10वीं के दोनों बच्चों की जिंदगी 19 सितंबर की घटना के बाद पूरी तरह बदल गई; सुबह देर से उठना, खाना-पढ़ाई में रुचि कम होना और सोशल मीडिया से दूरी बढ़ी, परिवार अब उन्हें धीरे-धीरे सामान्य दिनचर्या में लाने की कोशिश कर रहा
जमुई। 19 सितंबर की शाम मड़वा पहाड़ से लौटते समय 10वीं कक्षा के छात्र-छात्रा के साथ हुई बदसलूकी और उसका वीडियो बनाए जाने की घटना को करीब 10 दिन बीत चुके हैं। पुलिस ने मामले में कई आरोपियों को गिरफ्तार किया है और जांच के लिए SIT बनाई गई है। मुख्य आरोपी नंदन यादव को 22 सितंबर को पुलिस मुठभेड़ में पैर में गोली लगी थी। घटना के वीडियो के सोशल मीडिया पर प्रसारित होने के बाद पुलिस ने कार्रवाई शुरू की थी।
लेकिन पुलिस कार्रवाई के बाद भी इस घटना का असर उन दो किशोरों की जिंदगी से पूरी तरह नहीं गया है। परिवार के मुताबिक, दोनों करीब 10 दिन से घर से बाहर नहीं निकले हैं। स्कूल और ट्यूशन बंद हैं। दोस्तों से मिलना-जुलना लगभग खत्म हो गया है और फोन-सोशल मीडिया से भी दूरी बना ली गई है।
परिवार की चिंता सिर्फ यह नहीं है कि बच्चे कब स्कूल लौटेंगे। बड़ा सवाल यह है कि उनके मन में घटना की जो छाप बनी है, उससे वे कब और कैसे बाहर आ पाएंगे।
पहले सुबह स्कूल से शुरू होती थी, अब दिन कमरे से शुरू हो रहा
घटना से पहले दोनों बच्चों की दिनचर्या बिल्कुल सामान्य थी। सुबह करीब 6 से 6:30 बजे उठना, तैयार होकर स्कूल जाना और पढ़ाई के बाद ट्यूशन जाना उनकी रोज की दिनचर्या का हिस्सा था।
10वीं कक्षा होने के कारण स्कूल में अतिरिक्त कक्षाएं भी चल रही थीं। कई बार स्कूल की छुट्टी के बाद बच्चे सीधे ट्यूशन चले जाते थे। इसके बाद घर लौटकर सेल्फ स्टडी करते थे।
छात्र के परिवार के मुताबिक, स्कूल, ट्यूशन और घर की पढ़ाई मिलाकर वह रोज करीब 14-15 घंटे पढ़ाई से जुड़ा रहता था। दिनभर की छोटी-बड़ी बातें रात में खाना खाते समय परिवार को बताता था।
परिवार का कहना है कि पढ़ाई के साथ उसका एक सपना भी था। वह आगे चलकर अपना बिजनेस शुरू करना चाहता था और कहता था कि बड़ा होकर ऐसा काम करेगा जिसमें दूसरे लोगों को भी रोजगार मिले।
अब उसी बच्चे की दिनचर्या बदल गई है।
परिवार के अनुसार, वह सुबह अपने तय समय पर उठने के बजाय कई बार 9-10 बजे के बाद उठ रहा है। ज्यादा समय कमरे में बीत रहा है और बाहर निकलने में पहले जैसी रुचि नहीं दिख रही।
छात्रा भी कमरे से बाहर आने से बच रही
छात्रा के परिवार की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। उसकी मां के मुताबिक, पहले सुबह उठकर नाश्ता, स्कूल और पढ़ाई की नियमित दिनचर्या थी। अब कई बार नाश्ता करने से भी मना कर देती है।
परिवार ने घर में रिश्तेदारों और बच्चों को बुलाना शुरू किया है, ताकि माहौल बदले और उसका ध्यान घटना से हटे। मां का कहना है कि वे उसे हंसाने-बोलने की कोशिश करते हैं, लेकिन कुछ देर बाद वह फिर चुप होकर अपने कमरे में चली जाती है।
परिवार की कोशिश है कि उसे जबरदस्ती किसी चीज के लिए मजबूर करने के बजाय धीरे-धीरे सामान्य माहौल में वापस लाया जाए।
सोशल मीडिया बना ट्रॉमा का ट्रिगर
परिवार का कहना है कि घटना से जुड़ी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने की वजह से बच्चों के लिए परेशानी और बढ़ जाती है।
यही कारण है कि घरवाले फिलहाल फोन, सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल माध्यमों से उनकी दूरी बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।
यह चिंता बेवजह नहीं है। ट्रॉमा के बाद किसी घटना की याद, उससे जुड़े दृश्य या उससे संबंधित जगहें व्यक्ति में डर और बेचैनी को फिर सक्रिय कर सकती हैं। बच्चों में इसके साथ नींद की समस्या, लोगों से दूरी, गुस्सा, चिंता और पढ़ाई पर ध्यान लगाने में परेशानी जैसे बदलाव भी दिखाई दे सकते हैं। हालांकि हर बच्चे की प्रतिक्रिया अलग होती है और ऐसे लक्षण दिखने का मतलब अपने-आप PTSD होना नहीं है।
लड़की के लिए सिर्फ घटना नहीं, उसके बाद की यादें भी चुनौती
किशोर उम्र में किसी बच्चे के साथ सार्वजनिक रूप से हुई यौन बदसलूकी या अपमान का असर केवल उस समय तक सीमित नहीं रहता। घटना के बाद उसे बार-बार याद करना, लोगों की नजरों का डर, शर्मिंदगी या यह चिंता कि दूसरे उसके बारे में क्या सोचेंगे—ये भावनाएं उसके व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं।
WHO के मुताबिक, बच्चों और किशोरों के साथ यौन हिंसा का असर मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। कुछ मामलों में चिंता, अवसाद, नींद की परेशानी और PTSD जैसे लक्षण लंबे समय तक बने रह सकते हैं। हालांकि सभी पीड़ितों में ऐसी समस्याएं विकसित हों, यह जरूरी नहीं है; सही सहयोग और समय के साथ बहुत से लोग उबरते हैं।
इसलिए इस समय सबसे जरूरी है कि बच्चे को घटना के लिए जिम्मेदार न ठहराया जाए और उसे बार-बार वही बात बताने के लिए मजबूर न किया जाए।
लड़के पर भी पड़ा असर, डर और असुरक्षा का भाव
इस घटना में छात्रा के साथ मौजूद छात्र के साथ भी मारपीट की गई थी। ऐसे अनुभव के बाद लड़के में भी डर, गुस्सा, शर्मिंदगी, असुरक्षा या लोगों से दूरी बनाने जैसी प्रतिक्रियाएं आ सकती हैं।
परिवार के लिए यह समझना जरूरी है कि ट्रॉमा सिर्फ उस व्यक्ति तक सीमित नहीं होता जिसके साथ सीधे बदसलूकी हुई हो। घटना को देखना, खुद हिंसा का सामना करना या किसी करीबी को खतरे में देखना भी बच्चे के लिए मानसिक रूप से परेशान करने वाला अनुभव हो सकता है।
ऐसे बच्चों में स्कूल से बचना, दोस्तों से दूरी, नींद में बदलाव और पढ़ाई में एकाग्रता की कमी जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
10वीं की पढ़ाई छूटने से क्या असर पड़ेगा?
दोनों बच्चे 10वीं कक्षा में हैं। परिवार की चिंता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि बोर्ड परीक्षा की तैयारी का महत्वपूर्ण समय चल रहा है।
स्कूल, कोचिंग और सेल्फ स्टडी से अचानक पूरी तरह कट जाना पढ़ाई की निरंतरता को प्रभावित कर सकता है। ट्रॉमा की स्थिति में ध्यान लगाने और चीजों को याद रखने में परेशानी हो सकती है। बच्चों में स्कूल से बचने या पढ़ाई से दूरी बनाने जैसी प्रतिक्रिया भी देखी जाती है।
लेकिन इस समय सिर्फ यह सोचकर बच्चे पर पढ़ाई का दबाव डालना कि बोर्ड परीक्षा नजदीक है, उल्टा असर डाल सकता है।
पहली प्राथमिकता बच्चे की सुरक्षा और मानसिक स्थिरता होनी चाहिए। पढ़ाई धीरे-धीरे वापस शुरू कराई जा सकती है—छोटे लक्ष्य बनाकर, घर पर थोड़ी पढ़ाई से शुरुआत करके और जरूरत के अनुसार स्कूल के साथ मिलकर वैकल्पिक व्यवस्था बनाकर।
साइकोलॉजिस्ट की सलाह: अकेला न छोड़ें, लेकिन जबरदस्ती भी न करें
साइकोलॉजिस्ट के मुताबिक, इस तरह की घटना के बाद बच्चे को अकेला छोड़ना उचित नहीं है। परिवार को उसके साथ समय बिताना चाहिए, उसकी बात ध्यान से सुननी चाहिए और उसे यह भरोसा देना चाहिए कि वह सुरक्षित है और परिवार उसके साथ है।
उनके मुताबिक, बच्चे को बार-बार घटना के बारे में सवाल करना या हर समय उसी घटना पर बात करने के लिए मजबूर करना भी ठीक नहीं है। बच्चा अगर उस समय कुछ नहीं बता पा रहा है तो उसे समय देना जरूरी है।
WHO की trauma-informed guidelines भी बच्चों के साथ संवेदनशील और गैर-आलोचनात्मक तरीके से बातचीत, उनकी सुरक्षा और भावनात्मक जरूरतों को प्राथमिकता देने पर जोर देती हैं।
परिवार को यह भी देखना चाहिए कि बच्चा लगातार लोगों से कट रहा है, सोने-खाने में बड़ा बदलाव है, पढ़ाई पूरी तरह छोड़ रहा है, बहुत ज्यादा डर या निराशा दिखा रहा है या खुद को नुकसान पहुंचाने जैसी कोई बात कर रहा है। ऐसी स्थिति में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेने में देरी नहीं करनी चाहिए।
अभी सबसे जरूरी है—बच्चों को ‘नॉर्मल’ होने की जल्दी न कराएं
परिवार की सबसे बड़ी कोशिश फिलहाल यही है कि दोनों बच्चे धीरे-धीरे अपनी पुरानी जिंदगी में लौटें।
लेकिन ट्रॉमा से बाहर निकलने की कोई तय समयसीमा नहीं होती। किसी बच्चे को कुछ दिन लग सकते हैं, किसी को ज्यादा समय। WHO के मुताबिक, संभावित रूप से traumatic घटना के बाद distress सामान्य हो सकता है और बहुत से लोग समय के साथ उबरते हैं; परिवार और दोस्तों का सहयोग इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
इसलिए अभी सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि बच्चे स्कूल कब जाएंगे?
सवाल यह भी है कि जब वे स्कूल लौटें, दोस्तों से मिलें और फिर से फोन हाथ में लें, तो क्या वे खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे होंगे?
क्योंकि घटना के आरोपियों पर कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन बच्चों के मन पर बनी चोट को भरने के लिए परिवार, स्कूल और समाज—तीनों को साथ खड़ा होना होगा।
जमुई केस: अब तक क्या हुआ?
- 19 सितंबर: मड़वा पहाड़ से लौटते समय 10वीं के छात्र-छात्रा को कथित तौर पर युवकों ने रोका और उनके साथ बदसलूकी की। घटना का वीडियो बनाया गया।
- 21 सितंबर: वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने मामले में FIR दर्ज कर जांच शुरू की और तीन नाबालिग आरोपियों को पकड़ा।
- 22 सितंबर: मुख्य आरोपी नंदन यादव पुलिस कार्रवाई के दौरान पैर में गोली लगने से घायल हुआ। पुलिस के अनुसार, उसने भागने की कोशिश की थी।
- 23 सितंबर: आरोपी हरेराम यादव की कोर्ट में पेशी हुई। रिपोर्टों के मुताबिक, इसी दौरान एक अधिवक्ता ने उसे थप्पड़ मारा।
- 24 सितंबर: पीड़िता के परिजनों ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से मुलाकात की। परिवार को सुरक्षा और पढ़ाई में मदद का आश्वासन दिया गया।
- 28 सितंबर: पैर में गोली लगने के कारण नंदन यादव को पुलिसकर्मी कंधे पर उठाकर जमुई व्यवहार न्यायालय में पेशी के लिए लेकर पहुंचे। कोर्ट परिसर में भारी सुरक्षा व्यवस्था की गई थी।