सरकारी भवनों में बिजली की व्यवस्था महज रोशनी और बिजली आपूर्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे कर्मचारियों, अधिकारियों और आम लोगों की सुरक्षा से जुड़ा विषय है। इसी को ध्यान में रखते हुए भवन निर्माण विभाग की मंत्री श्रीमती लेशी सिंह ने पटना और नालंदा जिले में विभाग के अधीन चल रही विद्युत योजनाओं की उच्चस्तरीय समीक्षा की। विश्वेश्वरैया भवन स्थित कार्यालय कक्ष में हुई बैठक में मंत्री ने विद्युत कार्यों की गुणवत्ता, लंबित परियोजनाओं और क्रियान्वयन में आ रही समस्याओं की जानकारी ली। सबसे महत्वपूर्ण निर्देश रहा—विद्युत कार्यों के लिए जल्द मानक संचालन प्रक्रिया यानी SOP तैयार की जाए और मानक गुणवत्ता वाले उपकरणों के इस्तेमाल के साथ उनकी नियमित जांच सुनिश्चित की जाए।
मंत्री ने अधिकारियों और अभियंताओं को स्पष्ट निर्देश दिया कि विद्युत कार्यों की गुणवत्ता से किसी भी स्तर पर समझौता नहीं किया जाएगा। योजनाओं में देरी को लेकर भी उन्होंने सख्त रुख अपनाया और सभी लंबित कार्यों को निर्धारित समय-सीमा में पूरा करने को कहा। लापरवाही सामने आने पर संबंधित के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई।
लेकिन इस समीक्षा बैठक के साथ एक बड़ा सवाल भी जुड़ता है—सरकारी भवनों की विद्युत सुरक्षा को लेकर SOP और समीक्षा की जरूरत आखिर बार-बार क्यों पड़ रही है?
विश्वेश्वरैया भवन की आग ने दिखाया था सिस्टम का जोखिम
पटना का विश्वेश्वरैया भवन खुद सरकारी भवनों में विद्युत और अग्नि सुरक्षा की चुनौती का एक बड़ा उदाहरण रह चुका है। मई 2022 में यहां भीषण आग लगी थी। शुरुआती जांच में आग का संभावित कारण शॉर्ट सर्किट बताया गया था। आग पांचवीं मंजिल के सर्वर रूम से शुरू होने की बात सामने आई और देखते ही देखते तीसरी, चौथी और छठी मंजिल तक फैल गई। भवन में मौजूद दो मजदूरों को बचाया गया, जबकि बड़ी संख्या में कार्यालय, रिकॉर्ड और उपकरण प्रभावित हुए।

घटना का सबसे गंभीर पहलू यह था कि आग से प्रभावित एक सफाईकर्मी जगदीश की बाद में मौत हो गई। रिपोर्ट के अनुसार उसे धुएं के कारण सांस लेने में परेशानी हुई थी और अस्पताल ले जाने के बाद उसकी मृत्यु हुई। घटना की जांच के लिए तकनीकी विशेषज्ञों और अग्निशमन अधिकारियों समेत आठ सदस्यीय समिति गठित की गई थी, जिसने वायर और केबल के नमूने भी जांच के लिए लिए थे।
इसके महज नौ दिन बाद उसी भवन की छठी मंजिल पर दोबारा आग भड़क गई। उस समय आग मलबे और जली फाइलों के बीच उठी चिंगारी से फैलने की आशंका जताई गई थी। इस घटना ने सवाल खड़ा किया था कि इतनी बड़ी आग के बाद भी भवन में दोबारा आग लगने की स्थिति कैसे बनी।
हालांकि इन घटनाओं को सीधे भवन निर्माण विभाग द्वारा लगाए गए किसी कथित घटिया विद्युत उपकरण से जोड़ना उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर उचित नहीं होगा। यही वह फर्क है जिसे सरकारी विद्युत योजनाओं की समीक्षा करते समय समझना जरूरी है।
CAG की रिपोर्ट में भी सामने आई थीं विभागीय कमियां
भवन निर्माण विभाग को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की रिपोर्टों में भी कई गंभीर कमियां दर्ज हो चुकी हैं। 2024 की बिहार से संबंधित CAG रिपोर्ट में विभाग के एक निर्माण कार्य में तकनीकी स्वीकृति से पहले काम शुरू किए जाने और लंबे समय तक अधूरे पड़े भवन पर खर्च के बावजूद उसका उपयोग नहीं हो पाने का मामला सामने आया।

रिपोर्ट के अनुसार बेगूसराय के मंझौल में 75 बेड वाले अनुमंडलीय अस्पताल के निर्माण पर करीब ₹4.89 करोड़ खर्च होने के बावजूद भवन वर्षों तक अधूरा और अनुपयोगी पड़ा रहा। ऑडिट में यह भी दर्ज हुआ कि काम शुरू किए जाने के समय आवश्यक तकनीकी स्वीकृति पहले प्राप्त नहीं की गई थी। बाद में विभागीय स्तर पर भवन में संभावित संरचनात्मक दोष की आशंका भी जताई गई थी।
यह मामला सीधे विद्युत उपकरणों की गुणवत्ता से संबंधित नहीं है, लेकिन यह जरूर बताता है कि सरकारी निर्माण परियोजनाओं में तकनीकी स्वीकृति, गुणवत्ता नियंत्रण, निगरानी और समयबद्धता कितनी महत्वपूर्ण है।
यही कारण है कि वर्तमान समीक्षा बैठक में मंत्री द्वारा SOP, उपकरणों की नियमित जांच और लंबित योजनाओं को समय पर पूरा करने पर दिया गया जोर केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं माना जा सकता।
विभाग के पास विद्युत कार्यों के लिए अलग तकनीकी ढांचा
भवन निर्माण विभाग की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार विभाग सरकारी आवासीय और गैर-आवासीय भवनों के निर्माण, नवीनीकरण, उन्नयन और रखरखाव के लिए जिम्मेदार है। विभाग के ढांचे में विद्युत कार्यों के लिए अलग तकनीकी पद और अधिकारी भी हैं।

सितंबर 2026 में विभाग ने विद्युत उपभाग में 72 पदों के सृजन से संबंधित आदेश भी प्रकाशित किया है। इसी अवधि में मुख्य अभियंता (गुणवत्ता अनुश्रवण) समेत गुणवत्ता निगरानी से जुड़े कार्यालयों के गठन की जानकारी भी विभागीय रिकॉर्ड में दर्ज है।
इसका अर्थ साफ है—व्यवस्था बनाने की कोशिश चल रही है। अब असली सवाल यह है कि इन तकनीकी और निगरानी व्यवस्थाओं का असर साइट पर कितना दिखाई देता है।
SOP में केवल उपकरणों की सूची नहीं, जवाबदेही भी जरूरी
मंत्री ने SOP तैयार करने का निर्देश दिया है। अगर यह SOP प्रभावी तरीके से तैयार और लागू होती है तो इसमें केवल यह तय करना पर्याप्त नहीं होगा कि कौन सा विद्युत उपकरण इस्तेमाल किया जाए।
एक मजबूत SOP में कम से कम ये बिंदु स्पष्ट होने चाहिए—


• विद्युत उपकरणों और केबल की गुणवत्ता जांच किस स्तर पर होगी।
• अर्थिंग, MCB/RCCB, पैनल और वायरिंग की जांच कितनी अवधि में होगी।
• पुराने सरकारी भवनों का इलेक्ट्रिकल सेफ्टी ऑडिट कब-कब होगा।
• खराब या जोखिम वाले उपकरणों को बदलने की अधिकतम समय-सीमा क्या होगी।
• निरीक्षण की रिपोर्ट डिजिटल रूप से दर्ज होगी या नहीं।
• लापरवाही की स्थिति में जिम्मेदारी किस अधिकारी की तय होगी।
यानी SOP का उद्देश्य केवल काम करने की प्रक्रिया तय करना नहीं, बल्कि काम की गुणवत्ता और उसकी जवाबदेही को मापने योग्य बनाना भी होना चाहिए।
पटना और नालंदा में अब समीक्षा का अगला चरण महत्वपूर्ण
बैठक में पटना और नालंदा की योजनाओं की प्रगति की समीक्षा की गई है। अब अगला चरण जमीन पर इसकी जांच का होना चाहिए। सरकारी भवनों में लगे पुराने विद्युत पैनल, वायरिंग, अर्थिंग, जनरेटर, ट्रांसफार्मर, फायर अलार्म और आपातकालीन विद्युत प्रणालियों की स्थिति का स्वतंत्र तकनीकी परीक्षण कराया जाए तो वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
खासकर पुराने भवनों में केवल नई परियोजनाओं पर ध्यान देने के बजाय मेंटेनेंस और सुरक्षा ऑडिट को भी प्राथमिकता देना जरूरी है। क्योंकि विद्युत दुर्घटनाएं केवल नए निर्माण में खराबी के कारण नहीं होतीं; लंबे समय तक रखरखाव न होने, वायरिंग के पुराने पड़ने, ओवरलोडिंग और सुरक्षा उपकरणों की अनदेखी से भी जोखिम बढ़ सकता है।

बैठक का असली पैमाना हादसा रोकने की क्षमता होगी
लेशी सिंह ने बैठक में साफ कहा है कि गुणवत्ता से समझौता नहीं होगा और लापरवाही मिलने पर कार्रवाई की जाएगी। अब इस निर्देश की असली परीक्षा उस समय होगी जब किसी सरकारी भवन में खराब वायरिंग, असुरक्षित उपकरण या जोखिम वाली विद्युत व्यवस्था की पहचान होगी।
सरकारी योजनाओं की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने प्रोजेक्ट पूरे हुए। सफलता का बड़ा पैमाना यह भी होना चाहिए कि कितने संभावित हादसे समय रहते रोके गए।
विश्वेश्वरैया भवन की 2022 की आग और उसके बाद दोबारा लगी आग ने यह दिखाया था कि सरकारी भवनों में विद्युत और अग्नि सुरक्षा को हल्के में लेने की गुंजाइश नहीं है। उस घटना में एक कर्मचारी की मौत भी हुई थी।
ऐसे में पटना और नालंदा की विद्युत योजनाओं की यह समीक्षा तभी सार्थक मानी जाएगी, जब बैठक में दिए गए निर्देश फाइलों और बैठकों से निकलकर नियमित निरीक्षण, गुणवत्तापूर्ण उपकरण, समयबद्ध मरम्मत और तय जवाबदेही में बदलें।

बैठक की बड़ी बातें
• पटना और नालंदा की विद्युत योजनाओं की उच्चस्तरीय समीक्षा।
• जल्द तैयार होगी विद्युत कार्यों के लिए SOP।
• मानक गुणवत्ता वाले विद्युत उपकरणों के इस्तेमाल का निर्देश।
• उपकरणों की नियमित जांच पर जोर।
• लंबित परियोजनाओं को समय-सीमा में पूरा करने का निर्देश।
• गुणवत्ता में लापरवाही मिलने पर कार्रवाई की चेतावनी।
• विश्वेश्वरैया भवन अग्निकांड ने सरकारी भवनों की विद्युत सुरक्षा पर पहले भी गंभीर सवाल उठाए थे।
• अब चुनौती—SOP को जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू करना।
संपादकीय विश्लेषण : SOP की असली परीक्षा हादसा रोकने में होगी
विद्युत योजनाओं के लिए SOP बनाना जरूरी कदम है, लेकिन इसकी सफलता फाइलों में नहीं, जमीन पर सुरक्षा में दिखनी चाहिए। सरकारी भवनों में खराब वायरिंग, पुराने उपकरण, अर्थिंग और ओवरलोड जैसी कमियां समय रहते पकड़ी जाएं, इसके लिए नियमित इलेक्ट्रिकल सेफ्टी ऑडिट और स्पष्ट जवाबदेही जरूरी है।
विश्वेश्वरैया भवन की आग जैसी घटनाएं पहले ही बता चुकी हैं कि हादसे के बाद जांच से बेहतर है कि खतरे की पहचान पहले हो। अब मंत्री के निर्देशों की असली परीक्षा यही होगी कि क्या गुणवत्ता की निगरानी वास्तव में कड़ी होती है, क्या लापरवाही पर कार्रवाई होती है और क्या संभावित हादसों को होने से पहले रोका जाता है।
क्योंकि बिजली व्यवस्था में एक छोटी चूक भी सिर्फ फाइल नहीं, किसी की जिंदगी का नुकसान बन सकती है।

