जयंती विशेष | 7 नवंबर | विश्व व्यक्तित्व | विज्ञान एवं चिकित्सा
हम किसी घटना को कैसे याद रखते हैं? नया अनुभव मस्तिष्क में किस रूप में दर्ज होता है? कोई स्मृति कुछ क्षणों में क्यों धुंधली पड़ जाती है, जबकि दूसरी जीवनभर हमारे साथ रहती है? आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान (Neuroscience) के इन बुनियादी प्रश्नों को कोशिका और अणु के स्तर पर समझने में एरिक रिचर्ड कैंडेल का योगदान ऐतिहासिक है। ऑस्ट्रिया में जन्मे अमेरिकी न्यूरोबायोलॉजिस्ट कैंडेल ने यह दिखाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि सीखने और याद रखने की प्रक्रिया में न्यूरॉन्स के बीच संपर्क यानी सिनेप्स (Synapse) की प्रभावशीलता बदलती है। उनके शोध ने स्मृति को केवल मनोवैज्ञानिक अनुभव के रूप में नहीं, बल्कि जैविक और आणविक प्रक्रिया के रूप में समझने का रास्ता खोला।
वियना में जन्म और बचपन के कठिन अनुभव
एरिक रिचर्ड कैंडेल का जन्म 7 नवंबर 1929 को ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में एक यहूदी परिवार में हुआ था। उनके पिता हरमन कैंडेल खिलौनों की दुकान चलाते थे और माता शार्लोट कैंडेल परिवार की देखभाल करती थीं। उस समय वियना यूरोप के प्रमुख सांस्कृतिक और बौद्धिक केंद्रों में था, लेकिन 1930 के दशक में नाजीवाद और यहूदी-विरोधी विचारधारा के बढ़ते प्रभाव ने शहर का सामाजिक वातावरण बदल दिया।
मार्च 1938 में जर्मनी द्वारा ऑस्ट्रिया के विलय (Anschluss) के बाद यहूदी समुदाय पर उत्पीड़न तेज हुआ। कैंडेल ने अपने बचपन में अपमान, बहिष्कार और असुरक्षा का अनुभव किया। नवंबर 1938 के क्रिस्टलनाख्ट के दौरान उनके परिवार को भी घर छोड़ना पड़ा और पिता को कुछ समय के लिए हिरासत में लिया गया। इन घटनाओं की स्मृतियां उनके मन में लंबे समय तक बनी रहीं। बाद में उन्होंने स्वयं लिखा कि वियना के उन अनुभवों ने मानव व्यवहार, मन और स्मृति के प्रति उनकी जिज्ञासा को प्रभावित किया।

1939 में कैंडेल अपने भाई के साथ अमेरिका पहुंचे। उनके माता-पिता भी उसी वर्ष बाद में अमेरिका आ गए। परिवार न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन में बस गया। एक नए देश में जीवन शुरू करना आसान नहीं था, लेकिन शिक्षा और अध्ययन के अवसरों ने उनके भविष्य की दिशा तय की।
इतिहास और साहित्य से चिकित्सा तथा मस्तिष्क-विज्ञान तक
कैंडेल ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में इतिहास और साहित्य का अध्ययन किया और 1952 में स्नातक हुए। शुरुआती रुचि यूरोपीय बौद्धिक इतिहास और मानव व्यवहार के सामाजिक-ऐतिहासिक पहलुओं में थी। इसी दौरान मनुष्य के विचार, प्रेरणा और व्यवहार को समझने की उनकी इच्छा ने उन्हें मनोविश्लेषण (Psychoanalysis) की ओर आकर्षित किया। उन्हें लगा कि मन और व्यवहार को समझने के लिए चिकित्सा तथा मनोचिकित्सा का अध्ययन उपयोगी होगा।
उन्होंने न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में प्रवेश लिया और 1956 में चिकित्सा की पढ़ाई पूरी की। मनोचिकित्सा के प्रशिक्षण के दौरान उनकी रुचि इस प्रश्न में बढ़ी कि मानसिक प्रक्रियाओं का जैविक आधार क्या है। क्या सीखना और याद रखना मस्तिष्क की कोशिकाओं में होने वाले ऐसे बदलावों से जुड़ा है जिन्हें प्रयोगशाला में देखा और मापा जा सके? इसी प्रश्न ने उन्हें मनोविश्लेषण से प्रयोगात्मक न्यूरोबायोलॉजी की ओर मोड़ दिया।
उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ (NIMH) में शोध किया और बाद में हार्वर्ड तथा न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से जुड़े। 1960 के दशक में फ्रांस के पेरिस में वैज्ञानिक लादिस्लाव टाउक की प्रयोगशाला में काम करते हुए उन्होंने समुद्री जीव एप्लाइसिया (Aplysia) पर अध्ययन शुरू किया। यही छोटा-सा समुद्री घोंघे जैसा जीव उनके स्मृति अनुसंधान का असाधारण मॉडल बना।

एप्लाइसिया: स्मृति का अध्ययन करने के लिए छोटा लेकिन उपयोगी मॉडल
कैंडेल ने स्मृति के अध्ययन के लिए एप्लाइसिया को चुना, जिसे सामान्यतः समुद्री खरगोश (Sea Hare) कहा जाता है। इसका तंत्रिका तंत्र स्तनधारियों की तुलना में सरल होता है और इसमें अपेक्षाकृत कम संख्या में तंत्रिका कोशिकाएं होती हैं। इसकी कई न्यूरॉन्स आकार में बड़े होते हैं और अलग-अलग पहचाने जा सकते हैं। वैज्ञानिक किसी विशिष्ट कोशिका की गतिविधि और उसके दूसरे न्यूरॉन से संपर्क को सीधे माप सकते हैं।
इस जीव में गलफड़ों को पीछे खींचने की एक सरल प्रतिवर्ती क्रिया (Gill-Withdrawal Reflex) होती है। किसी हल्के स्पर्श पर यह प्रतिक्रिया देता है। बार-बार एक जैसे हल्के स्पर्श से प्रतिक्रिया कम हो सकती है—इसे अभ्यस्तता या हैबिचुएशन (Habituation) कहते हैं। इसके विपरीत, किसी अप्रिय या तीव्र उत्तेजना के बाद वही स्पर्श अधिक तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकता है—इसे संवेदनशीलता में वृद्धि या सेंसिटाइजेशन (Sensitization) कहा जाता है। ये सीखने के सरल रूप हैं।
कैंडेल और उनके सहयोगियों ने पाया कि इन व्यवहारगत बदलावों के साथ संवेदी न्यूरॉन्स और मोटर न्यूरॉन्स के बीच सिनेप्टिक संचार की ताकत बदलती है। यानी स्मृति का निशान किसी बंद परिपथ में केवल विद्युत गतिविधि के घूमते रहने से नहीं, बल्कि न्यूरॉन्स के बीच मौजूदा संपर्कों की प्रभावशीलता में बदलाव से भी बनता है। इस निष्कर्ष ने सीखने और स्मृति की कोशिकीय व्याख्या को मजबूत आधार दिया।
अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्मृति का आणविक आधार
कैंडेल के शोध का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह था कि अल्पकालिक स्मृति (Short-term Memory) और दीर्घकालिक स्मृति (Long-term Memory) के निर्माण में जैविक प्रक्रियाओं का अंतर होता है। अल्पकालिक बदलाव में पहले से मौजूद प्रोटीनों की रासायनिक सक्रियता बदल सकती है। उदाहरण के लिए, न्यूरॉन के भीतर cAMP जैसे दूसरे संदेशवाहक (Second Messengers) और प्रोटीन किनेज-A (PKA) जैसे एंजाइम सिनेप्टिक संचार को कुछ समय के लिए अधिक प्रभावी बना सकते हैं।

दीर्घकालिक स्मृति के स्थायित्व के लिए अधिक गहरे बदलाव आवश्यक होते हैं। बार-बार अभ्यास या उचित अंतराल पर दोहराई गई उत्तेजना जीन अभिव्यक्ति (Gene Expression) और नए प्रोटीनों के निर्माण को सक्रिय कर सकती है। कैंडेल और उनके सहयोगियों के कार्य ने cAMP-PKA मार्ग तथा CREB नामक जीन-नियामक प्रोटीन की भूमिका को समझने में मदद की। ये प्रक्रियाएं सिनेप्स में लंबे समय तक चलने वाले बदलावों और कुछ स्थितियों में नए सिनेप्टिक संपर्कों के निर्माण से जुड़ी हैं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि हर स्मृति किसी एक अणु या एक मस्तिष्क-क्षेत्र में रखी होती है। स्मृति विभिन्न प्रकार की होती है और मस्तिष्क के अलग-अलग नेटवर्क उनमें भाग लेते हैं। कैंडेल के एप्लाइसिया संबंधी शोध ने विशेष रूप से सरल, अवचेतन या प्रक्रियात्मक स्मृति (Implicit/Procedural Memory) के बुनियादी तंत्र को स्पष्ट किया।
एप्लाइसिया से मानव मस्तिष्क तक: हिप्पोकैम्पस पर शोध
सरल जीव पर मिले निष्कर्षों के बाद कैंडेल ने स्तनधारी मस्तिष्क में अधिक जटिल स्मृति प्रक्रियाओं का अध्ययन किया। 1990 के दशक में उन्होंने चूहों के हिप्पोकैम्पस (Hippocampus) पर शोध को फिर से प्राथमिकता दी। हिप्पोकैम्पस मस्तिष्क का वह क्षेत्र है जो नई स्पष्ट या घोषणात्मक स्मृतियों (Explicit/Declarative Memories)—जैसे स्थान, व्यक्ति और घटनाओं की याद—के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इस क्षेत्र में दीर्घकालिक प्रबलन (Long-Term Potentiation या LTP) नामक प्रक्रिया का अध्ययन किया गया। LTP में कुछ तंत्रिका संपर्कों की संचार क्षमता लंबे समय तक बढ़ जाती है। इसे सीखने और स्मृति के संभावित कोशिकीय आधारों में से एक माना जाता है। आनुवंशिक रूप से परिवर्तित चूहों और आणविक तकनीकों की मदद से कैंडेल तथा अन्य शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि कौन-से जीन और संकेत-मार्ग सिनेप्टिक बदलावों तथा स्थानिक स्मृति में योगदान करते हैं।

एप्लाइसिया और चूहों पर हुए शोध ने यह समझने में सहायता की कि सरल और जटिल स्मृति के कुछ बुनियादी सिद्धांत साझा हो सकते हैं, हालांकि मानव स्मृति कहीं अधिक जटिल है। मनुष्य की याददाश्त में ध्यान, भावना, भाषा, अनुभव, सामाजिक संदर्भ और मस्तिष्क के अनेक नेटवर्क की भूमिका होती है।
वर्ष 2000 का चिकित्सा नोबेल पुरस्कार
वर्ष 2000 में एरिक कैंडेल को चिकित्सा या शरीर क्रिया विज्ञान का नोबेल पुरस्कार दिया गया। उन्होंने यह पुरस्कार स्वीडन के आर्विद कार्लसन और अमेरिका के पॉल ग्रीनगार्ड के साथ साझा किया। नोबेल समिति ने तीनों वैज्ञानिकों को तंत्रिका तंत्र में संकेतों के संचार से संबंधित खोजों के लिए सम्मानित किया। कैंडेल का हिस्सा विशेष रूप से तंत्रिका कोशिकाओं के भीतर संकेतों के रूपांतरण और स्मृति के कोशिकीय तथा आणविक आधार को समझने में उनके योगदान से जुड़ा था।
यहां एक तथ्यात्मक अंतर समझना जरूरी है: नोबेल पुरस्कार का आधिकारिक प्रशस्ति-वाक्य केवल ‘स्मृति भंडारण की खोज’ नहीं था। पुरस्कार का व्यापक विषय तंत्रिका तंत्र में संकेत-परिवहन (Signal Transduction) था। कैंडेल के एप्लाइसिया और अन्य मॉडल पर किए गए शोध ने यह स्पष्ट किया कि अनुभव के कारण न्यूरॉन्स के बीच संपर्कों की प्रभावशीलता कैसे बदलती है और दीर्घकालिक स्मृति के लिए जीन सक्रियता तथा प्रोटीन संश्लेषण किस तरह महत्वपूर्ण हैं।
8 दिसंबर 2000 को दिए गए अपने नोबेल व्याख्यान का शीर्षक था—The Molecular Biology of Memory Storage: A Dialogue Between Genes and Synapses। इस व्याख्यान में उन्होंने बताया कि स्मृति के स्थायित्व को समझने के लिए जीन और सिनेप्स के बीच होने वाले संवाद का अध्ययन कितना महत्वपूर्ण है।

शिक्षक, संस्थान निर्माता और विज्ञान लेखक
कैंडेल ने कोलंबिया विश्वविद्यालय में न्यूरोबायोलॉजी और व्यवहार के अध्ययन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1970 के दशक में वे वहां आए और Center for Neurobiology and Behavior के संस्थापक निदेशक बने। उन्होंने कई पीढ़ियों के शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों को प्रशिक्षित किया। उनका शोध केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहा; वे विज्ञान को स्पष्ट और व्यवस्थित ढंग से पढ़ाने के भी पक्षधर रहे।
वे थॉमस जेसल और जेम्स श्वार्ट्ज के साथ प्रसिद्ध पाठ्यपुस्तक Principles of Neural Science के सह-लेखक हैं। यह पुस्तक चिकित्सा, जीवविज्ञान और न्यूरोसाइंस के विद्यार्थियों के लिए लंबे समय से एक महत्वपूर्ण संदर्भ रही है। 2006 में उनकी पुस्तक In Search of Memory: The Emergence of a New Science of Mind प्रकाशित हुई। इसमें उन्होंने अपने जीवन, वियना के बचपन, अमेरिका आने, वैज्ञानिक यात्रा और स्मृति-विज्ञान के विकास को आत्मकथात्मक शैली में प्रस्तुत किया।
कैंडेल को नोबेल पुरस्कार के अतिरिक्त अनेक वैज्ञानिक सम्मान मिले। उन्हें अमेरिका का नेशनल मेडल ऑफ साइंस भी प्रदान किया गया। वे नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज के सदस्य रहे और चिकित्सा तथा विज्ञान के क्षेत्र में उनके योगदान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली।
स्मृति-विज्ञान और चिकित्सा के लिए शोध का महत्व
कैंडेल के कार्य ने यह समझने की नींव मजबूत की कि सीखना केवल व्यवहार में बदलाव नहीं है; यह तंत्रिका कोशिकाओं के बीच संचार में होने वाले मापनीय बदलावों से भी जुड़ा है। इस शोध ने स्मृति, सीखने, मस्तिष्क की अनुकूलन क्षमता (Neuroplasticity) और कुछ मानसिक प्रक्रियाओं के जैविक आधारों पर आगे के अनुसंधान को प्रेरित किया।

उनके शोध का प्रभाव न्यूरोलॉजी, मनोचिकित्सा, औषधि-विज्ञान और संज्ञानात्मक विज्ञान जैसे क्षेत्रों तक फैला है। हालांकि एप्लाइसिया पर किए गए निष्कर्षों को सीधे मनुष्यों पर लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन सरल तंत्रिका तंत्र में पहचाने गए कई मूलभूत संकेत-मार्गों ने स्तनधारी मस्तिष्क के अध्ययन के लिए उपयोगी प्रश्न और प्रयोगात्मक दृष्टिकोण उपलब्ध कराए। अल्जाइमर रोग, अन्य स्मृति-विकारों और सीखने से जुड़ी समस्याओं को समझने वाले शोधकर्ताओं के लिए भी स्मृति के कोशिकीय तंत्र का अध्ययन महत्वपूर्ण बना हुआ है।
एक वैज्ञानिक की विरासत
एरिक कैंडेल की जीवन-यात्रा वियना के एक यहूदी बालक से अमेरिका के अग्रणी न्यूरोवैज्ञानिक बनने तक की कहानी है। उनके बचपन के विस्थापन और उत्पीड़न के अनुभव, इतिहास और साहित्य में शुरुआती रुचि, मनोचिकित्सा का प्रशिक्षण और फिर प्रयोगात्मक जीवविज्ञान की ओर निर्णायक बदलाव—इन सबने उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण को आकार दिया।
7 नवंबर को उनकी जयंती पर कैंडेल को याद करना उस वैज्ञानिक प्रयास को सम्मान देना है जिसने स्मृति जैसे जटिल मानवीय अनुभव को कोशिका, सिनेप्स, जीन और प्रोटीन के स्तर पर समझने की दिशा में नई राह खोली। उनका शोध यह बताता है कि अनुभव केवल हमारे व्यवहार को नहीं बदलता; वह मस्तिष्क की कोशिकाओं के बीच संबंधों को भी रूपांतरित कर सकता है। यही विचार आधुनिक न्यूरोसाइंस की सबसे प्रभावशाली उपलब्धियों में से एक है।
