गुवाहाटी/नई दिल्ली: असम की लोकधुनों, ब्रह्मपुत्र की सांस्कृतिक स्मृतियों और आम लोगों के सुख-दुख को अपनी आवाज देने वाले डॉ. भूपेन हजारिका भारतीय संगीत जगत की ऐसी विरासत हैं, जिनकी रचनाएं भाषा और क्षेत्र की सीमाओं से आगे निकल गईं। गायक, गीतकार, संगीतकार, कवि और फिल्मकार के रूप में उन्होंने असमिया संगीत को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई। 5 नवंबर 2011 को मुंबई में उनका निधन हुआ था। उनकी पुण्यतिथि पर देश उन्हें ‘ब्रह्मपुत्र का कवि’ और ‘सुधाकंठ’ के रूप में याद करता है।
सादिया में जन्म, बचपन से संगीत की ओर झुकाव
डॉ. भूपेन हजारिका का जन्म 8 सितंबर 1926 को तत्कालीन असम के सादिया में हुआ था। उनके पिता नीलकांत हजारिका और माता शांतिप्रिया हजारिका थीं। परिवार का वातावरण और असम की लोक-सांस्कृतिक परंपराएं उनके व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण रहीं। बचपन से ही संगीत और कविता में रुचि रखने वाले भूपेन ने कम उम्र में गीत लिखना और गाना शुरू कर दिया था। कहा जाता है कि उन्होंने लगभग दस वर्ष की आयु में अपना पहला गीत लिखा और गाया।
1939 में, महज 12 वर्ष की उम्र में, उन्होंने असमिया फिल्म इंद्रमालती के लिए काम किया। इतनी कम उम्र में फिल्म और संगीत की दुनिया से जुड़ना उनके असाधारण बाल-प्रतिभा का परिचायक था। आगे चलकर यही शुरुआती अनुभव उन्हें भारतीय सिनेमा के महत्वपूर्ण संगीतकारों और फिल्मकारों में शामिल करने वाला बना।
उच्च शिक्षा और अमेरिका में शोध
भूपेन हजारिका ने गुवाहाटी में प्रारंभिक उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक और राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वे उच्च अध्ययन के लिए अमेरिका गए। कोलंबिया विश्वविद्यालय से उन्होंने जनसंचार (मास कम्युनिकेशन) में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उनके शोध और अध्ययन में शिक्षा, संचार तथा फिल्म जैसे माध्यमों की सामाजिक उपयोगिता पर विशेष ध्यान था।

अमेरिका प्रवास के दौरान उनकी मुलाकात अश्वेत अमेरिकी गायक और सामाजिक कार्यकर्ता पॉल रॉबसन से हुई। रॉबसन के सामाजिक चेतना से जुड़े गीतों और सांस्कृतिक सक्रियता ने हजारिका की रचनात्मक दृष्टि को प्रभावित किया। संगीत उनके लिए केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज से संवाद और मानवीय एकता का माध्यम भी बन गया।
लोकधुनों में मानवता और सामाजिक चेतना
भारत लौटने के बाद भूपेन हजारिका ने असम की लोकपरंपराओं, जनजीवन और समकालीन सामाजिक सवालों को अपने गीतों का आधार बनाया। उनकी आवाज की गहराई, स्पष्ट उच्चारण और गीतों की कथात्मक शैली ने उन्हें अलग पहचान दी। असमिया भाषा में रचे उनके गीत बंगाली और हिंदी सहित कई भाषाओं में लोकप्रिय हुए। उन्होंने स्थानीय संगीत परंपराओं को व्यापक भारतीय श्रोता-वर्ग तक पहुंचाया।
‘मनुहे मनुहर बाबे’ (मनुष्य मनुष्य के लिए), ‘बिस्तीर्ण पारोरे’ और ‘गंगा बहती हो क्यों’ जैसे गीतों में मानवता, असमानता, शोषण, सामाजिक अन्याय और सामूहिक जिम्मेदारी के प्रश्न दिखाई देते हैं। उनके गीतों में नदी केवल प्राकृतिक दृश्य नहीं, बल्कि इतिहास, समाज और मनुष्य की पीड़ा की साक्षी बनकर सामने आती है। ब्रह्मपुत्र उनके संगीत और सांस्कृतिक कल्पना का एक स्थायी प्रतीक रहा।
उनकी रचनाओं की खासियत यह थी कि वे कठिन विचारों को सरल, भावपूर्ण और याद रह जाने वाली भाषा में व्यक्त करती थीं। यही वजह है कि उनके गीत गांवों, कस्बों, शहरों और अलग-अलग भाषाई समुदायों के बीच लोकप्रिय हुए। उन्हें ‘ब्रह्मपुत्र का कवि’ कहे जाने के पीछे नदी और असम की सामूहिक स्मृति से उनका गहरा रचनात्मक रिश्ता है।

असमिया सिनेमा से हिंदी फिल्मों तक
भूपेन हजारिका ने संगीत निर्देशन के साथ-साथ लेखन, गायन, अभिनय, निर्माण और निर्देशन में भी काम किया। उनकी निर्देशित असमिया फिल्म एरा बाटोर सुर (1956) को उनके फिल्मी सफर की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाता है। उन्होंने असमिया, बंगाली और हिंदी फिल्मों के लिए संगीत तैयार किया तथा पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक ध्वनियों को भारतीय सिनेमा के बड़े मंच तक पहुंचाया।
हिंदी फिल्म रुदाली (1993) के गीत ‘दिल हूम-हूम करे’ ने उन्हें देशभर के दर्शकों के बीच विशेष लोकप्रियता दिलाई। इस गीत में लोकधुन की आत्मीयता और उनकी संगीत-संवेदना का सुंदर मेल दिखाई देता है। गजगामिनी, दमन और अन्य फिल्मों से जुड़े उनके संगीत ने भी उनकी बहुआयामी प्रतिभा को सामने रखा। फिल्म संगीत में उनके योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।
सम्मान और उपलब्धियां
भूपेन हजारिका को उनके संगीत, फिल्म और सांस्कृतिक योगदान के लिए अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। उन्हें 1975 में फिल्म चमेली मेमसाब के संगीत निर्देशन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। 1977 में पद्मश्री, 1987 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 1992 में भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 2001 में उन्हें पद्म भूषण और 2008 में संगीत नाटक अकादमी की फेलोशिप मिली।
उनके निधन के बाद 2012 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसके बाद 25 जनवरी 2019 को राष्ट्रपति सचिवालय की घोषणा के अनुसार उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न प्रदान किया गया। भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान उनके दीर्घकालीन सांस्कृतिक योगदान और राष्ट्रीय जीवन पर पड़े प्रभाव की औपचारिक मान्यता था।

संगीत से आगे: एक सांस्कृतिक सेतु
भूपेन हजारिका का योगदान केवल गीतों और फिल्मों तक सीमित नहीं था। वे पत्रकारिता, लेखन, शिक्षा और सांस्कृतिक गतिविधियों से भी जुड़े रहे। उन्होंने असम की लोकधुनों और पूर्वोत्तर के विविध सांस्कृतिक अनुभवों को देश के अन्य हिस्सों तक पहुंचाने का काम किया। उनके गीतों में क्षेत्रीय अस्मिता के साथ-साथ व्यापक भारतीयता और मानवीय एकता का भाव भी मिलता है।
उनकी रचनाएं यह याद दिलाती हैं कि लोकसंगीत किसी समाज का जीवित इतिहास होता है। उसमें श्रम, संघर्ष, प्रेम, प्रकृति, विस्थापन और उम्मीद की आवाजें दर्ज रहती हैं। हजारिका ने इन आवाजों को संगीत की ऐसी भाषा दी, जिसे समझने के लिए श्रोता का असमिया जानना जरूरी नहीं था। यही उनकी लोकप्रियता और कलात्मक शक्ति का आधार बना।
5 नवंबर 2011 को हुआ निधन, लेकिन आवाज आज भी जीवित
लंबे समय तक संगीत और सिनेमा को समर्पित जीवन के बाद डॉ. भूपेन हजारिका का 5 नवंबर 2011 को मुंबई में निधन हो गया। उनके जाने से असम ही नहीं, पूरे देश ने एक ऐसे कलाकार को खोया जिसने लोकधुनों को मानवीय संवेदना और सामाजिक चेतना से जोड़ा। उनकी स्मृति में असम और देश के विभिन्न हिस्सों में कार्यक्रम आयोजित होते रहे हैं।
आज भी ‘मनुहे मनुहर बाबे’ जैसे गीत इंसानियत और भाईचारे की बात करते हैं, जबकि ‘बिस्तीर्ण पारोरे’ समाज से सवाल पूछने का साहस देता है। यही कारण है कि डॉ. भूपेन हजारिका की पहचान किसी एक भाषा, राज्य या पीढ़ी तक सीमित नहीं है। उनकी आवाज में ब्रह्मपुत्र की व्यापकता, असम की मिट्टी की सुगंध और मनुष्य के प्रति गहरी करुणा एक साथ सुनाई देती है।

उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना भारतीय संगीत की उस परंपरा को याद करना है, जिसमें कला समाज से अलग नहीं होती। भूपेन हजारिका की धुनें आज भी यही संदेश देती हैं कि संगीत मनुष्यों को जोड़ने, अन्याय के विरुद्ध संवेदना जगाने और विविधता के बीच साझा मानवीय आधार खोजने की ताकत रखता है।
