19 अक्टूबर 1774 को कलकत्ता (आज का कोलकाता) में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के इतिहास का एक अहम अध्याय शुरू हुआ। इंग्लैंड से आए नए काउंसिल सदस्यों और सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के आगमन ने बंगाल में प्रशासन और न्याय व्यवस्था को नया रूप देने की ब्रिटिश कोशिशों को जमीन पर उतारा। यह बदलाव 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट का परिणाम था, जिसके जरिए ब्रिटिश संसद ने कंपनी के भारतीय प्रशासन पर निगरानी बढ़ाने का प्रयास किया।
रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 क्यों लाया गया?
प्लासी (1757) और बक्सर (1764) की लड़ाइयों के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का राजनीतिक और राजस्व संबंधी प्रभाव बहुत बढ़ गया था। बंगाल की दीवानी मिलने के बाद कंपनी विशाल क्षेत्र से राजस्व वसूलने लगी, लेकिन उसके प्रशासन, वित्तीय स्थिति और अधिकारियों के आचरण को लेकर ब्रिटेन में गंभीर सवाल उठ रहे थे। कंपनी की आर्थिक कठिनाइयों और शासन में अनियमितताओं की खबरों के बीच ब्रिटिश संसद ने 1773 में रेग्युलेटिंग एक्ट पारित किया। यह भारत में कंपनी के शासन को नियंत्रित करने के लिए ब्रिटिश संसद के शुरुआती बड़े हस्तक्षेपों में से एक था।
कलकत्ता पहुँचे नए काउंसिल सदस्य
इस व्यवस्था के तहत वॉरेन हेस्टिंग्स को बंगाल का पहला गवर्नर-जनरल बनाया गया और उनके साथ काम करने के लिए चार सदस्यीय काउंसिल निर्धारित की गई। इसके सदस्य थे जनरल जॉन क्लैवरिंग, कर्नल जॉर्ज मॉन्सन, फिलिप फ्रांसिस और रिचर्ड बारवेल। इनमें से नए नियुक्त सदस्य अक्टूबर 1774 में इंग्लैंड से कलकत्ता पहुँचे। 19 अक्टूबर को उनके आगमन और अगले दिन नई शासन व्यवस्था के कामकाज शुरू होने का उल्लेख ऐतिहासिक विवरणों में मिलता है।
नई काउंसिल का उद्देश्य शासन में सामूहिक निर्णय और निगरानी को बढ़ाना था। लेकिन गवर्नर-जनरल और काउंसिल के सदस्यों के बीच जल्द ही मतभेद उभर आए। हेस्टिंग्स और फिलिप फ्रांसिस के बीच टकराव विशेष रूप से प्रसिद्ध हुआ। काउंसिल में बहुमत के आधार पर फैसले होने से हेस्टिंग्स की स्थिति कई मौकों पर कमजोर हुई और कंपनी के प्रशासन में राजनीतिक संघर्ष बढ़ा।

कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना
रेग्युलेटिंग एक्ट के अंतर्गत ब्रिटिश सम्राट के अधिकार से कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट ऑफ ज्यूडिकेचर स्थापित करने की व्यवस्था की गई। 26 मार्च 1774 के चार्टर के बाद अदालत के पहले मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा इम्पे नियुक्त हुए। उनके साथ रॉबर्ट चेम्बर्स, स्टीफन सीज़र ले मैस्ट्रे और जॉन हाइड न्यायाधीश बने। अदालत ने 1774 में कामकाज शुरू किया और ब्रिटिश कानूनी परंपरा पर आधारित न्यायिक व्यवस्था को संस्थागत रूप दिया।
नई अदालत के अधिकार-क्षेत्र को लेकर जल्द ही विवाद पैदा हुए। कंपनी की कार्यकारी काउंसिल और सुप्रीम कोर्ट के बीच यह सवाल उठता रहा कि अदालत किन लोगों और मामलों पर अधिकार रखती है। भारतीय निवासियों, कंपनी के कर्मचारियों और ब्रिटिश प्रजा से जुड़े मामलों में अधिकार-क्षेत्र की अस्पष्टता ने प्रशासन और न्यायपालिका के बीच तनाव बढ़ाया। इन अनुभवों ने बाद के वर्षों में कानूनी सुधारों की आवश्यकता को भी उजागर किया।
भारतीय शासन व्यवस्था पर प्रभाव
1774 का यह बदलाव केवल अधिकारियों के आगमन की घटना नहीं था। इसने बंगाल में शासन के केंद्रीकरण, संसद की निगरानी और न्यायिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर नई बहसों की शुरुआत की। हालांकि ईस्ट इंडिया कंपनी का वाणिज्यिक और राजनीतिक प्रभुत्व बना रहा, लेकिन अब उसके प्रशासन पर ब्रिटिश सरकार का हस्तक्षेप पहले की तुलना में अधिक प्रत्यक्ष हो गया था।
फिर भी रेग्युलेटिंग एक्ट की सीमाएँ जल्दी सामने आ गईं। गवर्नर-जनरल और काउंसिल के बीच मतभेद तथा सुप्रीम कोर्ट और कार्यकारी शासन के अधिकारों को लेकर विवादों ने व्यवस्था को जटिल बनाया। इन समस्याओं को सुलझाने के लिए 1781 में संशोधनात्मक कानून लाया गया। बाद में 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट ने कंपनी के भारतीय मामलों पर ब्रिटिश सरकार की निगरानी को और व्यवस्थित किया।

इतिहास में इस घटना का महत्व
अक्टूबर 1774 में नए काउंसिल सदस्यों और न्यायाधीशों का कलकत्ता पहुँचना ब्रिटिश भारत के संवैधानिक इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ी है। इससे स्पष्ट हुआ कि भारत में कंपनी का शासन अब केवल व्यापारिक संस्था के निर्णयों तक सीमित नहीं रह सकता था; ब्रिटिश संसद और राजसत्ता उसके प्रशासन को नियंत्रित करने के लिए संस्थागत ढाँचा तैयार कर रही थीं। इस व्यवस्था में कई विरोधाभास और टकराव थे, लेकिन इसी दौर ने आगे चलकर औपनिवेशिक शासन की प्रशासनिक और न्यायिक संरचना को आकार देने में भूमिका निभाई।
