पटना: बिहार की लोकसंस्कृति, पारंपरिक गीत-संगीत और लोकनृत्यों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के उद्देश्य से कला एवं संस्कृति विभाग का सांस्कृतिक दल जयपुर के लिए रवाना हो गया। यह दल जवाहर कला केंद्र में आयोजित होने वाले 29वें लोकरंग-2026 राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले में बिहार की सांस्कृतिक विविधता का प्रतिनिधित्व करेगा। मंगलवार को बिहार म्यूजियम के समीप आयोजित कार्यक्रम में कला एवं संस्कृति मंत्री डॉ. प्रमोद कुमार, विधान पार्षद संजय मयूख और कला-संस्कृति प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष वरुण कुमार सिंह ने झंडी दिखाकर दल को रवाना किया।
5 नवंबर को जवाहर कला केंद्र में प्रस्तुति
विभाग की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार बिहार के कलाकार 5 नवंबर को जयपुर स्थित जवाहर कला केंद्र में अपनी प्रस्तुति देंगे। कार्यक्रम में राज्य की पारंपरिक लोकविधाओं को मंच पर प्रस्तुत किया जाएगा। सामा-चकेवा, झिझिया, जट-जटिन और झूमर जैसे लोकगीत एवं लोकनृत्य प्रस्तुति का हिस्सा होंगे। इनके माध्यम से बिहार के अलग-अलग क्षेत्रों की सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक परंपराओं और लोकजीवन की झलक दर्शकों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा।
तीन सांस्कृतिक संस्थाओं की टीमें शामिल
जयपुर जाने वाले सांस्कृतिक दल में रंग सेतु, स्वरांगन कल्याण सेवा समिति और सवेरा कला केंद्र की टीमें शामिल हैं। दल का नेतृत्व श्रीमती प्रतिमा सिंह, डॉ. शिवाजी सिंह और श्री भारतेंदु कर रहे हैं। अलग-अलग संस्थाओं के कलाकारों की भागीदारी से प्रस्तुति में विविध लोकशैलियों को शामिल करने की तैयारी है। विभाग का उद्देश्य कलाकारों को ऐसा मंच उपलब्ध कराना है, जहां वे अपनी कला को राज्य से बाहर के दर्शकों के सामने प्रस्तुत कर सकें।
लोककला को विरासत और पहचान से जोड़ने पर जोर
रवानगी कार्यक्रम में मंत्री डॉ. प्रमोद कुमार ने कहा कि बिहार की लोककला, लोकगीत और सांस्कृतिक परंपराएं राज्य की गौरवशाली विरासत का हिस्सा हैं। राष्ट्रीय मंचों पर इनकी प्रस्तुति से बिहार की सांस्कृतिक पहचान देशभर में मजबूत होती है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों से स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने और व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचने का अवसर मिलता है।

मंत्री के अनुसार सरकार का प्रयास है कि बिहार की लोककलाओं को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान तथा सम्मान मिले। लोककलाएं केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि इनके भीतर स्थानीय इतिहास, सामाजिक जीवन, परंपराएं और पीढ़ियों से चली आ रही सामूहिक स्मृतियां भी समाहित हैं। इसलिए इनके संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए कलाकारों को मंच देना जरूरी है।
राष्ट्रीय मेले में बिहार की सांस्कृतिक विविधता
लोकरंग राष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला विभिन्न राज्यों की लोकपरंपराओं और हस्तशिल्प को एक मंच पर लाने का अवसर देता है। ऐसे आयोजन में बिहार की भागीदारी से राज्य की पारंपरिक कलाओं को दूसरे प्रदेशों के दर्शकों और कला प्रेमियों तक पहुंचाया जा सकेगा। लोकनृत्य और गीतों के माध्यम से कलाकार अपनी क्षेत्रीय पहचान को जीवंत रूप में पेश करेंगे।
बिहार की लोकविधाओं में ऋतु, पर्व, पारिवारिक संबंध, कृषि जीवन और सामाजिक उत्सवों की छाप दिखाई देती है। सामा-चकेवा जैसे पर्वगीत और झिझिया, जट-जटिन जैसी लोकनृत्य परंपराएं प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती हैं। जयपुर में होने वाली प्रस्तुति इन परंपराओं को नए दर्शकों से परिचित कराने का माध्यम बनेगी।
कलाकारों को मंच और परंपराओं को संरक्षण
सांस्कृतिक दल की रवानगी के साथ विभाग ने लोककलाओं के संरक्षण और कलाकारों को प्रोत्साहित करने की अपनी प्राथमिकता दोहराई है। राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुति से कलाकारों को अनुभव, पहचान और आगे के अवसर मिल सकते हैं। वहीं दर्शकों को बिहार की उन लोकशैलियों से परिचित होने का अवसर मिलेगा, जो अक्सर स्थानीय आयोजनों और पर्व-त्योहारों तक सीमित रह जाती हैं।

अब सभी की नजर 5 नवंबर को होने वाली प्रस्तुति पर है। उम्मीद है कि बिहार का सांस्कृतिक दल अपनी प्रस्तुतियों के जरिए राज्य की लोकपरंपराओं की समृद्धि और विविधता को प्रभावशाली ढंग से सामने रखेगा।
