रांची: चारा घोटाला मामले में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) प्रमुख और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की कानूनी मुश्किलों के बीच झारखंड हाईकोर्ट में उनकी अपील पर सुनवाई जारी है। गुरुवार को हुई सुनवाई में बचाव पक्ष ने अदालत के सामने यह तर्क रखा कि ट्रेजरी से अधिक राशि की निकासी होना और उस निकासी के पीछे हुई कथित धोखाधड़ी की जानकारी होना दो अलग-अलग बातें हैं। अधिवक्ताओं ने कहा कि लालू प्रसाद को कथित फर्जी निकासी की जानकारी नहीं थी और उन्हें मामले में गलत तरीके से आरोपी बनाया गया।
यह सुनवाई देवघर कोषागार से अवैध निकासी से जुड़े मामले में लालू प्रसाद की अपील से संबंधित है। मामले में झारखंड हाईकोर्ट की जस्टिस अनुभा रावत चौधरी की अदालत में बचाव पक्ष ने ट्रेजरी व्यवस्था, लेखा प्रक्रिया, महालेखाकार कार्यालय और जांच की दिशा से जुड़े कई सवाल उठाए। अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 2 नवंबर 2026 की तारीख निर्धारित की है। लालू प्रसाद चारा घोटाला मामले में बचाव पक्ष का मुख्य तर्क
बचाव पक्ष ने अदालत में यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि सरकारी कोषागार से स्वीकृत सीमा से अधिक धन निकलना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं माना जा सकता कि मुख्यमंत्री स्तर पर बैठे व्यक्ति को उस राशि की कथित धोखाधड़ी की जानकारी थी। अधिवक्ताओं का कहना था कि प्रशासनिक और वित्तीय प्रक्रिया में अलग-अलग स्तर के अधिकारियों की जिम्मेदारियां निर्धारित होती हैं और किसी शीर्ष पद पर मौजूद व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि उसे कथित अपराध की जानकारी थी या उसमें उसकी भूमिका थी।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने संबंधित दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि विभिन्न जिलों को भेजे गए पत्रों का उल्लेख तो मिलता है, लेकिन ट्रेजरी के जरिए खर्च की गई राशि का पूरा विवरण उन दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं था। इसी आधार पर बचाव पक्ष ने वित्तीय निगरानी की प्रक्रिया और अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए।

ट्रेजरी नियमों और उपयोगिता प्रमाण पत्र पर सवाल
बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि निर्धारित ट्रेजरी प्रक्रिया के तहत हर महीने के अंत में खर्च से जुड़े बिल और वाउचर के साथ उपयोगिता प्रमाण पत्र महालेखाकार कार्यालय को भेजे जाने चाहिए थे। दलील दी गई कि यदि यह प्रक्रिया पूरी तरह लागू नहीं हुई, तो सिर्फ बाद में सामने आई अधिक निकासी के आधार पर तत्कालीन मुख्यमंत्री की जानकारी या संलिप्तता का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
अधिवक्ताओं ने यह सवाल भी उठाया कि जिस अवधि में कथित अनियमितताएं हुईं, उस दौरान संबंधित जिलों में तैनात कुछ प्रशासनिक और लेखा अधिकारियों को आरोपी क्यों नहीं बनाया गया। बचाव पक्ष के अनुसार, धनराशि के हिसाब-किताब और वित्तीय निगरानी में जिन अधिकारियों की प्रत्यक्ष भूमिका थी, उनकी जिम्मेदारी की भी समान रूप से जांच होनी चाहिए थी।
41 प्राथमिकी और जांच रिकॉर्ड का भी उल्लेख
बहस के दौरान एक गवाह के बयान का भी हवाला दिया गया। बचाव पक्ष ने कहा कि बिहार सरकार के निर्देश पर चारा घोटाले से संबंधित 41 प्राथमिकी दर्ज की गई थीं और बाद में इनसे जुड़े रिकॉर्ड, दस्तावेज तथा वाउचर केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपे गए। बचाव पक्ष ने इस तथ्य को अपनी दलील के समर्थन में रखा कि तत्कालीन राज्य सरकार की ओर से मामले को लेकर कार्रवाई की गई थी।
बचाव पक्ष की रणनीति का एक अहम हिस्सा यह रहा कि अदालत के सामने प्रशासनिक प्रक्रिया और कथित आपराधिक साजिश के बीच अंतर स्पष्ट किया जाए। अधिवक्ताओं ने कहा कि किसी वित्तीय अनियमितता के सामने आने और उसके पीछे की आपराधिक मंशा की जानकारी होने के बीच कानूनी तौर पर महत्वपूर्ण अंतर है। हालांकि, इन दलीलों पर अंतिम निर्णय अदालत को उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के आधार पर करना है।

सीएजी रिपोर्ट में देरी का भी उठा मुद्दा
सुनवाई के दौरान नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट और उसकी प्रक्रिया का भी उल्लेख किया गया। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि ट्रेजरी से अधिक निकासी से संबंधित टिप्पणियां सामने आई थीं, लेकिन उनमें कथित धोखाधड़ी से निकासी का स्पष्ट उल्लेख नहीं था। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि CAG रिपोर्ट की प्रक्रिया में समय लगने के कारण वित्तीय अनियमितताओं पर आपत्तियां बाद में सामने आईं।
अधिवक्ताओं के मुताबिक, CAG की रिपोर्ट पहले राज्यपाल को भेजी जाती है, उसके बाद उसे विधानसभा के समक्ष रखा जाता है और फिर लोक लेखा समिति उसके बिंदुओं की जांच करती है। बचाव पक्ष ने इसी प्रक्रिया का हवाला देते हुए यह सवाल उठाया कि यदि रिपोर्ट और आपत्तियां बाद में सामने आईं, तो कथित फर्जी निकासी की जानकारी लालू प्रसाद को पहले से होने का निष्कर्ष किस आधार पर निकाला गया।
देवघर कोषागार से 89.27 लाख रुपये की निकासी का मामला
यह मामला देवघर कोषागार से वर्ष 1990 से 1994 के बीच पशु चारे के नाम पर सरकारी राशि की कथित अवैध निकासी से जुड़ा है। मामले में करीब 89.27 लाख रुपये की निकासी का आरोप है। विशेष CBI अदालत ने लालू प्रसाद को दोषी ठहराते हुए साढ़े तीन साल की सजा और जुर्माना लगाया था। इसी फैसले के खिलाफ उनकी अपील झारखंड हाईकोर्ट में लंबित है।
चारा घोटाले के अलग-अलग मामलों में लालू प्रसाद को पहले भी दोषी ठहराया जा चुका है। वर्ष 2022 में डोरंडा कोषागार से जुड़े मामले में विशेष CBI अदालत ने उन्हें पांच साल की सजा सुनाई थी। उस मामले में कथित अवैध निकासी की राशि 139.35 करोड़ रुपये बताई गई थी।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हाईकोर्ट में तेज हुई सुनवाई
लालू प्रसाद से जुड़े देवघर कोषागार मामले में कानूनी प्रक्रिया का एक अहम पड़ाव जुलाई 2026 में आया था। सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट की ओर से दी गई जमानत में हस्तक्षेप करने से इनकार किया था और लंबित अपील पर तेजी से सुनवाई करने को कहा था। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट से अपील का निपटारा छह महीने के भीतर करने का अनुरोध किया था।
अब झारखंड हाईकोर्ट में बचाव पक्ष की दलीलों के केंद्र में यह सवाल है कि कथित वित्तीय अनियमितताओं और लालू प्रसाद की व्यक्तिगत जानकारी या आपराधिक जिम्मेदारी के बीच संबंध किस तरह स्थापित होता है। दूसरी ओर, मामले में पहले हो चुकी दोषसिद्धि और जांच एजेंसियों की ओर से रखे गए साक्ष्यों का परीक्षण अपीलीय अदालत के सामने जारी है।
2 नवंबर को फिर होगी सुनवाई
गुरुवार की सुनवाई के बाद अदालत ने मामले को आगे की बहस के लिए 2 नवंबर 2026 को सूचीबद्ध किया है। आने वाली सुनवाई में बचाव पक्ष अपनी दलीलों को आगे बढ़ा सकता है और अदालत मामले से जुड़े रिकॉर्ड तथा पूर्व में दिए गए फैसले के कानूनी पहलुओं पर विचार करेगी। फिलहाल, हाईकोर्ट के अंतिम फैसले तक लालू प्रसाद की दोषसिद्धि के खिलाफ उनकी अपील न्यायिक विचाराधीन है।
