इतिहास | 6 नवंबर | महात्मा गांधी | दक्षिण अफ्रीका का सत्याग्रह
दक्षिण अफ्रीका में भारतीय गिरमिटिया मजदूरों पर लगाए गए तीन पाउंड के वार्षिक कर, भेदभावपूर्ण कानूनों और नागरिक अधिकारों के सवाल पर गांधी के नेतृत्व में हजारों स्त्री-पुरुषों और बच्चों ने अहिंसक प्रतिरोध का रास्ता चुना। 6 नवंबर 1913 को चार्ल्सटाउन से शुरू हुआ यह ऐतिहासिक मार्च आगे चलकर ‘ग्रेट मार्च’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
6 नवंबर 1913 दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के अधिकारों के संघर्ष और महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन की एक महत्वपूर्ण तारीख है। इसी दिन गांधी ने भारतीय खदान मजदूरों, उनके परिवारों और अन्य सत्याग्रहियों के बड़े जत्थे का नेतृत्व करते हुए चार्ल्सटाउन से ट्रांसवाल की ओर ऐतिहासिक ‘ग्रेट मार्च’ शुरू किया। इस मार्च में 2,037 पुरुष, 127 महिलाएं और 57 बच्चे शामिल थे। गांधी को उसी शाम पामफोर्ड रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन उनकी गिरफ्तारी से आंदोलन रुका नहीं।
इस घटना की पृष्ठभूमि केवल तीन पाउंड के कर तक सीमित नहीं थी। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों को आव्रजन, विवाह की मान्यता, आवाजाही और श्रम संबंधी कई भेदभावपूर्ण नियमों का सामना करना पड़ रहा था। गांधी के नेतृत्व में चल रहा सत्याग्रह इन कानूनों के विरुद्ध नागरिक प्रतिरोध का व्यापक अभियान बन चुका था।

दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की स्थिति और भेदभावपूर्ण कानून
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से भारतीय मजदूरों को गन्ने के खेतों, खदानों और अन्य श्रम क्षेत्रों में काम करने के लिए दक्षिण अफ्रीका ले जाया गया था। इनमें बड़ी संख्या उन लोगों की थी जिन्हें अनुबंधित या गिरमिटिया मजदूर (indentured labourers) के रूप में भर्ती किया गया था। अनुबंध की अवधि पूरी होने के बाद भी कई भारतीयों के सामने कठिन विकल्प थे—भारत लौटना, नया अनुबंध करना या वहीं रहकर अतिरिक्त आर्थिक बोझ और प्रतिबंधों का सामना करना।
नटाल में अनुबंध पूरा कर चुके भारतीयों पर तीन पाउंड का वार्षिक कर लगाया गया था। उस समय यह रकम गरीब मजदूर परिवारों के लिए भारी बोझ थी। कर का उद्देश्य और प्रभाव भारतीयों को फिर से अनुबंधित श्रम में लौटने या उपनिवेश छोड़ने के लिए दबाव में रखना था। गांधी और भारतीय समुदाय के नेताओं ने इसे अन्यायपूर्ण और अपमानजनक माना।
इसके साथ ही ट्रांसवाल में भारतीयों की आवाजाही और निवास पर प्रतिबंध, पंजीकरण और पास संबंधी नियम तथा विवाह की वैधता का प्रश्न भी गंभीर था। 1913 में दक्षिण अफ्रीका की अदालत के एक फैसले ने ईसाई रीति से न हुए अनेक भारतीय विवाहों की कानूनी मान्यता पर संकट खड़ा कर दिया। इससे भारतीय महिलाओं और बच्चों की सामाजिक तथा कानूनी स्थिति प्रभावित होने की आशंका पैदा हुई। इस मुद्दे ने आंदोलन को मजदूरों के कर-विरोध से आगे बढ़ाकर परिवार और नागरिक सम्मान के सवाल से जोड़ दिया।
गांधी का सत्याग्रह और मजदूरों की हड़ताल
महात्मा गांधी 1893 में वकालत के काम से दक्षिण अफ्रीका पहुंचे थे। वहां नस्लीय भेदभाव के अनुभवों ने उन्हें भारतीय समुदाय के अधिकारों के लिए संगठित संघर्ष की ओर प्रेरित किया। उन्होंने 1894 में नटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना में भूमिका निभाई और 1903 में ‘इंडियन ओपिनियन’ समाचारपत्र शुरू किया। 1906 से ट्रांसवाल के पंजीकरण कानूनों के विरुद्ध सत्याग्रह ने उनके अहिंसक प्रतिरोध के प्रयोग को व्यापक रूप दिया।

1913 में तीन पाउंड कर और अन्य भेदभावपूर्ण नियमों के विरुद्ध आंदोलन फिर तेज हुआ। गांधी ने न्यूकैसल के भारतीय मजदूरों से संपर्क किया और उन्हें कर हटाए जाने तक काम बंद करने का आह्वान किया। अक्टूबर 1913 में कोयला खदानों के हजारों मजदूर हड़ताल पर चले गए। खदानों से बाहर आए श्रमिकों और उनके परिवारों की संख्या बढ़ती गई। गांधी के सामने एक व्यावहारिक चुनौती थी—हड़ताली परिवारों के लिए भोजन और आश्रय की व्यवस्था कैसे हो तथा आंदोलन को शांतिपूर्ण और अनुशासित कैसे रखा जाए।
गांधी ने मजदूरों को ट्रांसवाल की सीमा पार कर सामूहिक रूप से गिरफ्तारी देने का रास्ता सुझाया। सत्याग्रहियों के लिए नियम बनाए गए कि वे किसी की संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे, उकसावे में हिंसा नहीं करेंगे और अपमान या गिरफ्तारी का सामना धैर्य से करेंगे। यह मार्च केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने की यात्रा नहीं था; इसका उद्देश्य भेदभावपूर्ण कानूनों को खुली चुनौती देना और सरकार को भारतीयों की शिकायतों पर बातचीत के लिए बाध्य करना था।
6 नवंबर 1913: चार्ल्सटाउन से ‘ग्रेट मार्च’ की शुरुआत
न्यूकैसल आंदोलन की तैयारी और मजदूरों की लामबंदी का प्रमुख केंद्र था। लेकिन 6 नवंबर को जिस बड़े ‘ग्रेट मार्च’ की शुरुआत दर्ज की जाती है, वह न्यूकैसल से नहीं, बल्कि सीमा के निकट स्थित चार्ल्सटाउन से हुआ था। गांधी और सत्याग्रही पहले न्यूकैसल से चार्ल्सटाउन पहुंचे थे। 6 नवंबर की सुबह लगभग 6:30 बजे प्रार्थना के बाद मार्च शुरू हुआ।
गांधी संग्रहालय, मणि भवन की कालक्रम-सूची और दक्षिण अफ्रीका के इतिहास पर काम करने वाली संस्था South African History Online के अनुसार, मार्च में 2,037 पुरुष, 127 महिलाएं और 57 बच्चे शामिल थे। यह संख्या उस संघर्ष में महिलाओं और बच्चों की भागीदारी को भी रेखांकित करती है। सत्याग्रहियों ने ट्रांसवाल में प्रवेश कर उन कानूनों को चुनौती दी जो भारतीयों की आवाजाही और बसने के अधिकार को सीमित करते थे।

सीमा पर पुलिस और आव्रजन अधिकारियों ने गांधी तथा उनके सहयोगियों से पूछताछ की। मार्च करने वालों ने पुलिस घेरा पार कर ट्रांसवाल में प्रवेश किया। गांधी ने पहले भी जनरल जान स्मट्स से तीन पाउंड कर समाप्त करने का आग्रह किया था। उन्होंने मार्च रोकने की पेशकश भी की थी, यदि सरकार कर हटाने का आश्वासन देती। लेकिन समझौता नहीं हो सका और सत्याग्रहियों ने आगे बढ़ने का निर्णय लिया।
पामफोर्ड में गिरफ्तारी और आंदोलन का जारी रहना
6 नवंबर 1913 की शाम लगभग 8:30 बजे गांधी को पामफोर्ड रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार किया गया। यह गिरफ्तारी आंदोलन को रोकने के प्रयास का हिस्सा थी, लेकिन मार्च में शामिल लोगों ने यात्रा जारी रखी। अगले दिन गांधी को वोल्क्सरस्ट की अदालत में पेश किया गया और जमानत पर रिहा कर दिया गया। इसके बाद वे फिर मार्च करने वालों के साथ जा मिले।
गांधी को अगले दिनों में फिर गिरफ्तार किया गया। 8 नवंबर को स्टैंडर्टन में और 9 नवंबर को टीकवर्थ के निकट उनकी गिरफ्तारी हुई। अलग-अलग स्थानों पर गिरफ्तारियों, मुकदमों और प्रशासनिक दबाव के बावजूद सत्याग्रहियों का जत्था आगे बढ़ता रहा। आंदोलन के अन्य नेता—जिनमें थांबी नायडू, हेनरी पोलक और हरमन कैलनबाख जैसे सहयोगियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी—ने अभियान को जारी रखने में मदद की।
मार्च के दौरान सरकार ने बड़ी संख्या में मजदूरों को गिरफ्तार किया और कई लोगों को वापस नटाल भेजा। पुलिस कार्रवाई, जेलों की स्थिति और मजदूरों के परिवारों की कठिनाइयों ने आंदोलन को और गंभीर बना दिया। फिर भी सत्याग्रहियों ने हिंसा का सहारा न लेने की नीति पर जोर दिया। इस अनुशासन ने दक्षिण अफ्रीका के बाहर भी आंदोलन की ओर ध्यान आकर्षित किया।

ग्रेट मार्च का परिणाम: भारतीय राहत अधिनियम, 1914
1913 के सत्याग्रह और मजदूर आंदोलन ने दक्षिण अफ्रीका की सरकार पर दबाव बनाया। भारत में भी इस संघर्ष पर व्यापक ध्यान गया। भारत के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने नवंबर 1913 में दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के साथ व्यवहार की आलोचना की। ब्रिटिश सरकार ने भी दक्षिण अफ्रीकी प्रशासन से मामले को गंभीरता से देखने को कहा। अंततः भारतीय शिकायतों की जांच और समाधान के लिए बातचीत का रास्ता खुला।
जनरल जान स्मट्स और गांधी के बीच बातचीत के बाद 1914 में समझौता हुआ। भारतीय राहत अधिनियम (Indian Relief Act) के माध्यम से तीन पाउंड कर समाप्त किया गया और भारतीय रीति से संपन्न कुछ विवाहों को मान्यता देने की दिशा में कदम उठाए गए। अनुबंधित भारतीय श्रम व्यवस्था को समाप्त करने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ी। हालांकि इस समझौते ने दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय भेदभाव और भारतीयों की सभी नागरिक समस्याओं का अंत नहीं किया, फिर भी यह सत्याग्रह अभियान की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।
गांधी के दक्षिण अफ्रीकी प्रयोग का ऐतिहासिक महत्व
दक्षिण अफ्रीका का सत्याग्रह गांधी के राजनीतिक और नैतिक विचारों के विकास का महत्वपूर्ण अध्याय था। यहां उन्होंने अहिंसक प्रतिरोध, सामूहिक अनुशासन, स्वैच्छिक कष्ट-सहन और अन्यायपूर्ण कानूनों की सार्वजनिक अवज्ञा को संगठित आंदोलन के रूप में विकसित किया। भारत लौटने के बाद चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद जैसे आंदोलनों में इन अनुभवों का प्रभाव दिखाई दिया।
ग्रेट मार्च की विशेषता यह भी थी कि इसमें मजदूरों के साथ महिलाएं और बच्चे शामिल थे। यह संघर्ष केवल नेतृत्व-केंद्रित आंदोलन नहीं था; हजारों साधारण लोगों ने अपनी आजीविका और सुरक्षा का जोखिम उठाकर अन्यायपूर्ण व्यवस्था को चुनौती दी। न्यूकैसल के मजदूरों की हड़ताल, चार्ल्सटाउन से शुरू हुआ मार्च और पामफोर्ड में गांधी की गिरफ्तारी—ये सभी घटनाएं एक व्यापक सामुदायिक प्रतिरोध की कड़ियां थीं।

6 नवंबर 1913 का ग्रेट मार्च इस बात का उदाहरण है कि संगठित अहिंसक प्रतिरोध स्थानीय श्रमिक समस्या को व्यापक नागरिक अधिकारों के प्रश्न में बदल सकता है। तीन पाउंड कर के खिलाफ उठी आवाज ने श्रम, सम्मान, परिवार, आव्रजन और समानता के मुद्दों को एक साथ सामने रखा। दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के संघर्ष और गांधी के सत्याग्रह इतिहास में यह मार्च एक महत्वपूर्ण पड़ाव बना रहा।
