इतिहास | 6 नवंबर | महात्मा गांधी | शिक्षा और कानून
6 नवंबर 1888 को मोहनदास करमचंद गांधी को लंदन की प्रतिष्ठित कानूनी संस्था ‘द ऑनरेबल सोसाइटी ऑफ द इनर टेंपल’ में विधि-छात्र के रूप में औपचारिक प्रवेश मिला। यह उनके जीवन का वह पड़ाव था, जिसने उन्हें ब्रिटिश कानूनी परंपरा, बैरिस्टर बनने की प्रशिक्षण-व्यवस्था और आगे चलकर दक्षिण अफ्रीका तथा भारत में उनके सार्वजनिक जीवन के लिए जरूरी कानूनी आधार से जोड़ा। गांधी को 10 जून 1891 को बैरिस्टर के रूप में बुलाया गया; दोनों तिथियों के बीच लगभग ढाई वर्ष का अध्ययन और प्रशिक्षण था।
कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड जाने का निर्णय
मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने भावनगर के सामलदास कॉलेज में पढ़ाई शुरू की, लेकिन वहां का शैक्षणिक वातावरण और अंग्रेजी माध्यम उनके लिए सहज नहीं था। परिवार के सामने यह विचार था कि कानून की पढ़ाई करके वे बैरिस्टर बनें और परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर बनाने में योगदान दें। उस समय ब्रिटेन में कानूनी शिक्षा प्राप्त करना भारतीय युवाओं के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा और पेशेवर अवसरों से जुड़ा माना जाता था।
परिवार में विदेश यात्रा को लेकर धार्मिक और सामाजिक आशंकाएं भी थीं। गांधी की माता पुतलीबाई की चिंता विशेष रूप से खान-पान और आचरण को लेकर थी। गांधी ने उनसे मांस, मदिरा और अनैतिक आचरण से दूर रहने का वचन दिया। जैन साधु बेचारजी स्वामी की उपस्थिति में ली गई इस प्रतिज्ञा का उल्लेख गांधी ने अपनी आत्मकथा में किया है। यह संकल्प आगे लंदन में उनके भोजन और जीवनशैली के चुनावों में महत्वपूर्ण रहा।

4 सितंबर 1888 को गांधी मुंबई से इंग्लैंड के लिए रवाना हुए। वे उस समय 18 वर्ष के थे और उनकी पत्नी कस्तूरबा तथा शिशु पुत्र हरिलाल भारत में थे। 29 सितंबर को वे साउथैम्पटन पहुंचे और फिर लंदन गए। उस समय वे सार्वजनिक जीवन के ‘महात्मा’ नहीं, बल्कि कानून की पढ़ाई करने आए एक युवा भारतीय विद्यार्थी मोहनदास गांधी थे।
6 नवंबर 1888: इनर टेंपल में औपचारिक प्रवेश
लंदन में गांधी ने चार ऐतिहासिक ‘इन्स ऑफ कोर्ट’ में से एक, इनर टेंपल में प्रवेश लिया। इन संस्थाओं की परंपरा ब्रिटेन में बैरिस्टरों के प्रशिक्षण और पेशेवर पहचान से जुड़ी थी। इनर टेंपल के ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार गांधी को 6 नवंबर 1888 को सदस्य-छात्र के रूप में प्रवेश दिया गया। संस्था के प्रवेश रजिस्टर में उनका नाम दर्ज हुआ और उसी दिन उन्होंने निर्धारित शुल्क भी जमा किया। इनर टेंपल के अपने ऐतिहासिक लेख में यह तारीख और प्रवेश का विवरण उपलब्ध है।
इसलिए 6 नवंबर 1888 को गांधी के ‘बैरिस्ट्री की पढ़ाई में प्रवेश’ का दिन कहना उचित है। यह कहना कि उसी दिन वे बैरिस्टर बन गए थे, तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। प्रवेश के बाद उन्हें निर्धारित अध्ययन, परीक्षाओं और संस्था की परंपरागत औपचारिकताओं को पूरा करना था।
लंदन में विद्यार्थी जीवन: अनुशासन, भोजन और आत्मसंयम
लंदन पहुंचने के शुरुआती दिनों में गांधी को भोजन, पहनावे, भाषा और सामाजिक व्यवहार के स्तर पर कई नए अनुभव हुए। शाकाहारी भोजन की उपलब्धता उनके लिए चुनौती थी। शुरुआती दौर में वे घर से ले जाए गए खाद्य पदार्थों पर निर्भर रहे, लेकिन बाद में शाकाहारी भोजनालयों और शाकाहार से जुड़े लोगों के संपर्क में आए। वे लंदन वेजिटेरियन सोसाइटी से जुड़े और उसके कार्यकर्ताओं के साथ संवाद करने लगे। भोजन का चुनाव उनके लिए केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं था; यह माता से किए वचन, नैतिकता और आत्मानुशासन से भी जुड़ा था।

गांधी ने कुछ समय तक अंग्रेज ‘जेंटलमैन’ की तरह दिखने के लिए पहनावे, नृत्य, फ्रेंच भाषा और वक्तृत्व-कला के पाठ लेने की कोशिश की। लेकिन खर्च और अपने वास्तविक उद्देश्य को समझते हुए उन्होंने इस दिखावे को सीमित किया। उन्होंने सादगी, पैदल चलने और खर्च घटाने पर ध्यान दिया। बाद में अपनी आत्मकथा में उन्होंने लंदन के इन अनुभवों को आत्मनिरीक्षण और जीवनशैली में बदलाव के दौर के रूप में याद किया।
लंदन में उनका बौद्धिक संसार भी विस्तृत हुआ। उन्होंने कानून के साथ-साथ धर्म, नैतिकता और विभिन्न विचारधाराओं से परिचय बढ़ाया। शाकाहार से जुड़े साहित्य और चर्चाओं ने उन्हें ऐसे लोगों से मिलवाया जिनके साथ भोजन, करुणा और जीवन के नैतिक प्रश्नों पर विचार-विमर्श होता था। हालांकि उनके लंदन प्रवास को केवल आध्यात्मिक परिवर्तन के रूप में देखना ठीक नहीं होगा; इसका मूल उद्देश्य पेशेवर कानूनी योग्यता प्राप्त करना था।
बैरिस्टर बनने की प्रक्रिया और 10 जून 1891 का दिन
इनर टेंपल में प्रवेश के बाद बैरिस्टर बनने के लिए केवल किताबें पढ़ना और परीक्षा पास करना पर्याप्त नहीं था। उस समय ‘कीपिंग टर्म्स’ नामक परंपरा के तहत विद्यार्थियों को निर्धारित अवधि तक संस्था से जुड़े औपचारिक सत्रों और रात्रिभोजों में उपस्थित रहना होता था। गांधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि कुल बारह टर्म पूरे करने और परीक्षाएं पास करने की शर्त थी। इन औपचारिकताओं के बाद ही किसी विद्यार्थी को बैरिस्टर के रूप में ‘कॉल टू द बार’ दिया जाता था।
गांधी ने कानून की परीक्षाएं पूरी कीं और 10 जून 1891 को इनर टेंपल ने उन्हें बैरिस्टर के रूप में बुलाया। संस्था के प्रमाणपत्र में 6 नवंबर 1888 को प्रवेश और 10 जून 1891 को ‘कॉल टू द बार’—दोनों तारीखें स्पष्ट रूप से दर्ज हैं। अगले दिन वे लंदन के हाई कोर्ट में नामांकित हुए और 12 जून 1891 को भारत लौटने के लिए रवाना हो गए। भारत सरकार के राजघाट समाधि समिति के आधिकारिक जीवन-क्रम में भी 1891 में ब्रिटिश बार में बुलाए जाने और भारत लौटने की तारीखें दर्ज हैं।

भारत वापसी और वकालत की शुरुआती चुनौतियां
भारत लौटने के बाद गांधी ने बंबई में वकालत शुरू करने की कोशिश की। लेकिन अदालत में बहस करने का आत्मविश्वास और व्यावहारिक अनुभव उनके पास सीमित था। एक मुकदमे में जिरह करने के लिए खड़े होने पर वे घबरा गए और अपनी बात प्रभावी ढंग से नहीं रख पाए। बंबई में वकालत जमाने में कठिनाई आने के बाद वे राजकोट लौटे और वहां कानूनी काम करने लगे। इस शुरुआती संघर्ष से यह स्पष्ट होता है कि बैरिस्टर की उपाधि मिल जाना सफल वकील बनने की गारंटी नहीं थी।
1893 में एक कारोबारी फर्म के कानूनी काम के सिलसिले में गांधी दक्षिण अफ्रीका गए। वहां भारतीयों के साथ नस्लीय भेदभाव और नागरिक अधिकारों के प्रश्नों से उनका सामना हुआ। पीटरमैरिट्जबर्ग रेलवे स्टेशन की घटना सहित कई अनुभवों ने उनके सार्वजनिक जीवन की दिशा बदल दी। कानून का प्रशिक्षण, दस्तावेजों को समझने की क्षमता और औपनिवेशिक न्याय व्यवस्था का अनुभव आगे चलकर उनके राजनीतिक संघर्षों में उपयोगी साबित हुआ।
इनर टेंपल और गांधी की कानूनी विरासत
गांधी का इनर टेंपल में प्रवेश उनके जीवन का महत्वपूर्ण शैक्षणिक और पेशेवर पड़ाव था, लेकिन उनकी पहचान केवल बैरिस्टर तक सीमित नहीं रही। दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के अधिकारों के लिए काम करते हुए उन्होंने सत्याग्रह की पद्धति विकसित की। भारत लौटने के बाद चंपारण, खेड़ा, अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन, असहयोग, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे संघर्षों में उन्होंने कानून, नैतिकता और जनसंगठन के प्रश्नों को नए ढंग से जोड़ा।
उनकी कानूनी शिक्षा ने उन्हें औपनिवेशिक शासन की संस्थाओं और प्रक्रियाओं को समझने का आधार दिया, लेकिन उनके सार्वजनिक जीवन की दिशा केवल पेशेवर सफलता से तय नहीं हुई। उन्होंने वकालत को आजीविका के रूप में अपनाने की कोशिश की, पर धीरे-धीरे न्याय, नागरिक अधिकार, अहिंसा और सत्याग्रह उनके जीवन के केंद्रीय विषय बन गए।

6 नवंबर 1888 का ऐतिहासिक महत्व
6 नवंबर 1888 को इनर टेंपल में गांधी का प्रवेश एक युवा भारतीय के विदेश में पेशेवर शिक्षा पाने की घटना भर नहीं था। यह उस यात्रा की शुरुआत थी जिसमें उन्होंने कानून की औपचारिक पढ़ाई पूरी की, ब्रिटिश बार में प्रवेश पाया और फिर अपने अनुभवों को दक्षिण अफ्रीका तथा भारत के सार्वजनिक जीवन में लगाया। 10 जून 1891 को बैरिस्टर के रूप में बुलाए जाने और 12 जून को भारत लौटने के बीच का अंतर समझना इस इतिहास को सही संदर्भ में देखने के लिए जरूरी है।
इस दिन को याद करना गांधी के जीवन के उस कम चर्चित, लेकिन निर्णायक अध्याय को समझना है, जब मोहनदास करमचंद गांधी कानून के विद्यार्थी के रूप में लंदन पहुंचे थे—और आगे चलकर वही व्यक्ति भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हुआ।
