किसी पिता के लिए अपनी छोटी-सी बेटी की आंखों में खुशी देखना दुनिया की सबसे बड़ी दौलत होती है। लेकिन जब जेब खाली हो और बेटी की छोटी-सी ख्वाहिश पूरी करने की हैसियत भी न बचे, तो उस पिता के भीतर क्या गुजरती होगी, इसे शायद वही समझ सकता है।
झारखंड के रांची विश्वविद्यालय के 96 अतिथि शिक्षकों की जिंदगी इन दिनों कुछ ऐसी ही बेबसी और इंतजार के बीच गुजर रही है। पिछले 25 महीनों से मानदेय नहीं मिलने के कारण किसी के घर का राशन उधार पर आ रहा है, तो कोई अपने बच्चों की छोटी-छोटी जरूरतें पूरी करने में भी खुद को असमर्थ पा रहा है।
पापा, पटाखे कब लाओगे… आशीष के पास नहीं था कोई जवाब
शाम ढलते ही घर के आंगन में छोटी-सी अशावी दौड़ती हुई आती है। पिता आशीष को देखते ही उनकी गोद में चढ़ जाती है। मासूमियत से पूछती है, ”पापा, पटाखे कब लाओगे? सबके पापा पटाखे लाए हैं, आप कब लाओगे?”
यह सवाल किसी बड़े खर्च की मांग नहीं है। न ही किसी महंगे खिलौने की जिद। यह तो बचपन की वह छोटी-सी इच्छा है, जिसे पूरा करने के लिए एक बच्ची अपने पिता की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रही है।

लेकिन केओ कॉलेज, गुमला में अतिथि शिक्षक के रूप में कार्यरत आशीष के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है। बेटी को निराश न करने के लिए वह मुस्कुराकर कह देते हैं, ”बेटा, कल लाएंगे।”
लेकिन इस एक शब्द के पीछे छिपी बेबसी शायद उनसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता। क्योंकि उन्हें खुद नहीं पता कि वह कल आखिर कब आएगा। पिछले 25 महीनों से उन्हें मानदेय नहीं मिला है।
दिवाली गुजर गई, बेटी का इंतजार रह गया
धनतेरस पर बाजारों में रौनक थी। दुकानें सजी थीं। लोग अपने परिवार के लिए सोना, बर्तन, कपड़े, मिठाइयां और पटाखे खरीद रहे थे। हर तरफ त्योहार की तैयारियां थीं। लेकिन आशीष के लिए यह रौनक जैसे किसी दूसरे संसार की कहानी थी।
वह बाजार गए जरूर, मगर खाली हाथ लौट आए। बेटी के लिए पटाखों का एक छोटा-सा पैकेट तक नहीं खरीद सके।

घर लौटने पर जब अशावी ने फिर वही सवाल किया, तो आशीष ने अपना मुंह दूसरी तरफ फेर लिया। आंखों में आंसू थे, लेकिन बेटी के सामने उन्हें छिपाना जरूरी था। आखिर वह पिता हैं। अपनी तकलीफ को भीतर दबाकर बच्चों के सामने मुस्कुराना भी तो उनकी जिम्मेदारी बन जाती है।
आशीष बताते हैं कि वह रोज कॉलेज में बच्चों को पढ़ाते हैं। उन्हें समझाते हैं कि मेहनत का फल हमेशा मीठा होता है। लेकिन घर लौटने के बाद अपनी ही बेटी से नजर मिलाना मुश्किल हो जाता है।
उनका दर्द इस बात में छिपा है कि जिस मेहनत और ईमानदारी का पाठ वह अपने विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं, उसी मेहनत का प्रतिफल उन्हें 25 महीनों से नहीं मिला है।
अब उनके पास बेटी को समझाने के लिए दिलासे भी कम पड़ने लगे हैं। उन्हें चिंता सिर्फ अपनी आर्थिक स्थिति की नहीं, बल्कि इस बात की भी है कि कहीं बार-बार अधूरे रह जाने वाले वादों से बेटी का भरोसा न टूट जाए।

सूरज के घर में भी त्योहार की रोशनी से ज्यादा चिंता
यह पीड़ा सिर्फ आशीष की नहीं है। अतिथि शिक्षक सूरज के घर की कहानी भी इससे अलग नहीं है।
दिवाली की रात जब आसपास के घरों में दीये जल रहे थे, तब सूरज के परिवार के सामने रोजमर्रा की जरूरतों का संकट था। घर का राशन उधार पर आ रहा है। अब दुकानदार भी बार-बार उधार देने से कतराने लगे हैं। बच्चों की कॉपी-किताब खरीदने से पहले भी कई बार सोचना पड़ता है।
एक पिता के लिए इससे बड़ी विवशता क्या होगी कि वह अपने बच्चों की पढ़ाई और जरूरतों के लिए भी हर बार पैसों का हिसाब लगाने को मजबूर हो?
सूरज कहते हैं, ”हमने किसी से भीख नहीं मांगी है। हमने मेहनत की है, बच्चों को पढ़ाया है। हम सिर्फ अपनी मेहनत का हक मांग रहे हैं।”

उनकी आवाज में शिकायत से ज्यादा एक ऐसे पिता की पीड़ा है, जो अपनी पत्नी और बेटी संशिका की जरूरतों को जानते हुए भी उन्हें पूरा नहीं कर पा रहा है।
वह बताते हैं कि कई बार परिवार के सामने जाने और उनकी जरूरतों के बारे में पूछने तक में संकोच महसूस होता है। क्योंकि मन में इच्छा होने के बावजूद हाथ खाली हैं।
यहां सवाल किसी की विलासिता का नहीं है। सवाल उन बुनियादी जरूरतों का है, जिन्हें पूरा करना किसी भी परिवार के लिए सामान्य बात होनी चाहिए।
जो दूसरों का भविष्य संवार रहे हैं, उनका अपना वर्तमान उधार पर
रांची विश्वविद्यालय के अतिथि शिक्षक वर्षों से कॉलेजों में विद्यार्थियों को पढ़ाने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। कॉलेजों की शैक्षणिक गतिविधियों में उनकी भूमिका है। पढ़ाई से लेकर परीक्षा, उत्तरपुस्तिकाओं के मूल्यांकन और नामांकन जैसी जिम्मेदारियों में भी उनका योगदान रहता है।

वे विद्यार्थियों को बेहतर भविष्य के सपने दिखाते हैं। उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि दूसरों का भविष्य संवारने वाले इन शिक्षकों का अपना वर्तमान आर्थिक अनिश्चितता के बीच गुजर रहा है।
बताया जा रहा है कि रांची विश्वविद्यालय के कुल 96 अतिथि शिक्षक पिछले 25 महीनों से मानदेय मिलने का इंतजार कर रहे हैं। उनके लिए यह सिर्फ भुगतान में देरी का मामला नहीं रह गया है। इतने लंबे समय तक आय का नियमित साधन नहीं होने से परिवार की पूरी आर्थिक व्यवस्था प्रभावित होती है।
घर का किराया, बच्चों की पढ़ाई, राशन, दवाइयां और रोजमर्रा की जरूरतें किसी फाइल के आगे बढ़ने का इंतजार नहीं करतीं। इनका भुगतान हर महीने करना पड़ता है। लेकिन जब काम करने वाले व्यक्ति को ही समय पर उसका पारिश्रमिक न मिले, तो उसके सामने परिवार चलाने की चुनौती खड़ी हो जाती है।
25 महीने का इंतजार आखिर कब होगा खत्म?
इन शिक्षकों की पीड़ा को केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया या लंबित फाइल का विषय मानकर नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे 96 परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी जुड़ी हुई है।

आशीष की बेटी अशावी का पटाखों के लिए पूछा गया सवाल और सूरज की बेटी संशिका की जरूरतें इस संकट का मानवीय चेहरा हैं। इन बच्चों को शायद यह समझ नहीं कि मानदेय क्या होता है, भुगतान की प्रक्रिया कैसे चलती है और सरकारी या विश्वविद्यालयी फाइलें कहां अटकती हैं। उन्हें तो बस इतना पता है कि उनके पापा उनकी जरूरतें पूरी करेंगे।
लेकिन जब पिता के पास ही कोई जवाब न हो, तो उनकी बेबसी शब्दों में बयान करना आसान नहीं।
इन शिक्षकों की मांग भी बहुत सीधी है। उन्होंने जो काम किया है, उसका मानदेय उन्हें मिले। उन्हें अपने परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए लगातार उधार और इंतजार के बीच न जीना पड़े।
अब जरूरत है कि विश्वविद्यालय प्रशासन और संबंधित जिम्मेदार अधिकारी इस मामले को गंभीरता से देखें और लंबित मानदेय के भुगतान की स्थिति स्पष्ट करें। साथ ही भुगतान में देरी के कारणों और आगे की समयसीमा के बारे में भी शिक्षकों को जानकारी दी जाए।

क्योंकि 25 महीने का इंतजार सिर्फ कैलेंडर के पन्नों पर बीता हुआ समय नहीं है। यह उन परिवारों के लिए 25 महीनों की आर्थिक परेशानी है, जिनकी जरूरतें हर दिन उनके सामने खड़ी होती रही हैं।
आखिर में बात फिर उसी छोटी-सी अशावी पर आकर ठहर जाती है। उसे शायद आज भी लगता होगा कि पापा कल पटाखे जरूर लाएंगे। लेकिन आशीष के लिए यह कल अब सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि अपनी मेहनत का हक मिलने की उम्मीद बन गया है।
सवाल यह नहीं कि एक पिता अपनी बेटी के लिए पटाखे क्यों नहीं खरीद पाया। सवाल यह है कि जो शिक्षक वर्षों से हजारों बच्चों के सपनों को आकार दे रहे हैं, उन्हें अपनी ही मेहनत का मानदेय पाने के लिए इतना लंबा इंतजार क्यों करना पड़ रहा है?
