15 अक्टूबर 1949 को सिमडेगा जिले के बोकबा गांव में जन्मे मुकुंद नायक झारखंड की नागपुरी लोक-संस्कृति के उन विशिष्ट कलाकारों में हैं, जिन्होंने लोकगीत, झूमर, नृत्य और पारंपरिक संगीत को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पद्म श्री और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित नायक का जीवन इस बात का उदाहरण है कि लोककला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि किसी समाज की भाषा, स्मृति और पहचान की जीवंत धरोहर होती है।
सिमडेगा से राष्ट्रीय मंच तक का सफर
मुकुंद नायक का जन्म उस समय के बिहार और वर्तमान झारखंड के सिमडेगा जिले के बोकबा गांव में हुआ। बचपन से ही उनका जुड़ाव गांव की सांगीतिक परंपराओं और अखड़ा संस्कृति से रहा। उन्होंने बुजुर्गों से नागपुरी लोकगीत सीखे और पारंपरिक गायन की शैलियों को आत्मसात किया। इसी लोकपरंपरा ने आगे चलकर उनकी कला की विशिष्ट पहचान बनाई।
नायक ने केवल गायन तक अपने काम को सीमित नहीं रखा। उन्होंने लोकनृत्य और झारखंड के पारंपरिक वाद्ययंत्रों का भी अध्ययन किया। गीतकार, गायक, नर्तक और संगीत-साधक के रूप में उनकी बहुआयामी प्रतिभा ने नागपुरी संगीत को व्यापक दर्शक-वर्ग तक पहुंचाया। उनकी प्रस्तुतियों में स्थानीय जीवन, सामुदायिक अनुभव और सांस्कृतिक आत्मीयता की झलक मिलती है।
नागपुरी लोकगीत और झूमर की पहचान
नागपुरी भाषा और झूमर झारखंड की सांस्कृतिक पहचान के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। लोकगीतों में खेती-किसानी, प्रेम, सामाजिक रिश्तों, उत्सवों और रोजमर्रा के जीवन के अनुभव सहज रूप में सामने आते हैं। झूमर की लय और सामूहिक प्रस्तुति गांवों के सामाजिक जीवन से गहराई से जुड़ी रही है। मुकुंद नायक ने इन परंपराओं को मंचीय प्रस्तुतियों के माध्यम से नई पहचान दिलाने का काम किया।

उनकी कला की खासियत यह रही कि उन्होंने लोकपरंपरा की मूल आत्मा को बनाए रखते हुए उसे नए श्रोताओं तक पहुंचाने का प्रयास किया। उन्होंने नागपुरी में गीत और कविताएं लिखीं तथा पारंपरिक गीतों को संकलित करने में भी योगदान दिया। उनकी पुस्तक नागपुरी गीत मंजरी में झारखंड के लोकगीतों का संग्रह शामिल है। उनके काम ने मौखिक परंपरा में जीवित गीतों को दर्ज करने और आगे की पीढ़ियों तक पहुंचाने में मदद की।
कुंजबन: प्रशिक्षण और सांस्कृतिक प्रस्तुति का मंच
लोककला की निरंतरता केवल मंच पर प्रस्तुति देने से नहीं आती; इसके लिए नए कलाकारों को सीखने और अभ्यास करने के अवसर भी जरूरी हैं। मुकुंद नायक ने कुंजबन प्रशिक्षण विद्यालय और प्रस्तुति दल के माध्यम से नागपुरी संगीत और नृत्य के प्रशिक्षण तथा प्रदर्शन को बढ़ावा दिया। युवा कलाकारों को पारंपरिक गीत, नृत्य और वाद्ययंत्रों से परिचित कराना उनकी सांस्कृतिक प्रतिबद्धता का अहम पक्ष रहा है।
उनकी सांस्कृतिक टोली ने भारत के विभिन्न हिस्सों में प्रस्तुतियां दीं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी झारखंड की लोककला का प्रतिनिधित्व किया। विदेशों में प्रस्तुतियों से नागपुरी संगीत और झारखंड की सांस्कृतिक विविधता को नए श्रोताओं तक पहुंचने का अवसर मिला।
पद्म श्री और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
लोकसंगीत के क्षेत्र में उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला। भारत सरकार ने 2017 में मुकुंद नायक को पद्म श्री से सम्मानित किया। इसके बाद उन्हें झारखंड के लोकसंगीत में योगदान के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2017 के लिए चुना गया; यह पुरस्कार उन्हें 2019 में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा प्रदान किया गया। ये सम्मान केवल एक कलाकार की उपलब्धि नहीं, बल्कि झारखंड की लोकसंगीत परंपरा की राष्ट्रीय मान्यता भी हैं।

इन पुरस्कारों ने नागपुरी गीत-संगीत और झूमर जैसी लोकविधाओं की अहमियत को रेखांकित किया। लोककलाकारों की साधना अक्सर अपने समुदाय के भीतर पीढ़ियों तक चलती है; राष्ट्रीय सम्मान उस परंपरा को व्यापक पहचान दिलाने और उसके संरक्षण की जरूरत पर ध्यान आकर्षित करने का माध्यम बनते हैं।
लोककला: मनोरंजन से आगे, पहचान और इतिहास की धरोहर
लोकगीतों और नृत्यों में किसी समाज की भाषा, जीवनशैली, सामूहिक स्मृति और भावनात्मक अनुभव सुरक्षित रहते हैं। जब ऐसी परंपराएं केवल मौखिक रूप में आगे बढ़ती हैं, तो उनके लुप्त होने का जोखिम भी रहता है। गीतों का संकलन, कलाकारों का प्रशिक्षण, स्थानीय भाषा में रचनात्मक काम और सार्वजनिक मंचों पर प्रस्तुतियां इस विरासत को बचाने के महत्वपूर्ण तरीके हैं। मुकुंद नायक का काम इन प्रयासों की उपयोगिता को स्पष्ट करता है।
झारखंड जैसे सांस्कृतिक रूप से विविध राज्य में लोककलाओं का संरक्षण स्थानीय पहचान को मजबूत करने के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपनी भाषाओं और परंपराओं से जोड़ता है। इसके लिए कलाकारों को उचित मंच, प्रशिक्षण के अवसर, दस्तावेजीकरण की सुविधा और सम्मानजनक आजीविका मिलना भी जरूरी है। स्कूलों, विश्वविद्यालयों, सांस्कृतिक संस्थानों और स्थानीय समुदायों की साझेदारी इस दिशा में उपयोगी भूमिका निभा सकती है।
जयंती पर मुकुंद नायक की विरासत को याद करना
15 अक्टूबर को मुकुंद नायक की जयंती झारखंड की लोकसंगीत परंपरा और उसे जीवित रखने वाले कलाकारों के योगदान को याद करने का अवसर है। बोकबा गांव से शुरू हुई उनकी सांगीतिक यात्रा ने नागपुरी गीतों और झूमर को व्यापक पहचान दिलाई। उनकी साधना यह संदेश देती है कि स्थानीय भाषा और लोककला किसी समाज की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक ताकत हैं।

मुकुंद नायक की विरासत को आगे बढ़ाने का अर्थ है—लोकगीतों को सुनना और सीखना, कलाकारों को मंच देना, नागपुरी भाषा और उसकी रचनाओं का दस्तावेजीकरण करना तथा युवाओं को पारंपरिक कला से जोड़ना। जब लोककला को सम्मान और अगली पीढ़ी तक पहुंचने का अवसर मिलता है, तभी वह संग्रहालय की वस्तु बनने के बजाय समाज की जीवंत आवाज बनी रहती है।
