6 नवंबर 2010 को कोलकाता में सिद्धार्थ शंकर राय का निधन हुआ। वे 90 वर्ष के थे। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री, केंद्र में शिक्षा मंत्री, पंजाब के राज्यपाल, अमेरिका में भारत के राजदूत और कलकत्ता हाईकोर्ट के वरिष्ठ बैरिस्टर के रूप में उनका सार्वजनिक जीवन कई दशकों तक फैला रहा। उनका राजनीतिक सफर उपलब्धियों के साथ-साथ विवादों और कठिन ऐतिहासिक दौरों से भी जुड़ा रहा—विशेषकर 1970 के दशक में पश्चिम बंगाल की राजनीति, नक्सल आंदोलन और आपातकाल के समय से।
चटगांव नहीं, कलकत्ता के प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार में जन्म
सिद्धार्थ शंकर राय का जन्म 20 अक्टूबर 1920 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ था। उनके पिता सुधीर कुमार राय कलकत्ता हाईकोर्ट के जाने-माने बैरिस्टर और कांग्रेस से जुड़े व्यक्ति थे। उनकी मां अपर्णा देवी, स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेता देशबंधु चित्तरंजन दास और बसंती देवी की पुत्री थीं। इस तरह सिद्धार्थ शंकर राय का संबंध बंगाल के राष्ट्रवादी और सार्वजनिक जीवन की एक प्रभावशाली विरासत से था।
उन्होंने मित्रा इंस्टीट्यूशन, प्रेसीडेंसी कॉलेज और कलकत्ता विश्वविद्यालय के यूनिवर्सिटी लॉ कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की। विद्यार्थी जीवन में वे पढ़ाई के साथ वाद-विवाद, छात्र गतिविधियों और खेलों में सक्रिय रहे। क्रिकेट और फुटबॉल में उनकी विशेष रुचि थी। 1947 में लंदन के इनर टेंपल से उन्हें बार में बुलाया गया और वे बैरिस्टर बने। इसके बाद उन्होंने कलकत्ता हाईकोर्ट में वकालत शुरू की।
वकालत से राजनीति में प्रवेश
कानूनी पेशे में पहचान बनाने के बाद राय ने सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाई। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और 1957 में पश्चिम बंगाल विधानसभा पहुंचे। राज्य की राजनीति में शुरुआती दौर में उन्होंने कानून तथा जनजातीय कल्याण जैसे विभागों की जिम्मेदारी संभाली। 1957 से 1971 तक वे विधानसभा के सदस्य रहे और संगठन तथा प्रशासनिक कामकाज का अनुभव हासिल किया।

1960 के दशक में बंगाल की राजनीति में कांग्रेस के सामने वामपंथी दलों और क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियों की चुनौती बढ़ रही थी। राय ने विधानसभा में विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों भूमिकाओं का अनुभव किया। 1969 से 1971 के बीच वे पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे। इस समय राज्य में राजनीतिक अस्थिरता, श्रमिक आंदोलनों और उग्र वामपंथी गतिविधियों ने शासन व्यवस्था को जटिल बना दिया था।
केंद्र सरकार में शिक्षा मंत्री
1971 में राय रायगंज लोकसभा क्षेत्र से पांचवीं लोकसभा के लिए चुने गए। इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में उन्हें शिक्षा और समाज कल्याण मंत्री की जिम्मेदारी मिली। उन्होंने 1971 से 1972 तक केंद्रीय मंत्रिमंडल में काम किया। यह कार्यकाल बहुत लंबा नहीं था, क्योंकि जल्द ही वे पश्चिम बंगाल की राज्य राजनीति में लौटे।
केंद्र में उनका अनुभव और कांग्रेस नेतृत्व से निकटता उन्हें राज्य में महत्वपूर्ण भूमिका के लिए उपयुक्त बनाती थी। 1972 के विधानसभा चुनाव के बाद वे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने।
1972 से 1977: पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री
सिद्धार्थ शंकर राय ने 20 मार्च 1972 को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री का पद संभाला और अप्रैल 1977 तक इस पद पर रहे। उनका कार्यकाल राज्य के सबसे उथल-पुथल भरे राजनीतिक दौरों में से एक था। 1960 के दशक के उत्तरार्ध और 1970 के शुरुआती वर्षों में नक्सलबाड़ी से शुरू हुए नक्सल आंदोलन का प्रभाव राज्य के कई हिस्सों, विशेषकर कोलकाता और आसपास के क्षेत्रों में दिखाई दे रहा था। राजनीतिक हिंसा, पुलिस कार्रवाई, भूमिगत संगठनों की गतिविधियां और कानून-व्यवस्था की चुनौती सरकार के सामने थीं।

राय सरकार ने नक्सलवादी हिंसा और सशस्त्र गतिविधियों के खिलाफ कड़ा सुरक्षा अभियान चलाया। उस दौर की सरकारी कार्रवाई को समर्थकों ने कानून-व्यवस्था बहाल करने की कोशिश बताया, जबकि आलोचकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने हिरासत, पुलिस मुठभेड़ों, कथित गैर-न्यायिक हत्याओं तथा नागरिक स्वतंत्रताओं पर दबाव को लेकर गंभीर सवाल उठाए। इसलिए उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल का मूल्यांकन केवल प्रशासनिक दावों से नहीं, बल्कि उस दौर में राज्य की राजनीतिक हिंसा और मानवाधिकार संबंधी बहसों को ध्यान में रखकर किया जाता है।
इसी अवधि में 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के बाद आए शरणार्थियों के पुनर्वास का प्रश्न भी महत्वपूर्ण था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2010 में शोक संदेश में उल्लेख किया था कि मुख्यमंत्री के रूप में राय ने बांग्लादेश से आए शरणार्थियों के पुनर्वास में भूमिका निभाई। राज्य की अर्थव्यवस्था, रोजगार, औद्योगिक संबंध और राजनीतिक स्थिरता भी उनकी सरकार के सामने बड़ी चुनौतियां थीं।
आपातकाल और राजनीतिक विरासत का विवादित अध्याय
25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू हुआ। पश्चिम बंगाल में राय की सरकार उस समय सत्ता में थी और उन्होंने केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार के साथ निकटता से काम किया। आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं पर अंकुश, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी, प्रेस पर नियंत्रण और राजनीतिक विरोध के दमन को लेकर देशभर में बहस हुई। पश्चिम बंगाल में भी उस समय की प्रशासनिक कार्रवाइयों और राजनीतिक माहौल पर आलोचना हुई।
राय के समर्थक उन्हें कठिन परिस्थितियों में प्रशासन चलाने वाला नेता मानते रहे, जबकि आलोचक उनके कार्यकाल को राज्य में कठोर पुलिस कार्रवाई और लोकतांत्रिक अधिकारों पर दबाव से जोड़ते हैं। 1977 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की सरकार बनी और ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने। यह बदलाव राज्य की राजनीति में लंबे वामपंथी शासन की शुरुआत था।

पंजाब के राज्यपाल: उग्रवाद के कठिन दौर में जिम्मेदारी
राज्य की सत्ता से बाहर होने के बाद राय कुछ समय तक सक्रिय राजनीति में रहे। 2 अप्रैल 1986 को उन्हें पंजाब का राज्यपाल नियुक्त किया गया। उन्होंने 8 दिसंबर 1989 तक यह पद संभाला। उनका कार्यकाल पंजाब में उग्रवाद, अलगाववादी हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता के दौर से जुड़ा था। उस समय राज्य में निर्वाचित सरकार, केंद्र और सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय तथा शांति बहाली बड़ी चुनौती थी।
पंजाब राजभवन की पूर्व राज्यपालों की आधिकारिक सूची में उनके कार्यकाल की तारीखें 2 अप्रैल 1986 से 8 दिसंबर 1989 दर्ज हैं। इस पद पर उनकी भूमिका संवैधानिक प्रमुख के रूप में थी; राज्य की परिस्थितियों ने राज्यपाल के दायित्व को विशेष रूप से संवेदनशील बना दिया था।
अमेरिका में भारत के राजदूत
1989 में पंजाब के राज्यपाल पद से हटने के बाद राय ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक जीवन में एक और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। 1992 से 1996 तक वे अमेरिका में भारत के राजदूत रहे। यह वह दौर था जब शीत युद्ध के बाद वैश्विक राजनीति बदल रही थी और भारत आर्थिक सुधारों तथा विदेश नीति के नए समीकरणों की दिशा में आगे बढ़ रहा था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने शोक संदेश में भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत करने में राय के योगदान का उल्लेख किया था।
उनका राजनयिक अनुभव इस बात का उदाहरण था कि उनका सार्वजनिक जीवन केवल राज्य की राजनीति तक सीमित नहीं रहा। वकील और प्रशासक के रूप में विकसित उनकी संवाद क्षमता ने उन्हें कूटनीतिक भूमिका निभाने में मदद की।

चित्तरंजन दास की विरासत और निजी जीवन
सिद्धार्थ शंकर राय का संबंध देशबंधु चित्तरंजन दास के परिवार से था। यह पारिवारिक पृष्ठभूमि बंगाल के राष्ट्रीय आंदोलन और सार्वजनिक जीवन से जुड़ी थी। उनकी पत्नी माया राय भी बैरिस्टर थीं। राय का जीवन खेलों से भी जुड़ा रहा; वे कलकत्ता के क्लबों और पश्चिम बंगाल स्पोर्ट्स काउंसिल से जुड़े थे।
उनके व्यक्तित्व में कानून, राजनीति, प्रशासन और कूटनीति के अनुभव एक साथ दिखाई देते हैं। वे कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते थे और विभिन्न प्रधानमंत्रियों तथा राजनीतिक परिस्थितियों के दौरान सार्वजनिक भूमिका निभाते रहे।
6 नवंबर 2010: कोलकाता में निधन
सिद्धार्थ शंकर राय का निधन 6 नवंबर 2010 को कोलकाता स्थित उनके निवास पर हुआ। उस समय वे 90 वर्ष के थे और लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। समकालीन समाचार रिपोर्टों के अनुसार वे किडनी संबंधी बीमारी से पीड़ित थे और डायलिसिस करा रहे थे। लोकसभा में 9 नवंबर 2010 को दिए गए शोक-संदर्भ में सदन ने उनके निधन की तारीख, स्थान और आयु की औपचारिक पुष्टि की।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें राष्ट्रनिर्माण में योगदान देने वाला वरिष्ठ सार्वजनिक व्यक्ति, आधुनिक विचारों वाला नेता और सम्मानित कांग्रेस सहयोगी बताया। उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने उन्हें विधि क्षेत्र का विशिष्ट व्यक्तित्व, सार्वजनिक जीवन की महत्वपूर्ण हस्ती और राजनयिक के रूप में याद किया।

एक बहुआयामी, लेकिन बहसों से घिरा राजनीतिक जीवन
सिद्धार्थ शंकर राय का मूल्यांकन भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास के एक जटिल दौर के संदर्भ में किया जाना चाहिए। वे कुशल बैरिस्टर, केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल और राजदूत रहे। शरणार्थी पुनर्वास, प्रशासनिक चुनौतियों और भारत-अमेरिका संबंधों में उनकी भूमिका को आधिकारिक स्तर पर स्वीकार किया गया। दूसरी ओर, नक्सल आंदोलन और आपातकाल के दौरान पश्चिम बंगाल में राज्य शक्ति के इस्तेमाल को लेकर उनकी राजनीतिक विरासत विवादों से मुक्त नहीं है।
6 नवंबर को उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल पदों और उपलब्धियों की सूची दोहराना नहीं, बल्कि उस दौर के इतिहास को भी समझना है जिसमें लोकतंत्र, कानून-व्यवस्था, नागरिक अधिकार और राजनीतिक सत्ता के बीच कठिन टकराव सामने आए। सिद्धार्थ शंकर राय का सार्वजनिक जीवन इसी जटिल इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
