पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (PMCH) में चिकित्सकों की टीम ने गंभीर लिवर खराबी और कई जटिलताओं से जूझ रही 23 वर्षीय गर्भवती महिला का सफल उपचार किया। करीब 33 दिनों के इलाज के बाद महिला को स्थिर स्थिति में अस्पताल से छुट्टी दी गई। छुट्टी के 15 दिन बाद हुए फॉलोअप में उसका बिलिरुबिन सामान्य पाया गया।
36 सप्ताह की गर्भावस्था में गंभीर हालत में पहुंची थी महिला
महिला करीब 36 सप्ताह की गर्भवती थी और बेहद गंभीर स्थिति में PMCH में भर्ती कराई गई थी। उसकी लिवर और किडनी की कार्यक्षमता प्रभावित थी, जबकि रक्त के जमने की प्रक्रिया में भी गंभीर गड़बड़ी सामने आई थी।
मां और गर्भस्थ शिशु की स्थिति को देखते हुए चिकित्सकों ने 17 अगस्त को आपातकालीन सिजेरियन ऑपरेशन किया। ऑपरेशन के बाद महिला ने 2.75 किलोग्राम वजन के जीवित शिशु को जन्म दिया।
प्रसव के बाद बढ़ी उपचार की चुनौती
बच्चे के जन्म के बाद महिला को अत्यधिक रक्तस्राव और रक्त जमने से जुड़ी गंभीर समस्या का सामना करना पड़ा। इस दौरान उसका बिलिरुबिन स्तर 30 mg/dL से ऊपर पहुंच गया।
इसके अलावा महिला के रक्त में शुगर का स्तर बार-बार बेहद कम होने और इससे जुड़े दौरे पड़ने जैसी गंभीर जटिलताएं भी सामने आईं। स्थिति को देखते हुए लगातार निगरानी के साथ रक्त और रक्त अवयवों की आवश्यकता पड़ी।
कई विभागों की टीम ने मिलकर संभाला इलाज
गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. धीरज कुमार के नेतृत्व में महिला के लिवर से जुड़ी समस्याओं और अन्य जटिलताओं का उपचार किया गया। टीम ने नियमित विशेषज्ञ परामर्श के साथ एन-एसिटाइलसिस्टीन सहित आवश्यक उपचार दिया।
इलाज के दौरान महिला के लिवर, किडनी और ब्लड शुगर की लगातार निगरानी की गई। धीरे-धीरे उसकी स्थिति में सुधार आने लगा।
प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. (प्रो.) के. मंजू, यूनिट हेड एवं एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सुषमा सिंह और असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. स्मिता की टीम ने आपातकालीन प्रसव, प्रसवोत्तर रक्तस्राव के नियंत्रण और आगे की देखभाल में अहम भूमिका निभाई।
टीम में द्वितीय वर्ष की पीजी चिकित्सक डॉ. उज़मा नायर, डॉ. तनुष्का लखमानी, डॉ. साक्षी कुमारी और डॉ. शालिनी प्रिया, जबकि प्रथम वर्ष की पीजी चिकित्सक डॉ. शाम्भवी और डॉ. साहिबा जयपुरियार शामिल रहीं।
ICU में लगातार निगरानी से स्थिति में आया सुधार
चिकित्सकों के मुताबिक, ऐसे गंभीर मरीजों के उपचार में आधुनिक ICU, संक्रमण नियंत्रण, स्वच्छ वातावरण और प्रशिक्षित मेडिकल एवं नर्सिंग स्टाफ की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने वाले मरीजों में संक्रमण और सेप्सिस का जोखिम भी चुनौती बन सकता है। ऐसे में लगातार निगरानी और समय पर उपचार बेहद जरूरी होता है।
लगातार उपचार के बाद महिला की किडनी की कार्यक्षमता और रक्त जमने की प्रक्रिया में सुधार आया। अन्य जांचों में भी स्थिति बेहतर हुई।
छुट्टी के समय बिलिरुबिन 6–8 mg/dL तक पहुंचा
अस्पताल से छुट्टी के समय महिला का बिलिरुबिन स्तर करीब 6–8 mg/dL रह गया था। वह होश में थी, भोजन कर पा रही थी और उसकी स्थिति स्थिर बताई गई।
19 सितंबर को महिला को नियमित फॉलोअप की सलाह के साथ अस्पताल से छुट्टी दी गई।
15 दिन बाद फॉलोअप में बिलिरुबिन सामान्य
अस्पताल से छुट्टी के करीब 15 दिन बाद महिला दोबारा फॉलोअप के लिए पहुंची। जांच में उसका बिलिरुबिन पूरी तरह सामान्य पाया गया।
इलाज के दौरान 30 mg/dL से अधिक पहुंच चुके बिलिरुबिन का सामान्य स्तर पर आना महिला की स्थिति में हुए सुधार को दर्शाता है। गंभीर लिवर संबंधी समस्या, किडनी की खराब कार्यक्षमता और रक्तस्राव जैसी जटिलताओं के बीच उपचार के बाद महिला का स्वस्थ स्थिति में फॉलोअप तक पहुंचना चिकित्सकीय टीम के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि रही।