21 अक्टूबर 1951 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दिल्ली में भारतीय जनसंघ (Bharatiya Jana Sangh—BJS) की स्थापना की। स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती वर्षों में बने इस राजनीतिक संगठन ने भारतीय राजनीति में एक अलग वैचारिक धारा को संगठित रूप दिया। आगे चलकर जनसंघ की राजनीतिक परंपरा भारतीय जनता पार्टी (BJP) के गठन और विकास से जुड़ी, हालांकि दोनों संगठनों के बीच का ऐतिहासिक संबंध समझने के लिए बीच के राजनीतिक घटनाक्रम को भी देखना जरूरी है।
स्थापना की पृष्ठभूमि
स्वतंत्रता और विभाजन के बाद भारत की राजनीति नए संस्थागत और वैचारिक स्वरूप ले रही थी। इसी दौर में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने एक ऐसे राजनीतिक मंच की स्थापना की, जो राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और मजबूत केंद्र जैसे विचारों पर जोर देता था। भारतीय जनसंघ का गठन 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में हुआ और उसने शीघ्र ही चुनावी राजनीति में भाग लेना शुरू किया।
मुखर्जी इससे पहले स्वतंत्र भारत की पहली मंत्रिपरिषद में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री रह चुके थे। बाद में उन्होंने मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दिया और जनसंघ की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व ने संगठन को शुरुआती दिशा दी, जबकि आगे के दशकों में अन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इसे देश के विभिन्न हिस्सों में विस्तार दिया।
भारतीय जनसंघ की विचारधारा और राजनीति
जनसंघ ने राष्ट्रीय पहचान, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति, आर्थिक नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर अपनी राजनीतिक स्थिति विकसित की। संगठन ने संसदीय लोकतंत्र के भीतर चुनाव लड़कर अपना समर्थन बढ़ाने का प्रयास किया। शुरुआती वर्षों में उसका जनाधार सीमित था, लेकिन समय के साथ उसे कुछ क्षेत्रों में अधिक समर्थन मिला और वह विपक्षी राजनीति का हिस्सा बना।

जनसंघ की राजनीति को उस समय की व्यापक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में समझना चाहिए। उसके विचारों के समर्थक इसे राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक पहचान पर केंद्रित आंदोलन मानते थे, जबकि आलोचक इसकी विचारधारा और अल्पसंख्यकों तथा धर्मनिरपेक्षता से जुड़े दृष्टिकोण पर सवाल उठाते रहे। इन मतभेदों ने भारतीय लोकतंत्र में विचारों की प्रतिस्पर्धा और सार्वजनिक बहस को आकार दिया।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भूमिका
डॉ. मुखर्जी जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष थे और उन्होंने संगठन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का प्रयास किया। जम्मू-कश्मीर के भारत के साथ संबंधों और वहां लागू विशेष संवैधानिक व्यवस्था के विरोध में उनका रुख उनके राजनीतिक जीवन का प्रमुख हिस्सा रहा। 1953 में जम्मू-कश्मीर में हिरासत के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु और उससे जुड़े प्रश्न भारतीय राजनीतिक इतिहास में लंबे समय तक चर्चा का विषय बने रहे।
जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी तक
1975 से 1977 के आपातकाल के बाद विपक्षी दलों ने मिलकर जनता पार्टी बनाई। भारतीय जनसंघ के कई नेता और कार्यकर्ता इस गठबंधन में शामिल हुए। जनता पार्टी के भीतर मतभेदों और राजनीतिक बदलावों के बाद 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई। जनसंघ से जुड़े कई नेताओं ने नई पार्टी के निर्माण में भूमिका निभाई और उसके शुरुआती संगठनात्मक विकास में योगदान दिया।
इसलिए भारतीय जनसंघ को भारतीय जनता पार्टी का वैचारिक और राजनीतिक पूर्ववर्ती कहना आम तौर पर उचित है, लेकिन यह कहना कि दोनों एक ही संगठन के बिना किसी अंतराल के नाम मात्र बदलने से बने, इतिहास को अत्यधिक सरल बना देगा। जनता पार्टी का दौर और 1980 में भाजपा का अलग संगठन के रूप में गठन इस यात्रा के महत्वपूर्ण चरण थे।

भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक महत्व
भारतीय जनसंघ की स्थापना स्वतंत्रता के बाद के उस दौर का महत्वपूर्ण पड़ाव थी, जब विभिन्न विचारधाराएं चुनावी और संसदीय राजनीति के माध्यम से अपना स्थान बना रही थीं। जनसंघ ने एक राजनीतिक संगठन, चुनावी मंच और वैचारिक परंपरा के रूप में भूमिका निभाई। उसके नेताओं, कार्यकर्ताओं और राजनीतिक उत्तराधिकार से जुड़ी परंपराओं ने बाद की राजनीति को प्रभावित किया।
21 अक्टूबर 1951 की यह घटना केवल एक दल की स्थापना की तारीख नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत में राजनीतिक विकल्पों के विस्तार के इतिहास का हिस्सा है। भारतीय जनसंघ की विरासत पर विचार करते समय उसके संस्थापक नेतृत्व, विचारधारा, चुनावी यात्रा और जनता पार्टी से होते हुए भाजपा के गठन तक के क्रम को एक साथ देखना जरूरी है।
