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Home - मनोरंजन - सितारा देवी की जयंती: कथक को वैश्विक पहचान दिलाने वाली ‘नृत्य साम्राज्ञी’ की प्रेरक कहानी

सितारा देवी की जयंती: कथक को वैश्विक पहचान दिलाने वाली ‘नृत्य साम्राज्ञी’ की प्रेरक कहानी

प्रशांत कुमार
Last updated: नवम्बर 8, 2026 5:11 अपराह्न
By : प्रशांत कुमार
Published on : 9 मिनट पहले
सितारा देवी
सितारा देवी
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विशेष लेख | 8 नवम्बर | जन्मदिवस विशेष | भारतीय शास्त्रीय नृत्य एवं संस्कृति

जब सोलह वर्ष की एक युवा नृत्यांगना ने अपनी प्रस्तुति से गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर को मंत्रमुग्ध कर दिया, तो उन्होंने उसे ‘नृत्य साम्राज्ञी’ कहकर सम्मानित किया। वह कलाकार थीं सितारा देवी—जिनके घुंघरुओं की गूंज ने कथक को देश की सीमाओं से बाहर प्रतिष्ठा दिलाई और जिनकी ऊर्जा, लय तथा अभिव्यक्ति ने मंच पर एक अलग पहचान बनाई।

भारतीय शास्त्रीय नृत्य के इतिहास में कुछ नाम केवल अपनी कला के लिए नहीं, बल्कि उस कला की सामाजिक प्रतिष्ठा और लोकप्रियता को नई दिशा देने के लिए भी याद किए जाते हैं। कथक की ऐसी ही विलक्षण साधिका थीं सितारा देवी। उनका जन्म 8 नवम्बर 1920 को तत्कालीन कलकत्ता (आज का कोलकाता) में हुआ था। जन्म के समय उनका नाम धनलक्ष्मी रखा गया और परिवार में उन्हें ‘धन्नो’ कहकर पुकारा जाता था। आगे चलकर मंच पर वे सितारा देवी के नाम से विख्यात हुईं।

कथक की तेजस्वी प्रस्तुतियों, असाधारण ऊर्जा, पैरों की जटिल लयकारी और भावपूर्ण अभिनय के कारण वे अपने समय की सबसे प्रभावशाली नृत्यांगनाओं में गिनी गईं। उनका जीवन उस दौर की कहानी भी है, जब एक लड़की का सार्वजनिक मंच पर नृत्य करना सामाजिक पूर्वाग्रहों से टकराने जैसा था। सितारा देवी ने अपनी कला के माध्यम से न केवल इन धारणाओं को चुनौती दी, बल्कि कथक को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नई पहचान दिलाने में योगदान दिया।

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कला-संस्कारों से बना नृत्य का संसार

सितारा देवी के पिता पंडित सुखदेव महाराज कथक के विद्वान, कलाकार और संस्कृत तथा पौराणिक परंपराओं के जानकार थे। उनका परिवार मूल रूप से बनारस से जुड़ा था और कथक की बनारस परंपरा से उसका गहरा संबंध था। उनकी माता मत्स्य कुमारी का संबंध नेपाल के राजपरिवार से बताया जाता है। घर का वातावरण संगीत, नृत्य, कथा और धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं से समृद्ध था। ऐसे परिवेश में सितारा देवी का कला की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक था।

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उनके पिता चाहते थे कि उनकी बेटियां भी नृत्य सीखें और मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाएं। लेकिन उस समय समाज के एक हिस्से में कथक और सार्वजनिक नृत्य को लेकर संकीर्ण धारणाएं थीं। नृत्य को कई बार दरबारी या तवायफ संस्कृति से जोड़कर देखा जाता था, जिसके कारण कलाकार परिवारों को सामाजिक आलोचना का सामना करना पड़ता था। सुखदेव महाराज ने इन बाधाओं के बावजूद अपनी बेटियों को प्रशिक्षण दिया और पौराणिक कथाओं पर आधारित नृत्य-नाटिकाओं के माध्यम से कथक को सम्मानजनक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया।

सितारा देवी ने बचपन से ही नृत्य का कठोर अभ्यास किया। उनकी प्रतिभा जल्दी सामने आई और लगभग दस वर्ष की उम्र तक वे एकल प्रस्तुतियां देने लगी थीं। एक नृत्य-नाटिका में सावित्री की भूमिका ने दर्शकों का ध्यान खींचा। इसके बाद उनके पिता ने उन्हें ‘सितारा’ नाम दिया—एक ऐसा नाम, जो आगे चलकर भारतीय नृत्य जगत में उनकी पहचान बन गया।

टैगोर की प्रशंसा और ‘नृत्य साम्राज्ञी’ की उपाधि

सितारा देवी के जीवन की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से जुड़ी है। जब वे लगभग 16 वर्ष की थीं, तब उनकी एक लंबी कथक प्रस्तुति देखने के बाद टैगोर उनसे अत्यंत प्रभावित हुए। प्रचलित जीवन-वृत्तांतों के अनुसार, उन्होंने युवा कलाकार की प्रतिभा की प्रशंसा करते हुए उन्हें ‘नृत्य साम्राज्ञी’ (Nritya Samragini) की उपाधि दी। यह संबोधन केवल व्यक्तिगत प्रशंसा नहीं था; यह उस कला-साधना की पहचान थी, जिसने कम उम्र में ही एक विलक्षण कलाकार को स्थापित कर दिया था।

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इस प्रसंग के अलग-अलग विवरणों में प्रस्तुति के स्थान और सम्मान के स्वरूप को लेकर कुछ अंतर मिलता है, लेकिन टैगोर द्वारा उनकी प्रतिभा की सराहना और ‘नृत्य साम्राज्ञी’ कहे जाने का उल्लेख अनेक जीवनीपरक लेखों में मिलता है। सितारा देवी ने बाद में भी इस प्रशंसा को अपने नृत्य जीवन के महत्वपूर्ण सम्मान के रूप में याद किया।

कथक की परंपरा, प्रयोग और मंचीय ऊर्जा

सितारा देवी की कला में कथक की लयकारी, तत्कार, चक्कर, मुद्राएं, भाव-अभिनय और कथा-वाचन का प्रभावशाली मेल दिखाई देता था। वे केवल तकनीकी दक्षता के लिए नहीं, बल्कि अपनी प्रस्तुति की ऊर्जा और दर्शकों से सीधे संवाद स्थापित करने की क्षमता के लिए भी जानी जाती थीं। उनकी नृत्य-शैली में बनारस घराने की परंपरा का प्रभाव था। उन्होंने अन्य गुरुओं और कलाकारों से भी सीखकर अपनी कला को समृद्ध किया। लखनऊ घराने के आचार्यों से जुड़ी प्रशिक्षण परंपराओं और संवाद ने भी उनके नृत्य अनुभव को व्यापक बनाया।

उनकी प्रस्तुतियों में शुद्ध नृत्य (नृत्त) के साथ भाव और अभिनय (अभिनय) का भी विशेष स्थान था। वे पौराणिक कथाओं, भक्ति-साहित्य और संगीत की लय को मंच पर सजीव कर देती थीं। तबले के दिग्गज कलाकारों के साथ उनकी जुगलबंदी और लयकारी की चुनौतीपूर्ण प्रस्तुतियां भी चर्चित रहीं। उनके बारे में यह प्रसंग अक्सर उद्धृत किया जाता है कि उन्होंने मुंबई में एक अवसर पर लगातार लगभग 11 घंटे तक नृत्य किया। यह घटना उनकी असाधारण शारीरिक क्षमता, अभ्यास और कला के प्रति समर्पण का प्रतीक बन गई।

सितारा देवी ने कथक को किसी एक सीमित मंच या वर्ग तक बांधकर नहीं रखा। वे चाहती थीं कि दर्शक इसकी शास्त्रीय गरिमा, तकनीकी गहराई और भाव-संपन्नता को समझें। उन्होंने नई पीढ़ी के कलाकारों को प्रशिक्षण दिया और अपने परिवार तथा शिष्यों के माध्यम से इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

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अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय कथक की पहचान

सितारा देवी की लोकप्रियता भारत तक सीमित नहीं रही। उन्होंने देश-विदेश के प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुतियां दीं। 1967 में लंदन के रॉयल अल्बर्ट हॉल और 1976 में न्यूयॉर्क के कार्नेगी हॉल में उनकी प्रस्तुतियों का उल्लेख उनके अंतरराष्ट्रीय सफर के महत्वपूर्ण पड़ावों में किया जाता है। इन मंचों पर कथक की प्रस्तुति ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य को वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाने में मदद की।

उनकी प्रस्तुतियों में भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की गहराई के साथ मंचीय आकर्षण भी था। वे दर्शकों को केवल नृत्य की तकनीक नहीं दिखाती थीं, बल्कि ताल, कथा और भाव के जरिए भारतीय सांस्कृतिक अनुभव से जोड़ती थीं। यही कारण था कि वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहीं।

फिल्मों से जुड़ाव और लोकप्रिय संस्कृति में योगदान

शास्त्रीय नृत्य के साथ सितारा देवी का संबंध हिंदी सिनेमा से भी रहा। उन्होंने अपने शुरुआती वर्षों में फिल्मों के लिए नृत्य किया और बाद में अभिनय भी किया। ‘उषा हरण’ (1940), ‘रोटी’ और ‘मदर इंडिया’ (1957) जैसी फिल्मों से उनका नाम जुड़ा। महबूब खान की ‘मदर इंडिया’ में उनकी उपस्थिति ने उन्हें सिनेमा दर्शकों के बीच भी पहचान दिलाई। फिल्मों में काम करने के बावजूद उनकी प्राथमिक पहचान कथक की साधिका और मंचीय कलाकार की ही रही।

फिल्मों के अनुभव ने उन्हें व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाया, लेकिन उन्होंने अपनी कला की शास्त्रीय पहचान और मंचीय साधना को हमेशा महत्व दिया। उनके लिए कथक केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अनुशासन, परंपरा, संगीत, साहित्य और आध्यात्मिक भावबोध से जुड़ी एक संपूर्ण कला थी।

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सम्मान, स्वाभिमान और पद्म भूषण लौटाने का निर्णय

कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए सितारा देवी को कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले। उन्हें 1969 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 1973 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। बाद के वर्षों में उन्हें कालिदास सम्मान सहित अन्य पुरस्कारों और सम्मानों से भी नवाजा गया। 2009 में संगीत नाटक अकादमी की फेलोशिप से उनका सम्मान हुआ।

2002 में पद्म भूषण दिए जाने की घोषणा के बाद उन्होंने यह सम्मान स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उस समय उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि कथक के लिए उनके योगदान को देखते हुए वे भारत रत्न से कम सम्मान स्वीकार नहीं करना चाहतीं। यह निर्णय चर्चा और बहस का विषय बना। इसे उनके स्वाभिमान और कला के प्रति उनके दृष्टिकोण के रूप में देखा गया। उनके इस कदम से यह भी स्पष्ट हुआ कि वे पुरस्कारों से अधिक अपनी कला की प्रतिष्ठा और उसके उचित मूल्यांकन को महत्व देती थीं।

एक विरासत, जो घुंघरुओं की आवाज में जीवित है

सितारा देवी का निधन 25 नवम्बर 2014 को मुंबई में 94 वर्ष की आयु में हुआ। उनके जाने से भारतीय शास्त्रीय नृत्य जगत ने एक ऐसी कलाकार खो दी, जिनकी ऊर्जा, आत्मविश्वास और मंचीय उपस्थिति की अपनी अलग पहचान थी। उनके पुत्र रंजीत बारोट संगीत की दुनिया में जाने-माने नाम बने और परिवार की अगली पीढ़ियों ने भी कला के क्षेत्र में योगदान दिया।

सितारा देवी की विरासत केवल पुरस्कारों, फिल्मों या प्रसिद्ध मंचों तक सीमित नहीं है। उन्होंने उस समय कथक को अपनाया और आगे बढ़ाया, जब समाज में इस कला को लेकर अनेक पूर्वाग्रह मौजूद थे। उन्होंने अपनी साधना से दिखाया कि परंपरा जीवित तभी रहती है, जब कलाकार उसे समझे, साधे और नई पीढ़ी तक पहुंचाए।

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8 नवम्बर को उनकी जयंती भारतीय कला-जगत के लिए उस नृत्यांगना को याद करने का अवसर है, जिसने अपने घुंघरुओं की लय से कथक की गरिमा को नई ऊंचाई दी। गुरुदेव टैगोर का दिया ‘नृत्य साम्राज्ञी’ संबोधन उनके नाम के साथ आज भी जुड़ा है—और उनकी कला की चमक सचमुच सितारे की तरह पीढ़ियों तक बनी हुई है।

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