शुद्ध हिन्दी कैसे बोलें और लिखें ? ‘भासा’ से ‘भाषा’ तक की इन गलतियों को सुधारें, विद्यार्थी जरूर पढ़ें
खूबसूरत भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती, वह व्यक्ति के संस्कार, अध्ययन और अभ्यास की पहचान भी होती है। हम क्या बोलते हैं, उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हम उसे किस तरह बोलते और लिखते हैं।
‘भाषा’ को ‘भासा’, ‘क्षेत्र’ को ‘छेत्र’, ‘मालूम’ को ‘मलूम’, ‘विश्व’ को ‘बिस्व’ और ‘मित्र’ को ‘मित्तर’ बोलने की आदत मामूली लग सकती है, लेकिन यही छोटी-छोटी अशुद्धियां धीरे-धीरे हमारी भाषा की पूरी संरचना को प्रभावित करती हैं।
सही उच्चारण से सही वर्तनी का रास्ता खुलता है और सही वर्तनी से भाषा में वह गरिमा आती है, जो किसी भी विद्यार्थी की वास्तविक पहचान बन सकती है।

भाषा केवल पढ़ने का विषय नहीं, बोलने का भी अभ्यास है
हिन्दी सीखने वाले विद्यार्थियों के लिए सबसे पहली जरूरत यह समझना है कि भाषा किताबों में पढ़ लेने भर से नहीं आती। भाषा को सही ढंग से बोलने के लिए लगातार सुनना, बोलना और अपनी गलतियों को सुधारना पड़ता है। लंबे समय तक हिन्दी पढ़ने के बावजूद यदि उच्चारण पर ध्यान नहीं दिया गया तो लिखित भाषा में भी अशुद्धियां बनी रह सकती हैं।
शब्दों का सही उच्चारण केवल परीक्षा में अच्छे अंक दिलाने का साधन नहीं है। यह व्यक्ति के भाषाई आत्मविश्वास का भी आधार है। कोई विद्यार्थी कितना पढ़ा-लिखा है, उसकी भाषा सुनते ही काफी हद तक इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
यही वजह है कि विद्यार्थियों को हिन्दी के साथ-साथ दूसरी भाषाओं के भी मानक उच्चारण को सीखने की सलाह दी जाती है। अंग्रेजी को उसके मानक उच्चारण के साथ, संस्कृत को संस्कृत के अनुरूप तथा हिन्दी और उर्दू को अच्छे वक्ताओं के उच्चारण के आधार पर बोलने का अभ्यास भाषा को निखार सकता है।
बीए पास विद्यार्थियों की कापियों में भी मिलीं ऐसी गलतियां
भाषा की अशुद्धियां केवल कम पढ़े-लिखे लोगों तक सीमित नहीं हैं। अध्ययन सामग्री में दिए गए उदाहरण बताते हैं कि उच्च शिक्षा प्राप्त विद्यार्थियों की कापियों में भी कई बार उच्चारण के प्रभाव से वर्तनी संबंधी गलतियां दिखाई देती हैं।

मसलन, ‘स्कूल’ को ‘अस्कूल’, ‘स्पर्श’ को ‘अस्पर्श’, ‘स्थान’ को ‘अस्थान’, ‘स्त्री’ को ‘इस्त्री’, ‘स्नान’ को ‘अस्नान’ और ‘स्थिति’ को ‘इस्थिति’ लिख देना उस समस्या की ओर संकेत करता है, जिसमें विद्यार्थी शब्द के वास्तविक स्वरूप के बजाय अपने सुने या बोले हुए रूप को लिख देता है।
इसी तरह ‘उदाहरण’ को ‘उधारण’, ‘केंद्र’ को ‘केंदर’, ‘क्षमा’ को ‘छिमा’, ‘प्रारब्ध’ को ‘प्रालब्ध’, ‘भक्ति’ को ‘भगती’ और ‘मुकाबले’ को ‘मुकालबे’ लिखना भी उच्चारण और वर्तनी के बीच संबंध को स्पष्ट करता है।
कुछ दूसरी आम अशुद्धियों में ‘उम्र’ को ‘उमर’, ‘गृहस्थी’ को ‘गिरस्ती’, ‘जबरदस्ती’ को ‘जबरजस्ती’, ‘विद्या’ को ‘बिद्या’, ‘मतलब’ को ‘मतबल’ और ‘शासन’ को ‘शाशन’ कहना या लिखना शामिल है।
इसी क्रम में ‘स्तुति’ को ‘उस्तुति’, ‘क्षण भर’ को ‘छिन भर’, ‘लखनऊ’ को ‘नखनऊ’, ‘बेइज्जती’ को ‘बेजती’, ‘मदद’ को ‘मदत’ और ‘शाबाश’ को ‘शाबास’ बोलने जैसी गलतियां भी बताई गई हैं।

विद्यार्थियों के लिए याद रखने योग्य शुद्ध रूप
| अशुद्ध रूप | शुद्ध रूप |
|---|---|
| अस्कूल | स्कूल |
| अस्पर्श | स्पर्श |
| अस्थान | स्थान |
| इस्त्री | स्त्री |
| अस्नान | स्नान |
| इस्थिति | स्थिति |
| उधारण | उदाहरण |
| केंदर | केंद्र |
| छिमा | क्षमा |
| प्रालब्ध | प्रारब्ध |
| भगती | भक्ति |
| मुकालबे | मुकाबले |
| उमर | उम्र |
| गिरस्ती | गृहस्थी |
| जबरजस्ती | जबरदस्ती |
| बिद्या | विद्या |
| मतबल | मतलब |
| शाशन | शासन |
| उस्तुति | स्तुति |
| छिन भर | क्षण भर |
| नखनऊ | लखनऊ |
| बेजती | बेइज्जती |
| मदत | मदद |
| शाबास | शाबाश |
शब्द के आरंभ में अनावश्यक ‘अ’ जोड़ना भी बड़ी गलती
हिन्दी के उच्चारण में एक सामान्य समस्या यह है कि कुछ लोग शब्दों के आरंभ में अनावश्यक रूप से ‘अ’ ध्वनि जोड़ देते हैं। परिणाम यह होता है कि शब्द का मूल रूप ही बदल जाता है।
‘स्पष्ट’ और ‘स्थिर’ जैसे शब्दों को यदि शुरुआत में अतिरिक्त ध्वनि जोड़कर बोला जाए तो उच्चारण विकृत हो जाता है। विद्यार्थी को यह समझना चाहिए कि हर शब्द को अपने स्वाभाविक ध्वनि-विन्यास के साथ बोलना आवश्यक है।
इसी तरह कुछ लोग शब्द के अंत में आने वाली इ और उ की ह्रस्व ध्वनियों को अनावश्यक रूप से दीर्घ कर देते हैं। ‘तिथि’, ‘शक्ति’ और ‘साधु’ जैसे शब्दों के उच्चारण में स्वर की लंबाई का अंतर महत्वपूर्ण हो सकता है। उच्चारण बिगड़ने पर कई बार उसकी छाप लिखावट पर भी पड़ती है।
क्षेत्र बदलने के साथ बदल जाता है उच्चारण
भारत की भाषाई विविधता इसकी खूबसूरती है, लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों की मातृभाषाओं और बोलियों का प्रभाव हिन्दी के उच्चारण पर भी पड़ता है।

कई बार क्षेत्रीय प्रभाव के कारण विद्यार्थी कुछ ध्वनियों का उच्चारण मानक हिंदी से अलग करते हैं। उदाहरण के तौर पर कुछ क्षेत्रों में ‘न’ और ‘ण’ की ध्वनियों में अंतर स्पष्ट नहीं रह जाता। कहीं ‘श’, ‘ष’ और ‘स’ के उच्चारण में अंतर कम हो जाता है तो कहीं ‘व’ का उच्चारण भी अलग ढंग से सुनाई देता है।
इसी तरह ‘ऐ’ और ‘ए’ तथा ‘औ’ और ‘ओ’ के बीच का अंतर भी कई वक्ताओं के उच्चारण में धुंधला हो जाता है। कहीं ह्रस्व स्वर को दीर्घ और दीर्घ स्वर को ह्रस्व बोलने की आदत दिखाई देती है।
इन गलतियों का अर्थ यह नहीं कि किसी क्षेत्र या बोली को कमतर माना जाए। स्थानीय बोलियां अपनी जगह समृद्ध भाषाई विरासत हैं। लेकिन जब विद्यार्थी मानक हिन्दी में लिखने-बोलने का लक्ष्य रखता है, तब उसे क्षेत्रीय उच्चारण और मानक उच्चारण के अंतर को पहचानना और आवश्यकतानुसार सुधारना सीखना चाहिए।
संयुक्त व्यंजन सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण
कम अभ्यास करने वाले विद्यार्थियों को संयुक्त व्यंजनों के उच्चारण में अक्सर कठिनाई होती है। ‘क्ष’, ‘त्र’, ‘ज्ञ’, ‘श्र’ जैसे संयुक्त व्यंजन बोलते समय शब्द की ध्वनियों को सही क्रम में रखना जरूरी है।

‘ज्ञ’ के उच्चारण को लेकर भी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग प्रवृत्तियां मिलती हैं। इसी प्रकार ‘ऋ’ की ध्वनि का उच्चारण भी अनेक लोग अपने क्षेत्रीय प्रभाव के अनुसार करते हैं।
इसलिए केवल यह याद कर लेना पर्याप्त नहीं है कि शब्द लिखा कैसे जाता है। यह भी जानना जरूरी है कि उसे मानक रूप में बोला कैसे जाता है।
शुद्ध उच्चारण के लिए क्या करें?
भाषा सुधारने का सबसे प्रभावी तरीका है—नियमित अभ्यास। विद्यार्थी को अपनी गलतियों की पहचान करके उन्हें एक-एक करके सुधारना चाहिए।
इसके लिए कुछ आसान उपाय अपनाए जा सकते हैं—

पहला, जिन शब्दों के उच्चारण में संदेह हो, उन्हें किसी विश्वसनीय हिन्दी विद्वान या अच्छे वक्ता से सुनें।
दूसरा, रेडियो या समाचार प्रसारण में मानक हिन्दी बोलने वाले समाचार-वाचकों के उच्चारण को ध्यान से सुनें। समाचार पढ़ने वालों का उच्चारण लंबे समय से मानक भाषा-अभ्यास का उपयोगी माध्यम रहा है।
तीसरा, किसी एक शब्द-वर्ग को चुनकर एकांत में ऊंचे स्वर में उसका अभ्यास करें। केवल मन ही मन पढ़ने से उच्चारण की गलती पकड़ना मुश्किल हो सकता है।
चौथा, वर्तनी सुधारने के लिए शब्दों को लिखकर अभ्यास करें। किसी साथी, भाई-बहन या शिक्षक से शब्द लिखवाएं और बाद में अपनी लिखावट की जांच करें।

पांचवां, अपनी सामान्य गलतियों की एक अलग सूची बनाएं। जिस शब्द को आप बार-बार गलत बोलते या लिखते हैं, उसका शुद्ध रूप अपनी नोटबुक में लिखें और नियमित रूप से दोहराएं।
उच्चारण सुधरेगा तो वर्तनी भी सुधरेगी
भाषा सीखने की पूरी प्रक्रिया में उच्चारण और वर्तनी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि विद्यार्थी शब्द को ठीक से सुनता और बोलता है, तो उसके सही लिखे जाने की संभावना भी बढ़ती है। इसके विपरीत गलत उच्चारण कई बार गलत वर्तनी का कारण बन जाता है।
इसलिए हिन्दी सीखने वाले विद्यार्थियों को भाषा को केवल परीक्षा का विषय नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास की कला समझना चाहिए।
शुद्ध हिन्दी का अर्थ कठिन या भारी-भरकम शब्दों का इस्तेमाल करना नहीं है। असली शुद्धता तो शब्द के सही उच्चारण, सही वर्तनी, सही अर्थ और सही संदर्भ में है।

भाषा सुधारने का सबसे बड़ा मंत्र—जागरूकता और अभ्यास
शुद्ध भाषा सीखने के लिए हर गलती को लेकर झिझकने की जरूरत नहीं है। गलती होना सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन गलती को पहचानकर उसे दोबारा न दोहराना ही वास्तविक प्रगति है।
जिस विद्यार्थी में यह जागरूकता पैदा हो जाए कि कौन-सा शब्द कैसे बोला जाता है, कैसे लिखा जाता है और उसका सही रूप क्या है, वह धीरे-धीरे अपनी भाषा को अधिक प्रभावशाली बना सकता है।
आखिर भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, व्यक्ति के विचारों का आईना भी है। शब्दों की शुद्धता विचारों को स्पष्टता देती है और उच्चारण की शुद्धता व्यक्ति की अभिव्यक्ति में आत्मविश्वास भरती है। इसलिए हिन्दी सीखने वाले हर विद्यार्थी के लिए एक सरल सूत्र याद रखने योग्य है—शब्द को सही सुनो, सही बोलो, सही लिखो और बार-बार अभ्यास करो। यही शुद्ध भाषा की पहली सीढ़ी है।
