Nandigram: पश्चिम बंगाल की राजनीति में नंदीग्राम सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं है। यही वह जमीन है, जहां जमीन अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन ने तृणमूल कांग्रेस की राजनीति को राज्यव्यापी विस्तार देने में बड़ी भूमिका निभाई थी और 2021 में इसी सीट पर शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को बेहद करीबी मुकाबले में हराया था।
अब 2026 के उपचुनाव में एक बार फिर नंदीग्राम बंगाल की सत्ता और विपक्ष की राजनीतिक ताकत का प्रतीक बन गया है।
6 अक्टूबर को हुए नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव में मतदान को लेकर मतदाताओं में खासा उत्साह दिखाई दिया। चुनाव आयोग के अनुसार शाम 5 बजे तक 79.39 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया।
नंदीग्राम में कुल 2,67,157 मतदाता हैं। मतदान शाम 6 बजे तक निर्धारित था और कतार में खड़े मतदाताओं को वोट डालने की अनुमति थी।

मतदान प्रतिशत अपने आप में किसी दल के पक्ष या विपक्ष में परिणाम का प्रमाण नहीं है, लेकिन इतना जरूर बताता है कि उपचुनाव को लेकर स्थानीय राजनीतिक सक्रियता कमजोर नहीं रही। अब असली सवाल यह है कि यह बढ़ा हुआ मतदान किस राजनीतिक खेमे के पक्ष में गया है।
क्यों खाली हुई नंदीग्राम की सीट ?
नंदीग्राम सीट पर उपचुनाव की नौबत मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के कारण आई। 2026 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीटों से जीत दर्ज की थी, लेकिन बाद में भवानीपुर सीट को बरकरार रखा और नंदीग्राम छोड़ दी। इसी वजह से यहां उपचुनाव हुआ।
यह स्थिति राजनीतिक रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नंदीग्राम शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक पहचान का भी प्रमुख आधार है। 2021 में उन्होंने इसी सीट से ममता बनर्जी को 1,956 वोटों के अंतर से हराया था। इस बार उनका व्यक्तिगत चुनाव नहीं है, लेकिन उनके राजनीतिक प्रभाव और राज्य सरकार की प्रतिष्ठा की परीक्षा के रूप में चुनाव को देखा जा रहा है।
बीजेपी ने किसे मैदान में उतारा?
भारतीय जनता पार्टी ने नंदीग्राम से हसीरानी रथ को उम्मीदवार बनाया। वह दिवंगत भाजपा नेता और शुभेंदु अधिकारी के करीबी सहयोगी चंद्रनाथ रथ की मां हैं। उनकी उम्मीदवारी के साथ चुनाव में सहानुभूति का पहलू भी जुड़ गया।

हसीरानी रथ पहले पंचायत समिति सदस्य रह चुकी हैं। इसलिए वह पूरी तरह राजनीति से बाहर की उम्मीदवार नहीं हैं। भाजपा के लिए उनका मुकाबला केवल एक सीट जीतने का नहीं, बल्कि नंदीग्राम में अपने प्रभाव को बनाए रखने का भी है।
ममता बनर्जी की रणनीति ने मुकाबले को बदला
नंदीग्राम में इस बार मुकाबले का सबसे दिलचस्प पहलू तृणमूल कांग्रेस की आंतरिक स्थिति रही। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले खेमे ने पहले संचिता प्रधान को उम्मीदवार बनाया था, लेकिन बाद में उन्होंने चुनाव से हटकर कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान को समर्थन दिया।
इससे मुकाबला सीधे तौर पर बीजेपी बनाम कांग्रेस के रूप में अधिक स्पष्ट हुआ, हालांकि दूसरे राजनीतिक दलों की मौजूदगी बनी रही। ममता खेमे का कांग्रेस को समर्थन इस उपचुनाव के बड़े राजनीतिक संदेशों में से एक है। यह फैसला राज्य की बदली हुई विपक्षी रणनीति और तृणमूल की अंदरूनी राजनीतिक स्थिति दोनों की ओर संकेत करता है।
कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान भी विवादों से घिरे रहे। उन्हें पुराने आपराधिक मामलों में गिरफ्तार किया गया था और बाद में कलकत्ता हाईकोर्ट से अंतरिम जमानत मिलने के बाद उन्होंने चुनाव प्रचार शुरू किया।

लेफ्ट और दूसरे उम्मीदवारों ने मुकाबला बनाया बहुकोणीय
नंदीग्राम में सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुकाबला नहीं रहा। CPI ने शांतिगोपाल गिरि को उम्मीदवार बनाया, जबकि डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस खेमे से मोहम्मद एतेशामुल हक मैदान में रहे। इसके अलावा अन्य उम्मीदवार भी चुनाव में थे।
इस बहुकोणीय मुकाबले का अर्थ यह है कि किसी भी उम्मीदवार की जीत का अंतर केवल दो दलों के बीच वोटों के सीधे हस्तांतरण से तय नहीं होगा। छोटे दलों और स्वतंत्र उम्मीदवारों को मिलने वाला वोट भी अंतिम गणित को प्रभावित कर सकता है।
मतदान के दौरान आरोपों ने बढ़ाई राजनीतिक गर्मी
नंदीग्राम में मतदान के दौरान कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान ने आरोप लगाया कि कुछ बूथों पर विपक्षी एजेंटों को बैठने नहीं दिया गया और मतदान प्रक्रिया में अनियमितताएं हुईं। उन्होंने पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए। दूसरी तरफ भाजपा ने इन आरोपों को खारिज किया और चुनाव को शांतिपूर्ण बताया।
बाद में बंगाल कांग्रेस ने नंदीग्राम और रेजीनगर दोनों सीटों पर दोबारा मतदान की मांग की। कांग्रेस ने मतदाताओं को डराने और पोलिंग एजेंटों को हटाने जैसे आरोप लगाए। इन आरोपों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि कांग्रेस के दावे के रूप में देखा जाना चाहिए।

चुनाव आयोग के अनुसार दोनों सीटों पर मतदान के दौरान शिकायत निगरानी प्रणाली में 37 शिकायतें और नेशनल ग्रीवेंस सर्विस पोर्टल पर 60 शिकायतें दर्ज हुईं। आयोग ने संबंधित मामलों पर रिपोर्ट भी मांगी है।
विश्लेषण: नंदीग्राम में असली लड़ाई क्या है ?
नंदीग्राम के चुनाव को केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव मानना राजनीतिक रूप से अधूरा होगा। 2021 में यह सीट ममता बनर्जी बनाम शुभेंदु अधिकारी की सीधी राजनीतिक लड़ाई का प्रतीक बनी थी। अब 2026 में दोनों शीर्ष नेताओं के बजाय उनके राजनीतिक प्रभाव और संगठनों की परीक्षा हो रही है।
बीजेपी के लिए चुनौती यह है कि शुभेंदु अधिकारी के व्यक्तिगत प्रभाव को पार्टी उम्मीदवार के पक्ष में कितनी मजबूती से स्थानांतरित किया जा सका। वहीं कांग्रेस के लिए सवाल यह है कि क्या ममता बनर्जी का समर्थन उसके उम्मीदवार को जमीनी स्तर पर पर्याप्त राजनीतिक लाभ में बदल पाया।
सबसे महत्वपूर्ण संकेत 79.39 प्रतिशत मतदान है। ऊंची भागीदारी दोनों तरह से पढ़ी जा सकती है—यह सत्ता के पक्ष में मजबूत समर्थन का संकेत भी हो सकती है और सत्ता-विरोधी मतदाताओं की सक्रिय लामबंदी का भी। इसलिए सिर्फ मतदान प्रतिशत से किसी नतीजे की भविष्यवाणी करना उचित नहीं होगा।

अब निगाहें 9 अक्टूबर की मतगणना पर हैं। नंदीग्राम का फैसला यह बताएगा कि 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद यहां राजनीतिक समीकरण कितने स्थिर हैं और क्या शुभेंदु अधिकारी के प्रभाव वाले इस क्षेत्र में बीजेपी अपनी पकड़ बरकरार रख पाती है।
