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Home - टेक्नोलॉजी - 1972 में बेंगलुरु से भरी SA 315B की पहली भारतीय उड़ान, ‘चीता’ हेलीकॉप्टर की शुरुआत

1972 में बेंगलुरु से भरी SA 315B की पहली भारतीय उड़ान, ‘चीता’ हेलीकॉप्टर की शुरुआत

प्रशांत कुमार
Last updated: अक्टूबर 18, 2026 2:36 पूर्वाह्न
By : प्रशांत कुमार
Published on : 2 सप्ताह पहले
SA 315B
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6 अक्टूबर 1972 भारतीय विमानन और स्वदेशी रक्षा उत्पादन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण तारीख है। इसी दिन हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के बेंगलुरु स्थित परिसर में फ्रांसीसी SA 315B Lama हेलीकॉप्टर का भारत में असेंबल किया गया पहला संस्करण पहली बार उड़ा। भारत में इस हेलीकॉप्टर को बाद में ‘चीता’ (Cheetah) नाम से जाना गया। यह उपलब्धि भारत की हेलीकॉप्टर निर्माण क्षमता और ऊंचाई वाले दुर्गम क्षेत्रों में सैन्य संचालन की जरूरतों के लिहाज से अहम थी।

SA 315B Lama से ‘चीता’ तक का सफर

SA 315B Lama को फ्रांस की विमानन कंपनी ने ऐसे क्षेत्रों में काम करने के लिए विकसित किया था, जहां कम तापमान, विरल हवा और ऊंचे पहाड़ सामान्य हेलीकॉप्टरों के लिए चुनौती बनते हैं। भारत की हिमालयी सीमाओं और दुर्गम पर्वतीय इलाकों की जरूरतों को देखते हुए इस तरह के हेलीकॉप्टर की उपयोगिता विशेष थी।

HAL ने 1970 में फ्रांसीसी कंपनी के साथ चीता के लाइसेंस उत्पादन के लिए समझौता किया। भारत में असेंबल किए गए पहले SA 315B ने 6 अक्टूबर 1972 को उड़ान भरी। इसके बाद भारतीय सेनाओं के लिए इस हेलीकॉप्टर की आपूर्ति शुरू हुई और आगे चलकर HAL ने इसका निर्माण भी किया।

ऊंचाई पर उड़ान इसकी सबसे बड़ी खासियत

Lama/चीता हेलीकॉप्टर की प्रमुख विशेषता इसका ऊंचाई पर काम करने का प्रदर्शन है। पहाड़ी क्षेत्रों में सैनिकों, जरूरी सामान और उपकरणों को पहुंचाने, निगरानी करने तथा जरूरत पड़ने पर बचाव और चिकित्सा निकासी जैसे कार्यों में इसकी भूमिका रही है। जहां सड़क संपर्क सीमित हो या मौसम और भूगोल के कारण पहुंचना कठिन हो, वहां हल्के हेलीकॉप्टर महत्वपूर्ण सहायता दे सकते हैं।

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21 जून 1972 को फ्रांसीसी परीक्षण पायलट जीन बूले ने SA 315B Lama से 12,442 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचकर हेलीकॉप्टर के लिए विश्व ऊंचाई रिकॉर्ड बनाया था। इस प्रदर्शन ने विमान की उच्च-ऊंचाई क्षमता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।

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भारतीय रक्षा उत्पादन के लिए क्यों अहम थी यह उपलब्धि?

बेंगलुरु में पहले भारतीय-असेंबल SA 315B की उड़ान केवल एक परीक्षण उड़ान नहीं थी; यह देश में हेलीकॉप्टर निर्माण और तकनीकी क्षमता विकसित करने की दिशा में भी एक कदम था। लाइसेंस उत्पादन के जरिए भारतीय उद्योग को निर्माण, रखरखाव और संचालन से जुड़ा अनुभव मिला। HAL आज भी अपने हेलीकॉप्टर कार्यक्रमों के लिए जाना जाता है और उसकी बेंगलुरु हेलीकॉप्टर इकाई चीता सहित कई प्रकार के हेलीकॉप्टर बनाती है।

‘चीता’ की विरासत

चीता ने भारतीय सेना और वायुसेना के लिए विशेष रूप से ऊंचाई वाले क्षेत्रों में उपयोगिता साबित की। इसका उपयोग संपर्क, निगरानी, रसद सहायता और दुर्गम स्थानों तक पहुंचने जैसे कामों में किया गया। समय के साथ विमानन तकनीक में बदलाव आया है, लेकिन चीता का इतिहास भारत की पर्वतीय संचालन क्षमता और रक्षा विनिर्माण के विकास की कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।

1972 में बेंगलुरु से भरी गई यह उड़ान भारत के विमानन इतिहास में एक यादगार पड़ाव थी—जिसने विदेशी डिजाइन और भारतीय औद्योगिक क्षमता के सहयोग से एक ऐसे हेलीकॉप्टर को देश की जरूरतों के अनुरूप आगे बढ़ाया, जो ऊंचे पहाड़ों में काम करने के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया था।

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