नाम साहस, आक्रामक शैली और अदम्य जुझारूपन के लिए सम्मान से लिया जाता है। ‘स्मोकिन’ जो’ के नाम से मशहूर इस अमेरिकी मुक्केबाज ने 1964 टोक्यो ओलंपिक में हैवीवेट वर्ग का स्वर्ण पदक जीता और आगे चलकर विश्व के निर्विवाद हैवीवेट चैंपियन बने। मुहम्मद अली के साथ उनकी प्रतिद्वंद्विता ने खेल इतिहास की सबसे चर्चित त्रयी में जगह बनाई। 7 नवंबर 2011 को 67 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।
दक्षिण कैरोलाइना से फिलाडेल्फिया तक का सफर
जोसेफ विलियम फ्रेज़ियर का जन्म 12 जनवरी 1944 को अमेरिका के दक्षिण कैरोलाइना राज्य के ब्यूफोर्ट में हुआ। वे रुबिन और डॉली फ्रेज़ियर के बारह बच्चों में सबसे छोटे थे। उनका परिवार खेतों में मेहनत-मजदूरी कर जीवनयापन करता था। आर्थिक कठिनाइयों के कारण फ्रेज़ियर की औपचारिक पढ़ाई किशोरावस्था में ही छूट गई। लगभग 15 वर्ष की उम्र में वे बेहतर काम और अवसरों की तलाश में फिलाडेल्फिया पहुंचे।
फिलाडेल्फिया में उन्होंने मीट पैकिंग संयंत्र में काम किया। वहीं उनकी शारीरिक ताकत और मुक्केबाजी में रुचि को दिशा मिली। 1961 में वे पुलिस एथलेटिक लीग के जिम में प्रशिक्षण लेने लगे। प्रशिक्षक यांकी ‘यांक’ डरहम ने उनकी प्रतिभा पहचानी और उन्हें तकनीकी रूप से तराशा। फ्रेज़ियर की झुकी हुई रक्षात्मक मुद्रा, लगातार आगे बढ़ने की क्षमता और विशेष रूप से बायां हुक उनकी पहचान बन गए। उनकी शैली ने उन्हें ‘स्मोकिन’ जो’ का लोकप्रिय उपनाम दिलाया।

1964 टोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण पदक
शौकिया मुक्केबाजी में फ्रेज़ियर ने तेजी से अपनी पहचान बनाई। उन्होंने मिडिल अटलांटिक गोल्डन ग्लव्स प्रतियोगिता में लगातार तीन बार हैवीवेट खिताब जीता। 1964 के अमेरिकी ओलंपिक ट्रायल के फाइनल में वे बस्टर मैथिस से हार गए थे और शुरुआत में उन्हें वैकल्पिक खिलाड़ी के रूप में चुना गया। लेकिन मैथिस के हाथ में चोट लगने के कारण फ्रेज़ियर को टोक्यो ओलंपिक में उतरने का अवसर मिला।
ओलंपिक प्रतियोगिता में फ्रेज़ियर ने अपनी ताकत और दृढ़ता का परिचय दिया। सेमीफाइनल में उनका अंगूठा चोटिल हो गया, फिर भी उन्होंने मुकाबला जारी रखा। फाइनल में उन्होंने पश्चिम जर्मनी के हांस ह्यूबर को 3-2 के निर्णय से हराकर हैवीवेट स्वर्ण पदक जीता। वे टोक्यो 1964 में मुक्केबाजी का स्वर्ण जीतने वाले अमेरिकी दल के एकमात्र मुक्केबाज थे। यह उपलब्धि उनके पेशेवर करियर की मजबूत नींव बनी।
पेशेवर मुक्केबाजी और विश्व चैंपियन बनने की राह
फ्रेज़ियर ने 1965 में पेशेवर मुक्केबाजी शुरू की और शुरुआती मुकाबलों में लगातार जीत दर्ज की। उनकी आक्रामक शैली और ताकतवर लेफ्ट हुक ने उन्हें हैवीवेट वर्ग के शीर्ष दावेदारों में पहुंचा दिया। 1968 में उन्होंने बस्टर मैथिस को हराकर न्यूयॉर्क स्टेट एथलेटिक कमीशन का विश्व हैवीवेट खिताब जीता।
16 फरवरी 1970 को मैडिसन स्क्वायर गार्डन में उन्होंने जिमी एलिस को पांचवें दौर में तकनीकी नॉकआउट से हराया। इस जीत के साथ उन्होंने वर्ल्ड बॉक्सिंग एसोसिएशन (WBA) का खिताब हासिल किया और निर्विवाद विश्व हैवीवेट चैंपियन बने। उन्होंने बॉब फोस्टर सहित प्रमुख मुक्केबाजों के विरुद्ध अपने खिताब का बचाव किया। उस दौर में फ्रेज़ियर हैवीवेट मुक्केबाजी के सबसे प्रभावशाली खिलाड़ियों में गिने जाते थे।

मुहम्मद अली के साथ ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्विता
जो फ्रेज़ियर और मुहम्मद अली की प्रतिद्वंद्विता खेल इतिहास की सबसे चर्चित प्रतिस्पर्धाओं में से एक है। दोनों की शैली और व्यक्तित्व अलग थे। अली अपनी तेज गति, फुटवर्क और शब्दों के तीखे इस्तेमाल के लिए प्रसिद्ध थे, जबकि फ्रेज़ियर दबाव बनाकर लगातार मुक्के बरसाने और मजबूत लेफ्ट हुक के लिए जाने जाते थे। रिंग के बाहर अली की टिप्पणियों ने दोनों के बीच तनाव को और बढ़ाया, हालांकि बाद के वर्षों में उनके संबंधों में जटिलता और सम्मान दोनों दिखाई दिए।
पहली भिड़ंत—‘फाइट ऑफ द सेंचुरी’ (8 मार्च 1971): न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में हुए इस मुकाबले को ‘फाइट ऑफ द सेंचुरी’ कहा गया। अली लंबे अंतराल के बाद रिंग में लौटे थे। मुकाबले के अंतिम दौर में फ्रेज़ियर के बाएं हुक ने अली को गिरा दिया। 15 दौर के बाद तीनों जजों ने फ्रेज़ियर के पक्ष में निर्णय दिया। यह अली की पेशेवर करियर की पहली हार थी और फ्रेज़ियर ने अपनी चैंपियन स्थिति को और मजबूत किया।
दूसरी भिड़ंत (28 जनवरी 1974): दोनों मुक्केबाजों का दूसरा मुकाबला भी मैडिसन स्क्वायर गार्डन में हुआ। इस बार अली ने 12 दौर के बाद सर्वसम्मत निर्णय से जीत दर्ज की। हालांकि यह मुकाबला विश्व खिताब के लिए नहीं था, लेकिन इसने उनकी प्रतिद्वंद्विता को जीवित रखा।
तीसरी भिड़ंत—‘थ्रिला इन मनीला’ (1 अक्टूबर 1975): फिलीपींस की राजधानी मनीला में हुआ तीसरा मुकाबला मुक्केबाजी के सबसे कठिन और यादगार मुकाबलों में गिना जाता है। दोनों ने भीषण गर्मी में 14 दौर तक संघर्ष किया। अंतिम दौर से पहले फ्रेज़ियर के प्रशिक्षक एडी फच ने उनकी हालत और दृष्टि की समस्या को देखते हुए मुकाबला रोक दिया। आधिकारिक परिणाम में अली को तकनीकी नॉकआउट से विजेता घोषित किया गया। इस मुकाबले ने दोनों खिलाड़ियों की शारीरिक सहनशक्ति और प्रतिस्पर्धी जज्बे को अमर कर दिया।

जॉर्ज फोरमैन से हार और करियर का अंतिम दौर
22 जनवरी 1973 को जमैका के किंग्स्टन में जॉर्ज फोरमैन ने फ्रेज़ियर को दूसरे दौर में हराकर उनका निर्विवाद हैवीवेट खिताब छीन लिया। मुकाबले में फ्रेज़ियर छह बार नीचे गिरे। उन्होंने वापसी की कोशिश की और 1974 में अली के विरुद्ध मुकाबले सहित कई मुकाबले लड़े, लेकिन विश्व खिताब दोबारा हासिल नहीं कर सके। 1976 में फोरमैन से दूसरी हार के बाद उन्होंने पेशेवर मुक्केबाजी से संन्यास ले लिया। 1981 में एक संक्षिप्त वापसी के बाद उन्होंने हमेशा के लिए रिंग छोड़ दी।
उनका पेशेवर रिकॉर्ड 32 जीत, 4 हार और 1 ड्रॉ रहा; 32 जीत में से 27 नॉकआउट से मिलीं। यह रिकॉर्ड उनके आक्रामक और निर्णायक मुक्केबाजी अंदाज को दर्शाता है।
रिंग के बाद का जीवन और सम्मान
संन्यास के बाद फ्रेज़ियर फिलाडेल्फिया में रहे और उन्होंने अपना मुक्केबाजी जिम चलाया। वे युवा मुक्केबाजों को प्रशिक्षण देते थे और अपने बेटे मार्विस फ्रेज़ियर सहित नई पीढ़ी के खिलाड़ियों का मार्गदर्शन करते थे। उन्होंने संगीत में भी रुचि दिखाई और ‘द नॉकआउट्स’ नाम के समूह के साथ प्रस्तुति दी। उनकी कहानी लोकप्रिय संस्कृति में भी पहुंची; फिलाडेल्फिया के मीट पैकिंग संयंत्र में उनके काम को फिल्म ‘रॉकी’ के एक प्रसिद्ध प्रशिक्षण दृश्य से जोड़ा जाता है।
फ्रेज़ियर को 1990 में इंटरनेशनल बॉक्सिंग हॉल ऑफ फेम में शामिल किया गया। अमेरिकी खेल संस्थाओं ने भी उनके ओलंपिक स्वर्ण और पेशेवर उपलब्धियों को सम्मानित किया। उनके जीवन की कहानी केवल खिताबों की सूची नहीं, बल्कि कठिन सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों से निकलकर विश्व खेल मंच पर अपनी जगह बनाने की मिसाल है।

7 नवंबर 2011: ‘स्मोकिन’ जो’ को अंतिम विदाई
2011 में फ्रेज़ियर को लिवर कैंसर का पता चला। बीमारी तेजी से बढ़ी और 7 नवंबर 2011 को फिलाडेल्फिया में उनका निधन हो गया। वे 67 वर्ष के थे। उनके निधन पर मुक्केबाजी जगत और दुनिया भर के खेलप्रेमियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। मुहम्मद अली ने भी उन्हें महान प्रतिद्वंद्वी और सम्मानित खिलाड़ी के रूप में याद किया।
जो फ्रेज़ियर की विरासत इस बात में है कि उन्होंने कभी हार न मानने वाली शैली से मुक्केबाजी को नई पहचान दी। ओलंपिक स्वर्ण, विश्व हैवीवेट चैंपियनशिप और अली के साथ उनकी ऐतिहासिक त्रयी ने उन्हें खेल इतिहास में अमिट स्थान दिलाया। ‘स्मोकिन’ जो’ आज भी उस मुक्केबाज के प्रतीक हैं जो हर चुनौती का सामना पूरे दमखम से करता था।
