दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को बसों में भरकर ले जाने का आरोप; प्रेस क्लब ऑफ इंडिया समेत चार संगठनों ने मांगी माफी, निष्पक्ष जांच और उपकरणों की वापसी
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने और उनके फोन व रिपोर्टिंग उपकरण जब्त किए जाने के आरोपों ने प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (पीसीआई) समेत चार पत्रकार संगठनों ने शनिवार को हुई पुलिस कार्रवाई की निंदा करते हुए इसे प्रेस की आजादी पर सीधा हमला बताया। संगठनों का आरोप है कि कई पत्रकारों ने अपने प्रेस पहचान पत्र दिखाए, इसके बावजूद उन्हें हिरासत में लेकर पुलिस वाहनों में बैठाया गया।
संयुक्त बयान जारी करने वाले संगठनों में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, इंडियन विमेन्स प्रेस कॉर्प्स (आईडब्ल्यूपीसी), दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (डीयूजे) और केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स की दिल्ली इकाई शामिल हैं। इन संगठनों ने दिल्ली पुलिस से बिना शर्त सभी हिरासत में लिए गए पत्रकारों को रिहा करने, उनके फोन और उपकरण लौटाने तथा सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की है।

प्रदर्शन की रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को भी बसों में ले जाने का आरोप
शनिवार को ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने बड़े पैमाने पर कार्रवाई की थी। चारों पत्रकार संगठनों के मुताबिक, इसी कार्रवाई को कवर कर रहे पत्रकारों को भी पुलिस ने हिरासत में लिया। उन्हें बसों में बैठाकर छत्रसाल स्टेडियम और चाणक्यपुरी पुलिस थाने सहित अन्य स्थानों पर ले जाया गया।
जिन मीडिया संस्थानों के पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की जानकारी सामने आई, उनमें द क्विंट, द वायर, स्क्रॉल, रिपोर्टर टीवी, नवभारत टाइम्स और न्यूजलॉन्ड्री शामिल हैं। वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता भी हिरासत में लिए गए लोगों में बताए गए।
संगठनों ने कहा कि पत्रकार पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की तस्वीरें व वीडियो बना रहे थे। आरोप है कि पहचान पत्र दिखाने के बावजूद कुछ पुलिसकर्मियों ने उनके पत्रकार होने पर सवाल उठाए। बयान के मुताबिक, कुछ अधिकारियों ने कथित तौर पर कहा, “आजकल हर कोई खुद को पत्रकार बताता है।”
फोन और रिपोर्टिंग उपकरण जब्त करने की शिकायतें
पत्रकार संगठनों ने यह भी कहा कि उन्हें शिकायतें मिली हैं कि हिरासत में लिए गए कुछ पत्रकारों के कामकाजी फोन और रिपोर्टिंग उपकरण पुलिस ने छीन लिए। इन उपकरणों का इस्तेमाल वे घटनास्थल से खबर जुटाने और रिपोर्टिंग करने के लिए कर रहे थे।

संगठनों ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि पत्रकारों को हिरासत में लेने के आदेश किसने दिए और प्रेस पहचान पत्र दिखाने के बाद भी उनके साथ ऐसी कार्रवाई क्यों की गई।
क्या रिपोर्टिंग के लिए PIB मान्यता अनिवार्य हो सकती है?
चारों संगठनों ने दिल्ली पुलिस के उस कथित रुख पर भी सवाल उठाया, जिसके अनुसार प्रदर्शन की कवरेज के लिए भारतीय प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) से मान्यता प्राप्त पत्रकारों को ही अनुमति देने की बात कही गई थी।
संगठनों का तर्क है कि प्रेस की स्वतंत्रता को पीआईबी मान्यता तक सीमित नहीं किया जा सकता। डिजिटल और स्वतंत्र मीडिया के कई पत्रकारों के पास पीआईबी कार्ड नहीं होते, लेकिन इससे उनकी पत्रकारिता की भूमिका समाप्त नहीं हो जाती। संगठनों ने मांग की कि पत्रकारों को केवल मान्यता संबंधी इस आधार पर रिपोर्टिंग से न रोका जाए और उन्हें प्रदर्शन स्थल पर अपना काम करने की स्वतंत्रता दी जाए।
चारों संस्थाओं ने बताया कि उन्होंने इसी सप्ताह दिल्ली पुलिस आयुक्त को संयुक्त ज्ञापन सौंपकर प्रदर्शन की कवरेज के दौरान पत्रकारों पर लगाई जा रही पाबंदियों को लेकर चिंता जताई थी। उनका आरोप है कि इन सुझावों पर आवश्यक कार्रवाई नहीं हुई।

22 हजार सुरक्षाकर्मियों की तैनाती और बंद मेट्रो पर भी सवाल
पत्रकार संगठनों ने राजधानी में किए गए व्यापक सुरक्षा इंतजामों की भी आलोचना की। उनके बयान में दावा किया गया कि करीब 22,000 पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान तैनात किए गए, मेट्रो स्टेशनों को बंद किया गया और प्रदर्शन रोकने के लिए इंटरनेट सेवाओं पर भी रोक लगाई गई।
संगठनों ने ऐसी व्यवस्था को राजधानी को किले में बदलने जैसा बताया। उनका कहना था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन और संस्थाओं से सवाल पूछने की कोशिश को रोकने के लिए पत्रकारों को काम से रोकना, हिरासत में लेना और संचार सेवाओं पर पाबंदियां लगाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
यह पूरा विवाद ऐसे प्रदर्शन के बीच सामने आया है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की जा रही है। प्रदर्शनकारियों की आपत्तियां मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर हैं। हालांकि, मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं के आरोपों और उन्हें लेकर चुनाव आयोग के रुख को अलग-अलग दावों के रूप में समझना जरूरी है।
पुलिस से जवाबदेही और भविष्य में रोक न लगाने की मांग
चारों पत्रकार संगठनों ने दिल्ली पुलिस से सभी हिरासत में लिए गए पत्रकारों की तत्काल और बिना शर्त रिहाई, जब्त फोन व उपकरणों की वापसी और सार्वजनिक माफी की मांग की है। उन्होंने संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों के आचरण की जांच कराने तथा भविष्य में पत्रकारों को प्रदर्शन की रिपोर्टिंग से रोकने या डराने-धमकाने की कार्रवाई न होने का आश्वासन देने को भी कहा है।

इस मामले का व्यापक सवाल केवल पत्रकारों की हिरासत तक सीमित नहीं है। विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई की रिपोर्टिंग करना भी पत्रकारों के काम का हिस्सा है। यदि पहचान पत्र दिखाने के बावजूद पत्रकारों को उनके काम के दौरान हिरासत में लिया जाता है, तो इससे घटनाओं की स्वतंत्र रिपोर्टिंग और जनता तक जानकारी पहुंचने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि दिल्ली पुलिस इन आरोपों पर क्या जवाब देती है और पत्रकार संगठनों की मांगों पर क्या कार्रवाई होती है।
