भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में देशबंधु चित्तरंजन दास का नाम उन नेताओं में लिया जाता है, जिन्होंने अपनी प्रतिभा, वैचारिक दृढ़ता, कानूनी कौशल और निजी त्याग से राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा दी। वे प्रख्यात बैरिस्टर, राष्ट्रवादी नेता, स्वराज पार्टी के संस्थापक नेताओं में से एक, समाज-सुधार के समर्थक और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के राजनीतिक मार्गदर्शक थे। जनता ने उनके राष्ट्रसमर्पण और निःस्वार्थ सेवा के सम्मान में उन्हें ‘देशबंधु’ यानी देश का मित्र कहा। उनका जन्म 5 नवंबर 1870 को कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में हुआ था।
शिक्षा और शुरुआती जीवन
चित्तरंजन दास का जन्म भुवन मोहन दास और निस्तारिणी देवी के परिवार में हुआ। उनके पिता कलकत्ता हाई कोर्ट के प्रतिष्ठित सॉलिसिटर थे और सामाजिक-सांस्कृतिक तथा पत्रकारिता संबंधी गतिविधियों में भी रुचि रखते थे। परिवार के बौद्धिक वातावरण और पिता के सार्वजनिक जीवन ने चित्तरंजन के विचारों को प्रभावित किया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा भवानीपुर स्थित लंदन मिशनरी सोसाइटी के संस्थान में हुई। इसके बाद उन्होंने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में अध्ययन किया और 1890 में स्नातक की पढ़ाई पूरी की।
उच्च शिक्षा के लिए वे इंग्लैंड गए। शुरुआत में उनका लक्ष्य भारतीय सिविल सेवा में प्रवेश पाना था, लेकिन बाद में उन्होंने कानून की पढ़ाई का रास्ता चुना। उन्होंने इनर टेंपल में विधि का अध्ययन किया और 1894 में बैरिस्टर के रूप में भारत लौटकर कलकत्ता हाई कोर्ट में वकालत शुरू की। अपनी मेहनत, कानूनी समझ और प्रभावशाली दलीलों के बल पर उन्होंने शीघ्र ही एक सफल और प्रतिष्ठित वकील के रूप में पहचान बना ली।
अलीपुर बम मुकदमे से राष्ट्रीय पहचान
चित्तरंजन दास के कानूनी जीवन का एक निर्णायक पड़ाव 1908 का अलीपुर बम मुकदमा बना। इस मामले में उन्होंने अरविन्द घोष (बाद में श्री अरविन्द) की ओर से बचाव पक्ष के वकील के रूप में पैरवी की। मुकदमे के दौरान दास ने जिस तैयारी, तर्कशक्ति और कानूनी दक्षता का परिचय दिया, उससे उनकी प्रतिष्ठा व्यापक हुई। अरविन्द घोष इस मुकदमे में बरी हुए। इस मुकदमे ने दास को केवल एक सफल बैरिस्टर के रूप में ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना से जुड़े सार्वजनिक व्यक्तित्व के रूप में भी स्थापित किया। उन्होंने ढाका षड्यंत्र मामले में भी बचाव पक्ष की पैरवी की।

राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भूमिका
चित्तरंजन दास भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और 1917 में भवानीपुर में आयोजित बंगाल प्रांतीय सम्मेलन की अध्यक्षता के बाद राष्ट्रीय राजनीति में अधिक सक्रिय हुए। 1918 में उन्होंने मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों की आलोचना की। रॉलेट एक्ट के विरोध और सत्याग्रह के दौर में भी उन्होंने सार्वजनिक सभाओं तथा राजनीतिक गतिविधियों के माध्यम से औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध आवाज उठाई। वे मानते थे कि स्वराज केवल सत्ता-परिवर्तन का नाम नहीं, बल्कि जनता की भागीदारी और जनकल्याण से जुड़ी व्यवस्था होनी चाहिए।
महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के आह्वान पर दास ने अपनी अत्यंत लाभदायक वकालत छोड़ दी। उन्होंने विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार और स्वदेशी के समर्थन में अपना जीवन सार्वजनिक आंदोलन को समर्पित किया। उनका त्याग केवल प्रतीकात्मक नहीं था। उन्होंने अपनी निजी सुविधाओं और संपत्ति का बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय तथा जनहित के कार्यों के लिए समर्पित किया। उनकी पत्नी बसंती देवी और परिवार के अन्य सदस्य भी आंदोलन में सक्रिय रहे; बसंती देवी स्वयं बंगाल में स्वतंत्रता आंदोलन की प्रमुख महिला कार्यकर्ताओं में शामिल हुईं।
गया कांग्रेस अधिवेशन और स्वराज पार्टी का गठन
1922 में गया में हुए कांग्रेस अधिवेशन में दास ने विधान परिषदों में प्रवेश कर उनके भीतर से औपनिवेशिक शासन का विरोध करने की रणनीति का समर्थन किया। उस समय कांग्रेस के भीतर इस प्रश्न पर मतभेद था। एक पक्ष परिषदों के बहिष्कार को जारी रखना चाहता था, जबकि दास और उनके सहयोगियों का विचार था कि निर्वाचित संस्थाओं में पहुंचकर सरकारी नीतियों का विरोध और जवाबदेही की मांग की जा सकती है। उनका प्रस्ताव अधिवेशन में बहुमत हासिल नहीं कर सका।
इसके बाद दास ने मोतीलाल नेहरू और अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर कांग्रेस-खिलाफत स्वराज पार्टी की स्थापना की, जिसे 1923 में स्वराज पार्टी के नाम से जाना गया। पार्टी का उद्देश्य विधान परिषदों में प्रवेश कर औपनिवेशिक सरकार की नीतियों का संगठित विरोध करना था। 1923 के चुनावों में स्वराजवादियों को उल्लेखनीय सफलता मिली। इस रणनीति ने स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर संवैधानिक मंचों के उपयोग को लेकर एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दिया।

हिंदू-मुस्लिम एकता और बंगाल पैक्ट
देशबंधु चित्तरंजन दास हिंदू-मुस्लिम एकता को राष्ट्रीय आंदोलन की मजबूती के लिए आवश्यक मानते थे। उनका विश्वास था कि भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई व्यापक जनसहयोग और सामाजिक सद्भाव के बिना सफल नहीं हो सकती। इसी सोच के तहत 1923 में उन्होंने बंगाल के हिंदू और मुस्लिम नेताओं के बीच समझौते का प्रयास किया, जिसे बंगाल पैक्ट कहा जाता है। इसमें प्रतिनिधित्व और सरकारी सेवाओं में हिस्सेदारी जैसे मुद्दों पर सहमति बनाने की कोशिश की गई। इस समझौते को समर्थन भी मिला और विरोध भी; इसके प्रावधानों पर उस समय कांग्रेस तथा बंगाल की राजनीति में गंभीर बहस हुई।
बंगाल पैक्ट के प्रति उनका दृष्टिकोण उस व्यापक राजनीतिक सोच का हिस्सा था, जिसमें वे सामुदायिक सहयोग को स्वराज की बुनियादी शर्त मानते थे। इस विषय पर मतभेदों को समझते समय उस दौर की सामाजिक संरचना, प्रतिनिधित्व संबंधी मांगों और औपनिवेशिक राजनीति के संदर्भ को ध्यान में रखना आवश्यक है।
कोलकाता के प्रथम महापौर और सुभाष चंद्र बोस से संबंध
1924 में स्वराजवादियों की सफलता के बाद चित्तरंजन दास को कोलकाता नगर निगम का प्रथम महापौर चुना गया। नगर प्रशासन के लिए उनकी प्राथमिकताओं में प्राथमिक शिक्षा, गरीबों के लिए चिकित्सा सहायता, स्वच्छ पेयजल, बेहतर सफाई व्यवस्था, सस्ती और शुद्ध खाद्य सामग्री तथा गरीबों के लिए आवास जैसे विषय शामिल थे। वे स्थानीय स्वशासन को जनता के जीवन में वास्तविक सुधार लाने का माध्यम बनाना चाहते थे।
दास ने युवा सुभाष चंद्र बोस की प्रतिभा और संगठन क्षमता को पहचाना। उन्होंने उन्हें कोलकाता नगर निगम में मुख्य कार्यकारी अधिकारी की जिम्मेदारी सौंपी। यही संबंध आगे चलकर राजनीतिक गुरु और शिष्य के रिश्ते के रूप में जाना गया। सुभाष चंद्र बोस ने बाद में अपने राजनीतिक जीवन और लेखन में देशबंधु के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त किया। दास का युवा कार्यकर्ताओं पर भरोसा और उन्हें जिम्मेदारी देने का तरीका उनके नेतृत्व की महत्वपूर्ण विशेषता थी।

पत्रकारिता, साहित्य और सामाजिक विचार
देशबंधु का व्यक्तित्व राजनीति और कानून तक सीमित नहीं था। वे कवि और लेखक भी थे। उनकी रचनाओं में ‘सागर-संगीत’, ‘अंतर्यामी’ और ‘किशोर-किशोरी’ का उल्लेख मिलता है। उन्होंने ‘नारायण’ पत्रिका से भी जुड़कर साहित्यिक-सांस्कृतिक विमर्श को आगे बढ़ाया। स्वराज पार्टी के विचारों और राजनीतिक गतिविधियों को जनता तक पहुंचाने के लिए ‘फॉरवर्ड’ समाचारपत्र की शुरुआत भी महत्वपूर्ण रही।
सामाजिक प्रश्नों पर उनका दृष्टिकोण उदार और सुधारवादी था। वे जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता के विरोधी थे। महिला शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और महिलाओं की सामाजिक भागीदारी का समर्थन करते थे। उनके लिए राष्ट्रीय स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं था; समाज के भीतर समानता, शिक्षा और सम्मान के अवसरों का विस्तार भी उसमें शामिल था।
अंतिम समय और विरासत
लगातार राजनीतिक काम, यात्राओं और सार्वजनिक जीवन के दबाव के बीच उनका स्वास्थ्य कमजोर होने लगा। 1925 में वे स्वास्थ्य लाभ के लिए दार्जिलिंग गए। वहीं 16 जून 1925 को 55 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनके असामयिक निधन से बंगाल और राष्ट्रीय राजनीति ने एक प्रभावशाली नेता खो दिया। महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस सहित अनेक समकालीन नेताओं ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया।
चित्तरंजन दास का जीवन इस बात का उदाहरण है कि स्वतंत्रता आंदोलन में अलग-अलग रणनीतियां अपनाने वाले नेता भी एक साझा राष्ट्रीय लक्ष्य के लिए काम कर सकते थे। उन्होंने अदालत में अपनी प्रतिभा का उपयोग किया, जनांदोलन में निजी हितों का त्याग किया, विधान परिषदों के भीतर संघर्ष की राह सुझाई और स्थानीय प्रशासन को जनकल्याण से जोड़ने का प्रयास किया। स्वराज पार्टी, बंगाल पैक्ट, कोलकाता नगर निगम और सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने में उनकी भूमिका भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ियां हैं।

5 नवंबर को उनकी जयंती पर देशबंधु को याद करना केवल एक स्वतंत्रता सेनानी को श्रद्धांजलि देना नहीं है, बल्कि उस विचार को स्मरण करना भी है कि राष्ट्रनिर्माण के लिए साहस, त्याग, सामाजिक सद्भाव और जनसेवा—चारों की जरूरत होती है।
